ख़ुत्बात
 
129-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(नाप तौल के बारे में)


अल्लाह के बन्दों! तुम और जो कुछ इस दुनिया से तवक़्क़ो रखते हो सब एक मुक़र्ररा मुद्दत के मेहमान हैं और ऐसे क़र्जदार हैं जिनसे क़र्ज़ का मुतालबा हो रहा हो, उम्रें घट रही हैं और आमाल महफ़ूज़ किये जा रहे हैं, कितने दौड़ धूप करने वाले हैं जिनकी मेहनत बरबाद हो रही है और कितने कोषिष करने वाले हैं जो मुसलसल घाटे का षिकार हैं। तुम ऐसे ज़माने में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हो जिसमें नेकी मुसलसल मुंह फेरकर जा रही है और बुराई बराबर सामने आ रही है। “ौतान लोगों को तबाह करने की हवस में लगा हुआ है, इसका साज़ व सामान मुस्तहकम हो चुका है उसकी साज़िषें आम हो चुकी हैं और उसके षिकार उसके क़ाबू में हैं। तुम जिधर चाहो निगाह उठाकर देख लो सिवाए उस फ़क़ीर के जो फ़क्ऱ की मुसीबत झेल रहा है और उस अमीर के जिसने नेमते ख़ुदा की नाषुक्री की है और उस बुख़ल के जिसने हक़क़े ख़ुदा में बुख़्ल ही को माल के इज़ाफ़े का ज़रिया बना लिया है और उस सरकष के जिसके कान नसीहतों के लिये बहरे हो गए हैं और कुछ नज़र नहीं आएगा। कहां चले गए वह नेक और स्वालेह बन्दे और किधर हैं वह “ारीफ़ और करीमुन्नफ़्स लोग, कहां हैं वह अफ़राद जो कस्ब माष में एहतियात बरतने वाले थे और रास्तों में पाकीज़ा रास्ता इख़्तेयार करने वाले थे, क्या सब के सब इस पस्त और ज़िन्दगी को मकदर बना देने वाली दुनिया से नहीं चले गये और क्या तुम्हें ऐसे अफ़राद में नहीं छोड़ गए जिनकी हिक़ारत और जिनके ज़िक्र से एराज़ की बिना पर होंठ सिवाए इनकी मज़म्मत के किसी बात के लिये आपस में नहीं मिलते हैं। इन्ना लिल्लाह व इन्ना इलैहे राजेऊन। फ़साद इस क़द्र फ़ैल चुका है के न कोई हालात का बदलने वाला है और न कोई मना करने वाला और न ख़ुद परहेज़ करने वाला है तो क्या तुम इन्हीं हालात के ज़रिये ख़ुदा के मुक़द्दस जवार में रहना चाहते हो और उसके अज़ीज़तरीन दोस्त बनना चाहते हो। अफ़सोस! अल्लाह को जन्नत के बारे में धोका नहीं दिया जा सकता है और न उसकी मर्ज़ी को इताअत के बग़ैर हासिल किया जा सकता है। अल्लाह लानत करे उन लोगों पर जो दूसरों को नेकियों का हुक्म देते हैं और ख़ुद अमल नहीं करते हैं। समाज को बुराइयों से रोकते हैं और ख़ुद उन्हीं में मुब्तिला हैं।