ख़ुत्बात  
  98- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें बनी उमय्या के मज़ालिम की तरफ़ इषारा किया गया है)


ख़ुदा की क़सम, यह यूँ ही ज़ुल्म करते रहेंगे यहां तक के कोई हराम न बचेगा जिसे हलाल न बना लें और कोई अहद व पैमान न बचेका जिसे तोड़ न दें और कोई मकान या ख़ेमा बाक़ी न रहेगा जिसमें इनका ज़ुल्म दाखि़ल न हो जाए और उनका बदतरीन बरताव उन्हें तर्के वतन पर आमादा न कर दे और दोनों तरह के लोग रोने पर आमादा न हो जाएं। दुनियादार अपनी दुनिया के लिये रोए और दीनदार अपने दीन की तबाही पर आँसू बहाए, और तुममें एक का दूसरे से मदद तलब करना उसी तरह हो जिस तरह के ग़ुलाम आक़ा से मदद तलब करे के सामने आ जाए तो इताअत करे और ग़ायब हो जाए तो ग़ीबत करे। और तुममें सबसे ज़्यादा मुसीबतज़दा वह हो जो ख़ुदा पर सबसे ज़्यादा एतमाद रखने वाला हो, लेहाज़ा अगर ख़ुदा तुम्हें आफ़ियत दे तो उसक क़ुबूल कर लो, और अगर तुम्हारा इम्तेहान लिया जाए तो सब्र करो के अन्जामकार बहरहाल साहेबाने तक़वा के लिये है।


(((- दुनिया के हर ज़ुल्म के मुक़ाबले में साहबाने ईमान व किरदार के लिये यही बषारत काफ़ी है के अन्जामकार साहबाने तक़वा के हाथ में है और इस दुनिया की इन्तेहाई फ़साद और तबाहकारी पर होने वाली नहीं है बल्कि उसे एक न एक दिन बहरहाल अद्ल व इन्साफ़ से मामूर होना है। उस दिन हर ज़ालिम को उसके ज़ुल्म का अन्दाज़ा हो जाएगा और हर मज़लूम को उसके सब्र का फल मिल जाएगा। मालिके कायनात की यह बषारत न होती तो साहेबाने ईमान के हौसले पस्त हो जाते और उन्हें हालाते ज़माना मायूसी का षिकार बना देते लेकिन इस बषारत ने हमेषा उनके हौसलों को बलन्द रखा है और इसी की बुनियाद पर वह हर दौर में हर ज़ालिम से टकराने का हौसला रखे रहे हैं।)))