ख़ुत्बात  
  96-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा


(हज़रत रब्बुल आलमीन और रसूले अकरम (स0) के सिफ़ात के बारे में)


तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जो ऐसा अव्वल है के उससे पहले कोई “ाय नहीं है और ऐसा आखि़र है के इसके बाद कोई “ौ नहीं है, वह ज़ाहिर है तो इससे माफ़ूक़ (बालातर) कुछ नहीं है और बातिन है तो इससे क़रीबतर कोई “ाय नहीं है। इसी ख़ुत्बे के ज़ैल में (रसूले अकरम (स0)) का ज़िक्र फ़रमाया। बुज़ुर्गी और “ाराफ़त के मादनों और पाकीज़गी की जगहों में इनका मुक़ाम बेहतरीन मुक़ाम और मरजियोम बेहतरीन मरज़ियोम है। उनकी तरफ़ नेक लोगों के दिल झुका दिये गए हैं और निगाहों के रूख़ मोड़ दिये गए हैं। ख़ुदा ने इनकी वजह से फ़ित्ने दबा दिये और (अदावतों के) “ाोले बुझा दिये भाइयों में उलफ़त पैदा की और जो (कुफ्ऱ में) इकट्ठे थे, उन्हें मुन्तषिर (अलहदा-अलहदा) कर दिया (इस्लाम की) पस्ती व ज़िल्लत को इज़्ज़त बख़्षी, और (कुफ्ऱ) की इज्ज़त व बुलन्दी को ज़लील कर दिया। इनका कलाम (षरीयत का) बयान और सुकूत (एहकाम की) ज़बान थी।


(((ओलमाए उसूल की ज़बान में मासूम की ख़ामोषी तक़रीर से ताबीर किया जाता है और वह उसी तरह हुज्जत और मुदरक एहकाम है जिस तरह मासूम का क़ौल व अमल। वह सनद की हैसियत रखता है और उससे एहकामे “ारीअत का इस्तनबात व इस्तख़राज किया जाता है। आम इन्सानों की ख़ामोषी दलीले रज़ामन्दी नहीं बन सकती है लेकिन मासूम की ख़ामोषी दलीले एहकाम भी बन जाती है।)))