ख़ुत्बात
 
122- आपका इरषादे गिरामी
(जब आप ख़वारिज के उस पड़ाव की तरफ़ तषरीफ़ ले गए जो तहकीम के इन्कार पर अड़ा हुआ था और फ़रमाया)


क्या तुम सब हमारे साथ सिफ़्फ़ीन में थे? लोगों ने कहा बाज़ अफ़राद थे और बाज़ नहीं थे! फ़रमाया तो तुम दो हिस्सों में तक़सीम हो जाओ, सिफ़्फ़ीन वाले अलग और ग़ैर सिफ़्फ़ीन वाले अलग, ताके मैं हर एक से उसके हाल के मुताबिक़ गुफ़्तगू कर सकूँ।
इसके बाद क़ौम से पुकारकर फ़रमाया तुम सब ख़ामोष हो जाओ और मेरी बात सुनो और अपने दिलों को ाी मेरी तरफ़ मुतवज्जो रखो ताके अगर मैं किसी बात की गवाही तलब करूं तो हर “ाख़्स अपने इल्म के मुताबिक़ जवाब दे सके, (यह कहकर आपने एक तवील गुफ़्तगू फ़रमाई जिसका एक हिस्सा यह था)
ज़रा बतलाओ के जब सिफ़्फ़ीन वालों ने हीला व मक्र और जाल व फ़रेब से नैज़ों पर क़ुरआन बलन्द कर दिये थे तो क्या तुमने यह नहीं कहा था के यह सब हमारे भाई और हमारे साथ के मुसलमान हैं। अब हमसे माफ़ी के तलबगार हैं और किताबे ख़ुदा से फैसला चाहते हैं लेेहाज़ा मुनासिब यह है के इनकी बात मान ली जाय और उन्हें सांस लेने का मौक़ा दे दिया जाए। मैंने तुम्हें समझाया था के इसका ज़ाहिर ईमान है लेकिन बातिन सिर्फ ज़ुल्म और तादी है। इसकी इब्तेदा रहमत व राहत है लेकिन इसका अन्जाम “ार्मिन्दगी और निदामत है लेहाज़ा अपनी हालत पर क़ायम रहो और अपने रास्ते को मत छोड़ो और जेहाद पर दांतों को भींचे रहो और किसी बकवास करने वाले की बकवास को मत सुनो के उसके क़ुबूल कर लेने में गुमराही है और नज़रअन्दाज़ कर देने में ज़िल्लत है। लेकिन जब तहकीम की बात तय हो गई तो मैंने देखा के तुम्हीं लोगों ने उसकी रज़ामन्दी दी थी हालांके ख़ुदा गवाह है के अगर मैंने उससे इन्कार कर दिया होता तो उससे मुझ पर कोई फ़रीज़ा आयद न होता और न परवरदिगार मुझे गुनहगार क़रार देता और अगर मैंने उसे इख़्तेयार किया होता तो मैं ही वह साहेबे हक़ था जिसका इत्तेबाअ होना चाहिए था के किताबे ख़ुदा मेरे साथ है और जबसे मेरा इसका साथ हुआ है कभी जुदाई नहीं हुई। हम रसूले अकरम (स0) के ज़माने में उस वक़्त जंग करते थे जब मुक़ाबले पर ख़ानदानों के बुज़ुर्ग, बच्चे, भाई बन्द और रिष्तेदार होते थे लेकिन हर मुसीबत व षिद्दत पर हमारे ईमान में इज़ाफ़ा ही होता था और हम अम्रे इलाही के सामने सरे तस्लीम ख़म किये रहते थे। राहे हक़ में बढ़ते ही जाते थे और ज़ख़्मों की टीस पर सब्र ही करते थे मगर अफ़सोस के अब हमें मुसलमान भाइयों से जंग करना पड़ रही है के इनमें कजी, इन्हेराफ़, “ाुबह और ग़लत तावीलात का दख़ल हो गया है लेकिन इसके बावजूद अगर कोई रास्ता निकल आए जिससे ख़ुदा हमारे इन्तेषार को दूर कर दे और हम एक-दूसरे से क़रीब होकर रहे सहे, ताल्लुक़ात को बाक़ी रख सकें तो हम इसी रास्ते को पसन्द करेंगे और दूसरे रास्ते से हाथ रोक लेंगे।