ख़ुत्बात  
  87-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा
(जिसमें मुत्तक़ीन और फ़ासेक़ीन के सिफ़ात का तज़किरा किया गया है और लोगों को तम्बीह की गई है)
बन्दगाने ख़ुदा! अल्लाह की निगाह में सबसे महबूब बन्दा वह है जिसकी ख़ुदा ने उसके नफ़्स के खि़लाफ़ मदद की है और उसने अन्दर लिबासे हुज़्न और बाहर ख़ौफ़ का लिबास पहन लिया है। (यानी अन्दोह व मलाल उसे चिमटा रहता है और ख़ौफ़ उस पर छाया रहता है) उसके दिल में हिदायत का चिराग़ रौषन है और उसने आने वाले दिन की मेहमानी का इन्तेज़ाम कर लिया है। अपने नफ़्स के लिये आने वाले बईद (मौत) को क़रीब कर लिया है और सख़्त मरहले को आसान कर लिया है, देखता है तो बसीरत व मारेफ़त पैदा की है और ख़ुदा को याद किया है तो अमल में कसरत पैदा की है। हिदायत के इस चष्मए “ाीरीं व ख़ुषगवार से सेराब हो गया है जिस के घाट पर (अल्लाह की रहनुमाई ने) वारिद होने को आसान बना दिया गया है, जिसके नतीजे में ख़ूब छक कर पी लेता है और सीधे रास्ते पर चल पड़ा है। ख़्वाहिषात के लिबास को जुदा कर दिया है और तमाम अफ़कार से आज़ाद हो गया है। सिर्फ़ एक फ़िक्रे आख़ेरत बाक़ी रह गई है जिसके ज़ेरे असर गुमराही की मन्ज़िल से निकल आया है और अहले हवा व हवस की षिरकत (हवस परस्तों की हवसरानियों) से दूर हो गया है। हिदायत के दरवाज़े की कलीद बन गया है और गुमराही के दरवाज़ों का क़फ़ल बन गया है। अपने रास्ते को देख लिया है और उसी पर चल पड़ा है। हिदायत के मिनारे को पहचान लिया है और गुमराहियों के धारे को तय कर लिया है। मज़बूत तरीन वसीले से वाबस्ता हो गया है और मोहकमतरीन रस्सी को पकड़ लिया है इसलिये के वह अपने यक़ीन में बिलकुल नूर आफताब जैसी रौषनी रखता है। अपने नफ़्स को बलन्दतरीन उमूर की ख़ातिर राहे ख़ुदा में आमादा कर लिया है के हर आने वाले के मसले को हल कर देगा और फ़ुरूअ को उनकी असल की तरफ़ पलटा देगा। वह तारीकियों का चिराग़ है और अन्धेरों का रौषन करने वाला मुष्तबा बातों को हल करने वाला, उलझे हुए मसलों को सुलझाने वाला, मुष्किलात का दफ़ा करने वाला और फिर सहराओं में रहनुमाई करने वाला। वह बोलता है तो बात को समझा लेता है और चुप रहता है तो सलामती का बन्दोबस्त कर लेता है। उसने अल्लाह से इख़लास बरता है तो अल्लाह ने उसे अपना बन्द-ए मुख़लिस बना लिया है। अब वह दीने ख़ुदा का मअदन है और ज़मीने ख़ुदा का कारकुन आज़म। इसने अपने नफ़्स के लिये अद्ल को लाज़िम क़रार दे लिया है और इसके अद्ल की पहली मन्ज़िल यह है के ख़्वाहिषात को अपने नफ़्स से दूर कर दिया है और अब हक़ ही को बयान करता है और उसी पर अमल करता है। नेकी की कोई मन्ज़िल ऐसी नहीं है जिसका क़स्द न करता हूँ और कोई ऐसा एहतेमाल नहीं है जिसका इरादा न रखता हो। अपने उमूर की ज़माम किताबे ख़ुदा के हवाले कर दी है और अब वही उसकी क़ायद और पेषवा है जहाँ इसका सामान उतरतर है वहीं वारिद हो जाता है और जहां इसकी मंज़िल होती है वहीं पड़ाव डाल देता है।
इसके बरखि़लाफ़ एक “ाख़्स वह भी है जिसने अपना नाम आलिम रख लिया है हालांके इल्म से कोई वाबस्ता नहीं है। जाहिलों से जेहालत को हासिल किया है और गुमराहों से गुमराही को। लोगों के वास्ते धोका के फन्दे और मक्रो फ़रेब के जाल बिछा दिये हैं। किताब की तावील अपनी राय के मुताबिक़ की है और हक़ को अपने ख़्वाहिषात की तरफ़ मोड़ दिया है। लोगों को बड़े-बड़े जरायम की तरफ़ से महफ़ूज़ बनाता है और उनके लिये गुनाहाने कबीरा को भी आसान बना देता है। कहता यही है के मैं “ाुबहात के मवाक़े पर तवक़फ़ करता हूं लेकिन वाक़ेअन इन्हीं में गिर पड़ता है और फिर कहता है के मैं बिदअतों से अलग रहता हूं हालांके उन्हीं के दरमियान उठता बैठता है।
इसकी सूरत इन्सानों जैसी है लेकिन दिल जानवरों जैसा है। न हिदायत के दरवाज़े को पहुंचता है के इसका इत्तेबाअ करे और न गुमराही के रास्ते को जानता है के इससे अलग रहे, यह दर हक़ीक़त एक चलती फिरती मय्यत है और कुछ नहीं है।
तो आखि़र तुम लोग किधर जा रहे हो और तुम्हें किस सिम्त मोड़ा जा रहा है? जबके निषानात क़ायम रहते हैं और आयात वाज़ेअ हैं। मिनारे नसब के लिये जा चुके हैं और तुम्हें भटकाया जा रहा है और तुम भटके जा रहे हो। देखो तुम्हारे दरम्यान तुम्हारे नबी की इतरत मौजूद है। यह सब हक़ के ज़मामदार दीन के परचम और सिदाक़त के तरजुमान हैं। उन्हें क़ुरआने करीम की बेहतरीन मन्ज़िल पर जगह दो और उनके पास इस तरह वारिद हो जिस तरह प्यासे ऊँट चष्मे पर वारिद होते हैं।
लोगों! हज़रत ख़ातेमुन्नबीयीन (अ0) के इस इरषादे गिरामी पर अमल करो के ‘‘हमारा मरने वाला मय्यत नहीं होता है और हममें से कोई मुरदर ज़माने से बोसीदा नहीं होता है।’’ ख़बरदार वह न कहो जो तुम नहीं जानते हो। इसलिये के बसाऔक़ात हक़ इसी में होता है जिसे तुम नहीं पहचानते हो और जिसके खि़लाफ़ तुम्हारे पास कोई दलील नहीं है उसके उज़्र को क़ुबूल कर लो और वह मैं हँू। क्या मैंने सक़ल अकबर क़ुरान पर अमल नहीं किया है और क्या सक़ले असग़र अहलेेबैत (अ0) को तुम्हारे दरम्यान नहीं रखा है। मैंने तुम्हारे दरम्यान ईमान के परचम को नस्ब कर दिया है और तुम्हें हलाल व हराम के हुदूद से आगाह कर दिया है। अपने अद्ल की बिना पर तुम्हें लिबास आफ़ियत बिछाना है और अपने क़ौलो फ़ेल की नेकियों को तुम्हारे लिये फ़र्ष कर दिया है और तुम्हें अपने बलन्द तरीन एख़लाक़ का मन्ज़र दिखला दिया है। लेहाज़ा ख़बरदार जिस बात की गहराई तक निगाहें नहीं पहुंच सकती हैं और जहां तक फ़िक्र रसाई नहीं है इसमें अपनी राय को इस्तेमाल न करना।


ग़लतफ़हमी


(बनी उमय्या के मज़ालिम ने इस क़द्र दहषतज़दा बना दिया है के बाज़ लोग ख़याल कर रहे हैं के दुनिया बनी उमय्या के दामन से बान्धी दी गई है। उन्हीं को अपने फ़वाएद से फ़ैज़याब करेगी और वही इसके चष्मे पर वारिद होते रहेंगे और अब इस उम्मत के सर से उनके ताज़याने और तलवारें उठ नहीं सकती हैं। हालांके यह ख़याल बिलकुल ग़लत है। यह हुकूमत फ़क़त एक लज़ीज़ क़िस्म का आबे दहन है जिसे थोड़ी देर चूसेंगे और फिर ख़ुद ही थूक देंगे।)