ख़ुत्बात
 
119-आपका इरषादे गिरामी
(जब आपने लोगों को जमा करके जेहाद की तलक़ीन की और लोगों ने सुकूत इख़्तेयार कर लिया तो फ़रमाया)


तुम्हें क्या हो गया है, क्या तुम गूंगे हो गए हो? इस पर एक जमाअत ने कहा के या अमीरूल मोमेनीन (अ0)! आप चलें हम चलने के लिये तैयार हैं। फ़रमाया, तुम्हें क्या हो गया है- अल्लाह तुम्हें हिदायत की तौफ़ीक़ न दे और तुम्हें सीधा रास्ता नसीब न हो। क्या ऐसे हालात में मेरे लिये मुनासिब है के मैं ही निकलूँ? ऐसे मौक़े पर एक “ाख़्स को निकलना चाहिये जो तुम्हारे बहादुरों और जवाँमर्दों में मेरा पसन्दीदा हो और हरगिज़ मुनासिब नहीं है के मैं लष्कर, “ाहर बैतुलमाल, ख़ेराज की फ़राहेमी, क़ज़ावत, मुतालबात करने वालों के हुक़ूक़ की निगरानी का सारा काम छोड़कर निकल जाऊँ और लष्कर लेकर दूसरे लष्कर का पीछा करूं और इस तरह जुम्बिष करता रहूँ जिस तरह ख़ाली तरकष में तीर। मैं ख़ेलाफ़त की चक्की का मरकज़ हूँ जिसे मेरे गिर्द चक्कर लगाना चाहिये के अगर मैंने मरकज़ छोड़ दिया तो उसकी गर्दिष का दाएरा मुतज़लज़ल हो जाएगा और उसके नीचे की बिसात भी जाबजा हो जाएगी। ख़ु़दा की क़सम यह बदतरीन राय है और वही गवाह है के अगर दुष्मन का मुक़ाबला करने में मुझे “ाहादत की आरज़ू न होती, जबके वह मुक़ाबला मेरे लिये मुक़द्दर हो चुका हो, तो मैं अपनी सवारियों को क़रीब करके उनपर सवार होकर तुमसे बहुत दूर निकल जाता और फिर तुम्हें उस वक़्त तक याद भी न करता जब तक षिमाली व जुनूबी हवाएं चलती रहें। तुम तन्ज़ करने वाले, ऐब लगाने वाले, किनारा कषी करने वाले और सिर्फ़ “ाोर मचाने वाले हो, तुम्हारे आदाद की कसरत का क्या फाएदा है जब तुम्हारे दिल यकजा नहीं हैं। मैंने तुमको इस वाज़ेअ रास्ते पर चलाना चाहा जिस पर चलकर कोई हलाक नहीं हो सकता है मगर यह के हलाकत इसका मुक़द्दर हो। इसी राह पर चलने वाले की वाक़ेई मन्ज़िल जन्नत है और यहाँ फिसल जाने वाले का रास्ता जहन्नम है।


(((-ऐ लोग हर दौर में दीनदारों में भी रहे हैं और दुनियादारों में भी, जो क़ौम से हर तरह के एहतेराम के तलबगार होते हैं और क़ौम का किसी तरह का एहतेराम नहीं करते हैं, लोगों से दीने ख़ुदा की ठेकेदारी के नाम पर हर तरह की क़ुरबानी का तक़ाज़ा करते हैं और ख़ुद किसी तरह की क़ुरबानी का इरादा नहीं करते हैं उनकी नज़र में दीने ख़ुदा दुनिया कमाने का बेहतरीन ज़रिया है और यह दरहक़ीक़त बदतरीन तिजारत है के इन्सान दीन की अज़ीम व “ारीफ़ दौलत को देकर दुनिया जैसी हक़ीर व ज़लील “ौ को हासिल करने का मन्सूबा बनाए, ज़ाहिर है के जब दनिदारों में ऐसे किरदार पैदा हो जाते हैं तो दुनियादारों का क्या ज़िक्र है उन्हें तो बहरहाल उससे बदतर होना चाहिये।-)))