ख़ुत्बात
 
109- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(क़ुदरते ख़ुदा अज़मते इलाही और रोज़े महषर के बारे में)



हर “ौ उसकी बारगाह में सर झुकाए हुए है और हर चीज़ उसी के दम से क़ायम है। वह हर फ़क़ीर की दौलत का सहारा और हर ज़लील की इज़्ज़त का आसरा है। हर कमज़ोर की ताक़त वही है और हर फ़रयादी की पनाहगाह वही है। हर बोलने वाले के नतक़ को सुन लेता है और हर ख़ामोष रहने वाले के राज़ को जानता है। जो ज़िन्दा है उसका रिज़्क़ उसके ज़िम्मे है जो मर गया उसकी बाज़गष्त उसी की तरफ़ है।
ख़ुदाया! आँखों ने तुझे देखा नहीं है के तेरे बारे में ख़बर दे सकें, तू तमाम तौसीफ़ करने वाली मख़लूक़ात के पहले से है, तूने मख़लूक़ात को तन्हाई की वहषत की बिना पर नहीं ख़ल्क़ किया है और न उन्हें किसी फ़ाएदे के लिये इस्तेमाल किया है। तू जिसे हासिल करना चाहे वह आगे नहीं जा सकता है और जिसे पकड़ना चाहे वह बच कर नहीं जा सकता है। नाफ़रमानों से तेरी सल्तनत में कमी नहीं आती है और इताअत गुज़ारों से तेरे मुल्क में इज़ाफ़ा नहीं होता है जो तेरे फ़ैसले से नाराज़ हो वह तेरे हुक्म को टाल नहीं सकता है और जो तेरे अम्र से रूगरदानी करे वह तुझसे बेनियाज़ नहीं हो सकता है। हर राज़ तेरे सामने रौषन है और हर ग़ैब तेरे लिये हुज़ूर है। तू अबदी है तो तेरी कोई इन्तेहा नहीं है और तू इन्तेहा है तो तुझसे कोई छुटकारा नहीं है, तू सबकी वादागाह है तो तुझसे निजात हासिल करने की कोई जगह नहीं है। हर ज़मीन पर चलने वाले का इख़्तेयार तेरे हाथ में है और हर जानदार की बाज़गष्त तेरी ही तरफ़ है। पाक व बे नियाज़ है तू, तेरी “ाान क्या बाअज़मत है और तेरी मख़लूक़ात भी क्या अज़ीमुष्षान है और तेरी क़ुदरत के सामने हर अज़ीम “ौ किस क़द्र हक़ीर है और तेरी सल्तनत किस क़द्र पुरषिकोह है और यह सब तेरी इस ममलेकत के मुक़ाबले में जो निगाहों से ओझल है किस क़द्र मामूली है। तेरी नेमतें इस दुनिया में किस क़द्र मुकम्मल हैं और फ़िर नेमाते आख़ेरत के मुक़ाबले में किस क़द्र मुख़्तसर हैं।

(मलाएका मुक़र्रबीन) यह तेरे मलाएका हैं जिन्हें तूने आसमानों में आबाद किया है और ज़मीन से बलन्दतर बनाया है। यह तमाम मख़लूक़ात से ज़्यादा तेरी मारेफ़त रखते हैं और तुझसे ख़ौफ़ज़दा रहते हैं और तेरे क़रीबतर भी हैं। यह न असलाबे पिदर में रहे हैं और न अरहामे मादर में और न हक़ीर नुत्फ़े से पैदा किये गए हैं और न इन पर ज़माने के इन्क़ेलाबात का कोई असर है। यह तेरी बारगाह में एक ख़ास मक़ाम और मन्ज़िलत रखते हैं। इनकी तमामतर ख़्वाहिषात सिर्फ़ तेरे बारे में हैं और यह बकसरत तेरी ही इताअत करते हैं और तेरे हुक्म से हरगिज़ ग़ाफ़िल नहीं होते हैं। लेकिन इसके बावजूद अगर तेरी अज़मत की तह तक पहुंच जाएं तो अपने आमाल को हक़ीरतरीन तसव्वुर करेंगे और अपने नफ़्स की मज़म्मत करेंगे और उन्हें मालूम हो जाएगा के इन्होंने इबादत का हक़ अदा नहीं किया है और हक़क़े इताअत के बराबर इताअत नहीं की है।
तू पाक व बे नियाज है, ख़ालकीयत के एतबार से भी और इबादत के एतबार से भी। मेरी तस्बीह इस बेहतरीन बरताव की बिना पर है जो तूने मख़लूक़ात के साथ किया है। तूने एक घर बनाया है, उसमें एक दस्तरख़्वान बिछाया है। जिसमें खाने-पीने, ज़ौजियत, खि़दमत, क़स्र, नहर, ज़राअत, समर सबका इन्तज़ामक र दिया है और फिर एक दाई को इसकी तरफ़ दावत देने के लिये भेज दिया है। लेकिन लोगों ने न दाई की आवाज़ पर लब्बैक कही और न जिन चीज़ों की तरफ़ तूने रग़बत दिलाई थी राग़िब हुए और न तेरी तषवीक़ का “ाौक़ पैदा किया।
सब उस मुरदार पर टूट पड़े जिसको खाकर रूसवा हुए आर सबने इसकी मोहब्बत पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया और ज़ाहिर है के जो किसी का भी आषिक़ हो जाता है वह “ौ उसे अन्धा बना देती है और उसके दिल को बीमार कर देती है। वह देखता भी है तो ग़ैर सलीम आंखों से और सुनता भी है तो ग़ैर समीअ कानों से। ख़्वाहिषात ने इनकी अक़्लों को पारा-पारा कर दिया है और दुनिया ने उनके दिलों को मुर्दा बना दिया है। उन्हें इससे वालहाना लगाव पैदा हो गया है और वह उसके बन्दे हो गए हैं और उनके ग़ुलाम बन गए हैं, जिनके हाथ में थोड़ी सी भी दुनिया है के जिस तरफ़ झुकती है यह भी झुक जाते हैं और जिधर वह मुड़ती है यह भी मुड़ जाते हैं, न कोई ख़ुदाई रोकने वाला उन्हें रोक सकता है और न किसी वाएज़ की नसीहत इन पर असरअन्दाज़ होती है। जबके उन्हें देख रहे हैं जो इसी धोके में पकड़ लिये गए हैं के अब न माफ़ी का इमकान है और न वापसी का। किसी तरह इन पर वह मुसीबत नाज़िल हो गई है जिससे नावाक़िफ़ थे और फ़िराक़े दुनिया की वह आफ़त आ गई है जिसकी तरफ़ से बिल्कुल मुतमइन थे और आख़ेरत में इस सूरते हाल का सामना कर रहे हैं जिसका वादा किया गया था। अब तो उस मुसीबत का बयान भी नामुमकिन है जहां एक तरफ़ मौत का सकरात है और दूसरी तरफ़ फ़िराक़े दुनिया की हसरत। हालत यह है के हाथ पांव ढीले पड़ गए हैं और रंग उड़ गया है इसके बाद मौत की दख़ल अन्दाज़ी और बढ़ी तो वह गुफ़्तगू की राह में भी हाएल हो गई के इन्सान घरवालों के दरम्यान है उन्हें आखों से देख रहा है, कान से उनकी आवाज़ें सुन रहा है, अक़्ल भी सलामत है और होष भी बरक़रार है। यह सोच रहा है के उम्र को कहां बरबाद कर दिया है और ज़िन्दगी को कहां गुज़ारा है। उन अमवाल को याद कर रहा है जिन्हें जमा किया था और उनकी जमाआवरी में आंखें बन्द कर ली थीं के कभी वाज़ेअ रास्तों से हासिल किया और कभी मुष्तबा तरीक़ों से के सिर्फ़ इनके जमा करने के असरात बाक़ी रह गये हैं और उनसे जुदाई का वक़्त आ गया है। अब यह माल बादवालों के लिये रह जाएगा जो आराम करेंगे और मज़े उड़ाएंगे। यानी मज़ा दूसरों के लिये होगा और बोझ इसकी पीठ पर होगा लेकिन इन्सान इस माल की ज़न्जीरों में जकड़ा हुआ है और मौत ने सारे हालात को बेनक़ाब कर दिया है के निदामत से अपने हाथ काट रहा है और इस चीज़ से किनाराकष होना चाहता है जिसकी तरफ़ ज़िन्दगी भर राग़िब था। अब यह चाहता है के काष जो “ाख़्स इससे माल की बिना पर हसद कर रहा था यह माल उसके पास होता और इसके पास न होता।
इसके बाद मौत इसके जिस्म में मज़ीद दरान्दाज़ी करती है और ज़बान के साथ कानों को भी “ाामिल कर लेती है के इन्सान अपने घरवालों के दरम्यान न बोल सकता है और न सुन सकता है। हर एक के चेहरे को हसरत से देख रहा है। इनकी ज़बान की जुम्बिष को भी देख रहा है लेकिन अल्फ़ाज़ को नहीं सुन सकता है।
इसके बाद मौत और चिपक जाती है तो कानों की तरह आंखों पर भी क़ब्ज़ा हो जाता है और रूह जिस्म से परवाज़ कर जाती है। अब वह घरवालों के दरम्यान एक मुरदार होता है। जिसके पहलू में बैठने से भी वहषत होने लगती है और लोग दूर भागने लगते हैं। यह अब न किसी रोने वाले को सहारा दे सकता है और न किसी पुकारने वाले की आवाज़ पर आवाज़ दे सकता है। लोग उसे ज़मीन केे एक गढ़े तक पहुंचा देते हैं और उसे उसके आमाल के हवाले कर देते हैं के मुलाक़ातों का सिलसिला भी ख़त्म हो जाता है।
यहाँ तक के जब क़िस्मत का लिखा अपनी आख़री हद तक और अम्रे इलाही अपनी मुक़र्ररा मन्ज़िल तक पहुंच जाएगा और आख़ेरीन को अव्वलीन से मिला दिया जाएगा और एक नया हुक्मे इलाही आ जाएगा के खि़लक़त की तजदीद की जाए तो यह अम्र आसमानों को हरकत देकर षिगाफ़ता कर देगा और ज़मीन को हिलाकर खोखला कर देगा और पहाड़ों को जड़ से उखाड़कर उड़ा देगा और हैबते जलाले इलाही और ख़ौफ़े सितवते परवरदिगार से एक दूसरे से टकरा जाएंगे और ज़मीन सबको बाहर निकाल देगी और उन्हें दोबारा बोसीदगी के बाद ताज़ा हयात दे दी जाएगी और इन्तेषार के बाद जमा कर दिया जाएगा और मख़फ़ी आमाल पोषीदा अफ़आल के सवाल के लिये सबको अलग-अलग कर दिया जाएगा और मख़लूक़ात दो गिरोहों में तक़सीम हो जाएंगी। एक गिरोह मरकज़े नेमात होगा और दूसरा महले इन्तेक़ाम।
अहले इताअत को इस जवारे रहमत में सवाब और दारे जन्नत में हमेषगी का इनाम दिया जाएगा जहां के रहने वाले कूच नहीं करते हैं और न उनके हालात में कोई तग़य्युर पैदा होता है और न इन पर रन्ज व अलम तारी होता है और न उन्हें कोई बीमारी लाहक़ होती है और न किसी तरह का ख़तरा सामने आता है और न सफ़र की ज़हमत से दो-चार होना पड़ता है। लेकिन अहले मासीयत के लिये बदतरीन मन्ज़िल होगी जहां हाथ गरदन से बन्धे होंगे और पेषानियों को पैरों से जोड़ दिया जाएगा। तारकोल और आग के तराषीदा लिबास पहनाए जाएंगे। इस अज़ाब में जिसकी गर्मी “ादीद होगी और जिसके दरवाज़े बन्द होंगे और उस जहन्नम में जिसमें “ारारे भी होंगे और “ाोर व ग़ोग़ा भी, भड़कते हुए “ाोले भी होंगे और हौलनाक चीख़ें भी, न यहाँ के रहने वाले कूच करेंगे और न यहाँ के क़ैदियों से कोई फ़िदया क़ुबूल किया जाएगा और न यहाँ की बेड़ियां जुदा हो सकती हैं, न इस घर की कोई मुद्दत है जो तमाम हो जाए और न इस क़ौम की कोई अजल है जो ख़त्म कर दी जाए।

(ज़िक्रे रसूले अकरम (स0)) आपने इस दुनिया को हमेषा सग़ीर व हक़ीर और ज़लील व पस्त तसव्वुर किया है और यह समझा है के परवरदिगार ने इस दुनिया को आपसे अलग रखा है और दूसरों के लिये फ़र्ष कर दिया है तो यह आपकी इज़्ज़त और दुनिया की हेक़ारत ही की बुनियाद पर है लेहाज़ा आपने उससे दिल से किनाराकषी इख़्तेयार की और उसकी याद को दिल से बिलकुल निकाल दिया और यह चाहा के इसकी ज़ीनतें निगाहों से ओझल रहें ताके न उमदा लिबास ज़ेबे तन फ़रमाएं और न किसी ख़ास मक़ाम की उम्मीद करें। आपने परवरदिगार के पैग़ाम को पहुंचाने में सारे उज़्र तमाम कर दिये और उम्मत को अज़ाबे इलाही से डराते हुए नसीहत फ़रमाई। जन्नत की बषारत सुनाकर उसकी तरफ़ दावत दी और जहन्नम से बचने की तलक़ीन करके इसका ख़ौफ़ पैदा कराया।
(अहलेबैत (अ0)) हम नबूवत का “ाजरा, रिसालत की मन्ज़िल, मलाएका की रफ़्तो आमद की जगह, इल्म के माअदन और हिकमत के चष्मे हैं। हमारा मददगार और मोहिब हमेषा मुन्तज़िर रहमत रहता है और हमारा दुष्मन और कीनापरवर हमेषा मुन्तज़िरे लानत व इन्तेक़ामे इलाही रहता है।



(((- ताअज्जुब न करें के ख़ुदाए रहमान व रहीम अपने बन्दों के साथ इस तरह का बरताव किस तरह करेगा के यह अन्जाम उन्हीं लोगों का है जो दारे दुनिया में अल्लाह के कमज़ोर और नेक बन्दों के साथ उससे बदतर बरताव कर चुके हैं तो क्या मालिके कायनात दुनिया में इख़्तेयारात देने के बाद आख़ेरत में भी उन्हें बेहतरीन नेमतों से नवाज़ देगा और मज़लूमीन का दुनिया व आख़ेरत में कोई पुरसान हाल न होगा।? -)))