ख़ुत्बात
 
104-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा



अम्माबाद! अल्लाह ने हज़रत मोहम्मद (स0) को उस दौर में भेजा है जब अरब में न कोई किताब पढ़ना जानता था और न नबूवत और वही का इदआ करने वाला था। आपने इताअतगुज़ारों के सहारे नाफ़रमानों से जेहाद किया के उन्हें मन्ज़िले निजात की तरफ़ ले जाना चाहते थे और क़यामत के आने से पहले हिदायत दे देना चाहते थे। जब कोई थका मान्दा रूक जाता था और कोई लौटा हुआ ठहर जाता था तो उसके सर पर खड़े हो जाते थे के उसे मन्ज़िल तक पहुंचा दें मगर यह के कोई ऐसा लाख़ैरा हो जिसके मुक़द्दर में हलाकत हो। यहाँ तक के आपने लोगों को मरकज़े निजात से आषना बना दिया और उन्हें उनकी मन्ज़िल तक पहुँचा दिया उनकी चक्की चलने लगी और उनके टेढ़े सीधे हो गए।
और ख़ुदा की क़सम! मैं भी उनके हंकाने वालों में से था यहाँ तक के वह मुकम्मल तौर पर पस्पा हो गए और अपने बन्धनों में जकड़ दिये गए, इस दरम्यान में मैं न कमज़ोर हुआ न बुज़दिली का षिकार हुआ। न मैंने ख़यानत की और न सुस्ती का इज़हार किया।



(((- इमाम अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी का बेहतरीन नक़्षा है और इसी की रोषनी में दूसरे किरदारों का जाएज़ा लिया जा सकता है जिन्हें मैदाने तारीख़ ने तो पहचाना है लेकिन मैदाने जेहाद इनकी गर्दे क़दम से भी महरूम रह गया। मगर अफ़सोस के जानी पहचानी “ाख़्िसयतें अजनबी हो गईं और अजनबी “ाहर के मषाहीर बन गए।-)))



ख़ुदा की क़सम! मैं बातिल का पेट चाक करके उसके पहलू से हक़ को बहरहाल निकाल लूंगा।
सय्यद रज़ी - इस ख़ुत्बे का एक इन्तेख़ाब पहले नक़्ल किया जा चुका है। लेकिन चूंकि इस रिवायत में क़द्रे कमी और ज़्यादती पाई जाती थी लेहाज़ा हालात का तक़ाज़ा यह था के इसे दोबारा इस “ाक्ल में भी दर्ज किया जाए।