ख़ुत्बात
 
125- आपका इरषादे गिरामी
(तहकीम के बारे में, हकमीन की दास्तान सुनने के बाद)


याद रखो, हमने अफ़राद को हकम नहीं बनाया था बल्के क़ुरआन को हकम क़रार दिया था और क़ुरान वही किताब है जो दफ़्तियों के दरम्यान मौजूद है लेकिन मुष्किल यह है के यह ख़ुद नहीं बोलता है और उसे तर्जुमान की ज़रूरत है और तर्जुमान अफ़राद ही होते हैं। इस क़ौम ने हमें दावत दी के हम क़ुरान से फ़ैसले कराएं तो हम तो क़ुरान से रूगर्दानी करने वाले नहीं थे जबके परवरदिगार ने फ़रमाया है के अपने खि़लाफ़त को ख़ुदा व रसूल की तरफ़ मोड़ दो और ख़ुदा की तरफ़ मोड़ने का मतलब उसकी किताब से फ़ैसला कराना ही है और रसूल (स0) की तरफ़ मोड़ने का मक़सद भी सुन्नत का इत्तेबाअ करना है और यह तय है के अगर किताबे ख़ुदा से सच्चाई के साथ फ़ैसला किया जाए तो उसके सबसे ज़्यादा हक़दार हम ही हैं और इसी तरह सुन्नते पैग़म्बर के लिये सबसे ऊला व अक़रब हम ही हैं।


अब तुम्हारा यह कहना के आपने तहकीम की मोहलत क्यों दी? तो किसका राज़ यह है के मैं चाहता था के बेख़बर बाख़बर हो जाए और बाख़बर तहक़ीक़ कर ले के “ाायद परवरदिगार इस वक़्फ़े में उम्मत के उमूर की इस्लाह कर दे और इसका गला न घोंटा जाए के तहक़ीक़े हक़ से पहले गुमराही के पहले ही मरहले में भटक जाएं और याद रखो के परवरदिगार के नज़दीक बेहतरीन इन्सान वह है जिसे हक़ पर अमल दरआमद करना (चाहे इसमें नुक़सान ही क्यों न हो) बातिल पर अमल करने से ज़्यादा महबूब हो (चाहे इसमें फ़ायदा ही क्यों न हो), तो आखि़र तुम्हें किधर ले जाया जा रहा है और तुम्हारे पास “ौतान किधर से आ गया है, देखो इस क़ौम से जेहाद के लिये तैयार हो जाओ जो हक़ के मामले में इस तरह सरगर्दां है के उसे कुछ दिखाई ही नहीं देता है और बातिल पर इस तरह अक़ारद कर दी गई है के सीधे रास्ते पर जाना ही नहीं चाहती है। यह किताबे ख़ुदा से अलग और वह राहे हक़ से मुन्हरिफ़ हैं मगर तुम भी क़ाबिले एतमाद अफ़राद और लाएक़ तमस्सुक “ारफ़ के पासबान नहीं हो। तुम आतिषे जंग के भड़काने का बदतरीन ज़रिया हो, तुम पर हैफ़ है मैंने तुमसे बहुत तकलीफ़ उठाई है, तुम्हें अलल एलान भी पुकारा है और आहिस्ता भी समझाया है लेकिन तुम न आवाज़े जंग पर सच्चे “ारीफ़ साबित हुए और न राज़दारी पर क़ाबिले एतमाद साथी निकले।


(((- हज़रत ने तहकीम का फ़ैसला करते हुए दोनों अफ़राद को एक साल की मोहलत दी थी ताके इस दौरान नावाक़िफ़ अफ़राद हक़ व बातिल की इत्तेलाअ हासिल कर लें और जो किसी मिक़दार में हक़ से आगाह हैं वह मज़ीद तहक़ीक़ कर लें, ऐसा न हो के बेख़बर अफ़राद पहले ही मरहले में गुमराह हो जाएं और अम्र व आस की मक्कारी का षिकार हो जाएं। मगर अफ़सोस यह है के हर दौर में ऐसे अफ़राद ज़रूर रहते हैं जो अपने अक़्ल व फ़िक्र को हर एक से बालातर तसव्वुर करते हैं और अपने क़ाएद के फ़ैसलों को भी मानने के लिये तैयार नहीं होते हैं और खुली हुई बात है के जब इमाम (अ0) के साथ ऐसा बरताव किया गया है तो नाएब इमाम या आलिमे दीन की क्या हक़ीक़त है?-)))