ख़ुत्बात  
  99-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें दुनिया से किनाराकषी की दावत दी गई है।)


ख़ुदा की हम्द है उस पर जो हो चुका और उसकी इमदाद का तक़ाज़ा है के उन हालात पर जो सामने आने वाले हैं, हम उससे दीन की सलामती का तक़ाज़ा उसी तरह करते हैं जिस तरह बदन की सेहत व आफ़ियत की दुआ करते हैं।
बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें वसीयत करता हूँ के उस दुनिया को छोड़ दो जो तुम्हें बहरहाल छोड़ने वाली है चाहे तुम उसकी जुदाई पसन्द न करो, वह तुम्हारे जिस्म को बहरहाल बोसीदा कर देगी तुम लाख उसकी ताज़गी की ख़्वाहिष करो, तुम्हारी और उसकी मिसाल उन मुसाफ़िरों जैसी है जो किसी रास्ते पर चले और गोया के मन्ज़िल तक पहुंच गए। किसी निषाने राह का इरादा किया और गोया के उसे हासिल कर लिया और कितना थोड़ा वक़्फ़ा होता है इस घोड़ा दौड़ाने वाले के लिये जो दौड़ाते ही मक़सद तक पहुंच जाए। इस “ाख़्स की बक़ा ही क्या है जिसका एक दिन मुक़र्रर हो जिससे आगे न बढ़ सके और फ़िर मौत तेज़ रफ़्तारी से उसे हंका कर ले जा रही हो यहाँ तक के बादल-नाख़्वास्ता दुनिया को छोड़ दे, ख़बरदार दुनिया की इज़्ज़त और इसकी सरबलन्दी में मुक़ाबला न करना और इसकी ज़ीनत व नेमत को पसन्द न करना और इसकी दुष्वारी और परेषानी से रंजीदा न होना के इसकी इज़्ज़त व सरबलन्दी ख़त्म हो जाने वाली है और उसकी ज़ीनत व नेमत को ज़वाल आ जाने वाला है और उसकी तंगी और सख़्ती बहरहाल ख़त्म हो जाने वाली है, यहाँ हर मुद्दत की एक इन्तेहा है और हर ज़िन्दा के लिये फ़ना है। क्या तुम्हारे लिये गुज़िष्ता लोगों के आसार में सामाने तम्बीह नहीं है? और क्या आबा व अजदाद की दास्तानों में बसीरत व इबरत नहीं है? अगर तुम्हारे पास अक़्ल है, क्या तुमने यह नहीं देखा है के जाने वाले पलट कर नहीं आते हैं और बाद में आने वाले रह नहीं जाते हैं, क्या तुम नहीं देखते हो के अहले दुनिया मुख़्तलिफ़ हालात में सुबह व “ााम करते हैं। कोई मुर्दा है जिस पर गिरया हो रहा है और कोई ज़िन्दा है तो उसे पुरसा दिया जा रहा है। एक बिस्तर पर पड़ा हुआ है तो एक इसकी अयादत कर रहा है और एक अपनी जान से जा रहा है। कोई दुनिया तलाष कर रहा है तो मौत उसे तलाष कर रही है और कोई ग़फ़लत में पड़ा हुआ है तो ज़माना उससे ग़ाफ़िल नहीं है और इस तरह जाने वालों के नक़्षे क़दम पर रह जाने वाले चले जा रहे हैं। आगाह हो जाओ के अभी मौक़ा है उसे याद करो जो लज़्ज़तों को फ़ना कर देने वाली, ख़्वाहिषात को मुकदर कर देने वाली और उम्मीदों को क़ता कर देने वाली है। ऐसे औक़ात में जब बुरे आमाल का इरतेकाब कर रहे हो और अल्लाह से मदद मांगो के इसके वाजिब हक़ को अदा कर दो और उन नेमतों का “ाुक्रिया अदा कर सको जिनका “ाुमार करना नामुमकिन है।


(((- ख़ुदा जानता है के ज़िन्दगी की इससे हसीनतर ताबीर नहीं हो सकती है के इन्सान ज़िन्दगी के प्रोग्राम बनाता ही रह जाता है और मौत सामने आकर खड़ी हो जाती है, ऐसा मालूम होता है के घोड़े ने दम भरने का इरादा ही किया था के मन्ज़िल क़दमों में आ गई और सारे हौसले धरे रह गये। ज़ाहिर है के इस ज़िन्दगी की क्या हक़ीक़त है के जिसकी मीआद मुअय्यन है और वह भी ज़्यादा तवील नहीं है और हर हाल में पूरी हो जाने वाली है चाहे इन्सान मुतवज्जोह हो या ग़ाफ़िल, और चाहे उसे पसन्द करे या नापसन्द।)))