ख़ुत्बात
 
115-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(तलबे बारिष के सिलसिले में)


ख़ुदाया! हमारे पहाड़ों का सब्ज़ा ख़ुष्क हो गया है और हमारी ज़मीन पर ख़ाक उड़ रही है। हमारे जानवर प्यासे हैं और अपनी मन्ज़िल की तलाष में सरगर्दां हैं और अपने बच्चों के हक़ में इस तरह फ़रयादी हैं जैसे ज़न पिसर मुर्दा, सब चरागाहों की तरफ़ फेरे लगाने और तालाबों की तरफ़ वालेहाना तौर पर दौड़ने से आजिज़ आ गए हैं, ख़ुदाया! अब इनकी फ़रयादी की बकरियों और इष्तिेयाक़ आमेज़ पुकारने वाली ऊंटनियों पर रहम फ़रमा। ख़ुदाया! इनकी राहों में परेषानी और मन्ज़िलों पर चीख़ व पुकार पर रहम फ़रमा। ख़ुदाया् हम इस वक़्त घर से निकल कर आए हैं जब क़हत साली के मारे हूए लाग़र ऊंट हमारी तरफ़ पलट पड़े हैं और जिनसे करम की उम्मीद थी वह बादल आकर चले गए हैं। अब दर्द के मारों का तू ही आसरा है और इल्तिजा करने वालों का तू ही सहारा है। हम उस वक़्त दुआ कर रहे हैं जब लोग मायूस हो चुके हैं। बादलों के ख़ैर को रोक दिया गया है और जानवर हलाक हो रहे हैं तो ख़ुदाया हमारे आमाल की बिना पर हमारा मवाखि़ज़ा न करना, और हमें हमारे गुनाहों की गिरफ़्त में मत ले लेना, अपने दामने रहमत को हमारे ऊपर फैला दे बरसने वाले बादल, मूसलाधार बरसात और इसीन सब्ज़ा के ज़रिये। ऐसी बरसात जिससे मुरदा ज़मीन ज़िन्दा हो जाएं और गई हुई बहार वापस आ जाए। ख़ुदाया! ऐसी सेराबी अता फ़रमा जो ज़िन्दा करने वाली, सेराब बनाने वाली। कामिल व “ाामिल, पाकीज़ा व मुबारक, ख़ुषगवार व “ाादाब हो जिसकी बरकत से नबातात फलने फूलने लगेंं। “ााख़ें बारआवर हो जाएं, पत्ते हरे हो जाएं, कमज़ोर बन्दों को उठने का सहारा मिल जाए, मुर्दा ज़मीनों को ज़िन्दगी अता हो जाए। ख़ुदाया! ऐसी सेराबी अता फ़रमा जिससे टीले सब्ज़ापोष हो जाएं, नहरें जारी हो जाएं, आस-पास के इलाक़े “ाादाब हो जाएं, फल निकलने लगें, जानवर जी उठें, दूर दराज़ के इलाक़े भी तर हो जाएं और खुले मैदान भी तेरी इस वसीअ बरकत और अज़ीम अता से मुस्तफ़ैज़ हो जाएं जो तेरी तबाह हाल मख़लूक़ आवारागर्द जानवरों पर है। हम पर ऐसी बारिष नाज़िल फ़रमा जो पानी से ‘ाराबोर कर देने वाली, मूसलाधार, मुसलसल बरसने वाली हो, जिसमें क़तरात, क़तरात को ढकेल रहे हों और बून्दें बून्दों को तेज़ी से आगे बढ़ा रही हों। न उसकी बिजली धोका देने वाली हो और न उसके बादल पानी से ख़ाली हों न उसके अब्र से सफ़ेद टुकड़े बिखरे हों और न सिर्फ़ ठण्डे झोंकों की बून्दाबान्दी हो, ऐसी बारिष हो के क़हत के मारे हुए इसकी सरसब्ज़ियों से ख़ुषहाल हो जाएं और ख़ुष्क साली के षिकार इसकी बरकत से जी उठें। इसलिये के तू ही हमारी मायूसी के बाद पानी बरसाने वाला और दामाने रहमत का फैलाने वाला है तू ही क़ाबिले हम्द व सताइष, सरपरस्त व मददगार है।


सय्यद रज़ी- इन्साहत जबालना- यानी पहाड़ों में ख़ुष्कसाली से षिगाफ़ पड़ गए हैं के इन्साहलसौब कपड़े के फट जाने को कहा जाता है। या इसके मानी घास के ख़ुष्क हो जाने के हैं। साहा-इन्साह ऐसे मवाक़ेअ पर भी इस्तेमाल होता है, हामत दवाबना - यानी प्यासे हैं और हयाम यहाँ अतष के मानी हैं।
हदाबीरल सनीन- हदबार की जमा है, वह ऊंट जिसे सफ़र लाग़र बना दे, गोया के क़हतज़दा साल को इस ऊंट से तषबीह दी गई है जैसा के ज़वालरमा “ााएर ने कहा था-
(यह लाग़र और कमज़ोर ऊंटनिया हैं जो सख़्ती झेलकर बैठ गई हैं या फिर बेआब व ग्याह सहरा में ले जाने पर चली जाती हैं)
या क़ज़अ रबाबहा- क़जअ - बादल के छोटे-छोटे टुकड़े, ला “ाफ़्फ़ान ज़हाबहा - असल में ‘‘ज़ाते षफ़ान’’ है- “ाफ़ान ठण्डी हवा को कहा जाता है और ज़ेहाब हल्की फवार का नाम है। यहाँ लफ़्ज़ ‘‘ज़ात’’ हज़फ़ हो गया है।