ख़ुत्बात  
  85- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें परवरदिगार के आठ सिफ़ात का तज़किरा किया गया है)


मैं गवाही देता हूँ के अल्लाह के अलावा कोई ख़ुदा नहीं है, वह अकेला है इसका कोई “ारीक नहीं है, वह ऐसा अव्वल है जिससे पहले कुछ नहीं है और ऐसा आखि़र है जिसकी कोई हद मुअय्यन नहीं है। ख़यालात उसकी किसी सिफ़त का इदराक नहीं कर सकते हैं और दिल इसकी कोई कैफ़ियत तय नहीं कर सकता है। इसकी ज़ात के न अजज़ा हैं और न टुकड़े और न वह दिल व निगाह के अहाते के अन्दर आ सकता है।
बन्दगाने ख़ुदा! मुफ़ीद इबरतों से नसीहत हासिल करो और वाज़े निषानियों से इबरत को बलीग़ डराने वाली चीज़ों से असर क़ुबूल करो और ज़िक्र व मौअज़त से फ़ायदा हासिल करो। यह समझो के गोया मौत अपने पन्जे तुम्हारे अन्दर गाड़ चुकी है और उम्मीदों के रिष्ते तुमसु मुनक़ता हो चुके हैं और दहषतनाक हालात ने तुम पर हमला कर दिया है और आख़री मन्ज़िल की तरफ़ ले जाने का अमल “ाुरू हो चुका है। याद रखो के ‘‘हर नफ़्स के साथ एक हँकाने वाला है और एक गवाह रहता है’’, हँकाने वाला क़यामत की तरफ़ खींच कर ले जा रहा है और गवाही देने वाला आमाल की निगरानी कर रहा है।
सिफ़ाते जन्नत
इसके दरजात मुख़्तलिफ़ और इसकी मन्ज़िलें पस्त व बलन्द हैं लेकिन इसकी नेमतें ख़त्म होने वाली नहीं हैं और इसके बाषिन्दों को कहीं और कूच करना नहीं है। इसमें हमेषा रहने वाला भी बूढ़ा नहीं होता है और इसके रहने वालों की फ़क्ऱ व फ़ाक़े से साबक़ा नहीं पड़ता है।

((( बाज़ औक़ात यह ख़याल पैदा होता है के जब जन्नत में हर नेमत का इन्तेज़ाम है और वहां की कोई ख़्वाहिष मुस्तर्द नहीं हो सकती है तो इन दरजात का फ़ायदा ही क्या है, पस्त मन्ज़िल वाला जैसे ही बलन्द मन्ज़िल की ख़्वाहिष करेगा वहां पहुंच जाएगा और यह सब दरजात बेकार होकर रह जाएंगे। लेकिन इसका वाज़ेअ सा जवाब यह है के जन्नत उन लागांे का मुक़ाम नहीं है जो अपनी मन्ज़िल न पहचानते हों और अपनी औक़ात से बलन्दतर जगह की हवस रखते हों। हवस का मक़ाम जहन्नम है जन्नत नहीं है। जननत वाले अपने मक़ामात को पहचानते हैं। यह और बात है के बलन्द मक़ामात वालों के ख़ादिम और नौकर हैं तो खि़दमत के सहारे दीगर नौकरों की तरह बलन्द मनाज़िल तक पहुंच जाएं जिसकी तरफ़ इमाम (अ0) ने इषारा फ़रमाया है के ‘‘हमारे षिया हमारे साथ जन्नत में हमारे दर्जे में होंगे।’’)))