ख़ुत्बात
 
106- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें इस्लाम की फ़ज़ीलत और रसूले इस्लाम (स0) का तज़किरा करते हुए असहाब की मलामत की गई है)



सारी तारीफ़ उस ख़ुदा के लिये हैं जिसने इस्लाम का क़ानून मुअय्यन किया तो उसके हर घाट को वारिद होने वाले के लिये आसान बना दिया और उसके अरकान को हर मुक़ाबला करने वाले के मुक़ाबले में मुस्तहकम बना दिया। इसने उस दिन को वाबस्तगी इख़्तेयार करने वालों के लिये जाए-अमन और उसके दार्रा में दाखि़ल हो जाने वालों के लिये महले सलामती बना दिया है। यह दीन अपने ज़रिये कलाम करने वालों के लिये बरहान और अपने वसीले से मुक़ाबला करने वालों के लिये “ााहिद क़रार दिया गया है। यह रोषनी हासिल करने वालों के लिये नूर, समझने वालों के लिये फ़हम, फ़िक्र करने वालों के लिये मग़्ज़े कलाम, तलाषे मन्ज़िल करने वालों के लिये निषाने मन्ज़िल, साहेबाने अज़्म के लिये सामाने बसीरत, नसीहत हासिल करने वालों के लिये इबरत, तस्दीक़ करने वालों के लिये निजात, एतमाद करने वालों के लिये क़ाबिले एतमाद, अपने उमूर को सुपुर्द कर देने वालों के लिये राहत और सब्र करने वालों के लिये सिपर है। यह बेहतरीन रास्ता और वाज़ेअतरीन दाखि़ले की मन्ज़िल है, उसके मीनार बलन्द, रास्ते रौषन, चिराग़ ज़ूबार, मैदाने अमल बावेक़ार और मक़सद बलन्द है। इसके मैदान में तेज़ रफ़्तार घोड़ों का इज्तेमाअ है और इसकी तरफ़ सबक़त और इसका इनआम हर एक को मतलूब है, इसके “ाहसवार बाइज़्ज़त हैं।



(((- इस मक़ाम पर मौलाए कायनात (अ0) ने इस्लाम के चैदह सिफ़ात का तज़किरा किया है और इसमें नोए बषर के तमाम एक़ाम का अहाता कर लिया है जिसका मक़सद यह है के इस इस्लाम के बरकात से दुनिया का कोई इन्सान महरूम नहीं रह सकता है और कोई “ाख़्स किसी तरह के बरकात का तलबगार हो उसे इस्लाम के दामन में इस बरकत का हुसूल हो सकता है और वह अपने मतलूबे ज़िन्दगी को हासिल कर सकता है, “ार्त सिर्फ़ यह है के इस्लाम ख़ालिस हो और उसकी तफ़सीर वाक़ेई अन्दाज़ से की जाए वरना गन्दे घाट से प्यासा सेराब नहीं हो सकता है और कमज़ोर अरकान के सहारे पर कोई “ाख़्स ग़लबा नहीं हासिल कर सकता है।-)))



इसका रास्ता तस्दीक़े ख़ुदा और रसूल (स0) है और इसका मिनारा नेकियाँ हैं, मौत एक मक़सद है जिसके लिये दुनिया घोड़दौड़ का मैदान है और क़यामत इसके इज्तेमाअ की मन्ज़िल है और फिर जन्नत इस मुक़ाबले का इनाम है।

(रसूले अकरम (स0)) यहाँ तक के आपने हर रोषनी के तलबगार के लिये आग रौषन कर दी और हर गुमकर्दा राह ठहरे हुए मुसाफ़िर के लिये निषाने मन्ज़िल रौषन कर दिये।
परवरदिगार! वह तेरे मोतबर अमानतदार और रोज़े क़यामत के गवाह हैं। तूने उन्हें नेमत बनाकर भेजा और रहमत बनाकर नाज़िल किया है।

ख़ुदाया! तू अपने इन्साफ़ से इनका हिस्सा अता फ़र्मा और फिर अपने फ़ज़्ल व करम से उनके ख़ैर को दुगना-चैगना कर दे। ख़ुदाया! इनकी इमारत को तमाम इमारतों से बलन्दतर बना दे और अपनी बारगाह में इनकी बाइज़्ज़त तौर पर मेज़बानी फ़रमा और इनकी मन्ज़िलत को बलन्दी अता फ़रमा। उन्हें वसीला और रफ़अत व फ़ज़ीलत करामत फ़रमा और हमें उनके गिरोह में महषूर फ़रमा जहां न रूसवा हों और न “ार्मिन्दा हों, न हक़ से मुन्हरिफ़ हों न अहद षिकन हों, न गुमराह हों और न गुमराहकुन और न किसी फ़ित्ने में मुब्तिला हों।

सय्यद रज़ी- यह कलाम इससे पहले भी गुज़र चुका है लेकिन हमने इख़्तेलाफ़े रिवायत की बिना पर दोबारा नक़्ल कर दिया है।

(अपने असहाब से खि़ताब फ़रमाते हुए)- तुम अल्लाह की दी हुई करामत से इस मन्ज़िल पर पहुँच गए जहां तुम्हारी कनीज़ों का भी एहतराम होने लगा और तुम्हारे हमसाये से भी अच्छा बरताव होने लगा। तुम्हारा एहतराम वह लोग भी करने लगे जिनपर न तुम्हें कोई फ़ज़ीलत हासिल थी और न उनपर तुम्हारा कोई एहसान था और तुमसे वह लोग भी ख़ौफ़ खाने ले जिन पर न तुमने कोई हमला किया था और न तुम्हें कोई इक़्तेदार हासिल था। मगर अफ़सोस के तुम अहदे ख़ुदा को टूटते हुए देख रहे हो और तुम्हें ग़ुस्सा भी नहीं आता है जबके तुम्हारे बाप दादा के अहद को तोड़ा जाता है तो तुम्हें ग़ैरत आ जाती है। एक ज़माना था के अल्लाह के उमूर तमु ही पर वारिद होते थे और तुम्हारे ही पास से बाहर निकलते थे और फिर तुम्हारी ही तरफ़ पलट कर आते थे लेकिन तुमने जाहिलों को अपनी मन्ज़िलों पर क़ब्ज़ा दे दिया और उनकी तरफ़ अपनी ज़मामे अम्र बढ़ा दी और उन्हें सारे उमूर सुपुर्द कर दिये के वह “ाुबहात पर अमल करते हैं और ख़्वाहिषात में चक्कर लगाते रहते हैं और ख़ुदा गवाह है के अगर यह तुम्हें हर सितारे के नीचे मुन्तषिर कर देंगे तो भी ख़ुदा तुम्हें उस दिन जमा कर देगा जो ज़ालिमों के लिये बदतरीन दिन होगा।