ख़ुत्बात  
  89- आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा
(रसूले अकरम (स0) और तबलीग़े इमाम के बारे में)


अल्लाह ने उन्हें उस दौर में भेजा जब रसूलों का सिलसिला मौक़ूफ़ और उम्मतें ख़्वाबे ग़फ़लत में पड़ी हुई थीं। फ़ितने सर उठाए हुए थे और जुमला उमूर में एक इन्तेषार की कैफ़ियत थी और जंग के “ाोले भड़क रहे थे। दुनिया की रोषनी कजलाई हुई थी और उसका फ़रेब वाज़ेह था। बाग़े ज़िन्दगी के पत्ते ज़र्द हो गए थे और समराते हयात से मायूसी पैदा हो चली थी, पानी भी तहनषीन हो चुका था और हिदायत के मिनारे भी मिट गए थे और हलाकत के निषानात भी नुमायां थे। यह दुनिया अपने अहल को तर्ष रोई से देख रही थी और अपने तलबगारों के सामने मुंह बिगाड़ कर पेष आ रही थी। इसका समरा फ़ितना था और इसकी ग़िज़ा मुरदार। इसका अन्दरूनी लिबास ख़ौफ़ था और बैरूनी लिबास तलवार। लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा तुम इबरत हासिल करो और उन हालात को याद करो जिनमें तुम्हारे बाप दादा और भाई बन्दे गिरफ़्तार हैं और इनका हिसाब दे रहे हैं।
मेरी जान की क़सम- अभी इनके और तुम्हारे दरम्यान ज़्यादा ज़माना नहीं गुज़रा है और न सदियों का फ़ासला हुआ है और न आज का दिन कल के दिन से ज़्यादा दूर है जब तुम उन्हीं बुज़ुर्गों के सल्ब में थे।
ख़ुदा की क़सम रसूले अकरम (स0) ने तुम्हें कोई ऐसी बात नहीं सुनाई है जिसे आज मैं नहीं सुना रहा हूँ और तुम्हारे कान भी कल के कान से कम नहीं हैं और जिस तरह कल उन्होंने लोगों की आंखें खोल दी थीं और दिल बना दिये थे वैसे ही आज मैं भी तुम्हें वह सारी चीज़ें दे रहा हूँ और ख़ुदा गवाह है के तुम्हें कोई ऐसी चीज़ नहीं दिखलाई जा रही है जिससे तुम्हारे बुज़ुर्ग नावाक़िफ़ थे और न कोई ऐसी ख़ास बताई जा रही है जिससे वह महरूम रहे हों और देखो तुम पर एक मुसीबत नाज़िल हो गई है उस ऊंंटनी के मानिन्द जिसकी नकेल झूल रही हो और जिसका तंग ढीला हो गया हो लेहाज़ा ख़बरदार तुम्हें पिछले फ़रेबख़ोर्दा लोगों की ज़िन्दगी धोके में न डाल दे के यह इष्क़े दुनिया एक फैला हुआ साया है जिसकी मुद्दत मुअय्यन है और फिर सिमट जाएगी।