ख़ुत्बात
 
113- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(मज़म्मते दुनिया)


मैं तुम्हें इस दुनिया से होषियार कर रहा हूँ के यह कूच की जगह है। आबो दाना की मन्ज़िल नहीं है, यह धोके ही से आरास्ता हो गई है और अपनी आराइष ही से धोका देती है। इसका घर परवरदिगार की निगाह में बिल्कुल बे अर्ज़िष है इसीलिये उसने इसके हलाल के साथ हराम, ख़ैर के साथ्ज्ञ “ार, ज़िन्दगी के साथ मौत, और “ाीरीं के साथ तल्ख़ को रख दिया है और न उसे अपने औलिया के लिये मख़सुस किया है और न अपने दुष्मनों को उससे महरूम रखा है। इसका ख़ैर बहुत कम है और इसका “ार हर वक़्त हाज़िर है। इसका जमा किया हुआ ख़त्म हो जाने वाला है और इसका मुल्क छिन जाने वाला है और इसके आबाद को एक दिन ख़राब हो जाना है। भला उस घर में क्या ख़ूबी है जो कमज़ोर इमारत की तरह गिर जाए और उस अम्र में क्या भलाई है जो ज़ादे राह की तरह ख़त्म हो जाए और इस ज़िन्दगी में क्या हुस्न है जो चलते-फ़िरते तमाम हो जाए।
देखो अपने मतलूबे उमूर में फ़राएज़े इलाहिया को भी “ाामिल कर लो और इसी से इसके हक़ के अदा करने की तौफ़ीक़ का मुतालेबा करो। अपने कानों को मौत की आवाज़ सुना दो क़ब्ल इसके के तुम्हें बुला लिया जाए। दुनिया में ज़ाहिदों की “ाान यही होती है के वह ख़ुष भी होते हैं तो उनका दिल रोता रहता है और वह हंसते भी हैं तो इनका रंज व अन्दोह “ादीद होता है। वह ख़ुद अपने नफ़्स से बेज़ार रहते हैं चाहे लोग इनके रिज़्क़ से ग़बता ही क्यों न करें। अफ़सोस तुम्हारे दिलों से मौत की याद निकल गई है और झूठी उम्मीदों ने उन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। अब दुनिया का इख़्तेयार तुम्हारे ऊपर आख़ेरत से ज़्यादा है और वह आक़बत से ज़्यादा तुम्हें खींच रही है। तुम दीने ख़ुदा के एतबार से भाई-भाई थे। लेकिन तुम्हें बातिन की ख़बासत और ज़मीर की ख़राबी ने अलग-अलग कर दिया है के अब न किसी का बोझ बटाते हो, न नसीहत करते हो, न एक दूसरे पर ख़र्च करते हो और न एक दूसरे से वाक़ेअन मोहब्बत करते हो। आखि़र तुम्हें क्या हो गया है के मामूली सी दुनिया को पाकर ख़ुष हो जाते हो और मुकम्मल आख़ेरत से महरूम होकर रन्जीदा नहीं होते हो, थोड़ी सी दुनिया हाथ से निकल जाए तो परेषान हो जाते हो और इसका असर तुम्हारे चेहरों से ज़ाहिर हो जाता है और इसकी अलाहेदगी पर सब्र नहीं कर पाते हो जैसे वही तुम्हारी मन्ज़िल है और जैसे इसका सरमाया वाक़ई बाक़ी रहने वाला है। तुम्हारी हालत यह है के कोई “ाख़्स भी दूसरे के ऐब के इज़हार से बाज़ नहीं आता है मगर सिर्फ़ इस ख़ौफ़ से के वह भी इसी तरह पेष आएगा। तुम सबने आख़ेरत को नज़रअन्दाज़ करने और दुनिया की मोहब्बत पर इत्तेहाद कर लिया है और हर एक का दीन ज़बान की चटनी बनकर रह गया है। ऐसा लगता है के जैसे सबने अपना अमल मुकम्मल कर लिया है और अपने मालिक को वाक़ेअन ख़ुष कर लिया है।