ख़ुत्बात  
  79-आपका इरषादे गिरामी
(जब जंगे ख़वारिज के लिये निकलते वक़्त बाज़ असहाब ने कहा के अमीरूल मोमेनीन (अ0) इस सफ़र के लिये कोई दूसरा वक़्त इख़्तेयार फ़रमाएं। इस वक़्त कामयाबी के इमकानात नहीं हैं के इल्मे नुजूम के हिसाबात से यही अन्दाज़ा होता है।)


क्या तुम्हारा ख़याल यह है के तुम्हें वह साअत मालूम है जिसमें निकलने वाले से बलाएं टल जाएंगी और तुम उस साअत से डराना चाहते हो जिसमें सफ़र करने वाला नुक़सानात में घिर जाएगा? याद रखो जो तुम्हारे इस बयान की तस्दीक़ करेगा वह क़ुरान की तकज़ीब करने वाला होगा और महबूब अष्याअ के हुसूल और नापसन्दीदा उमूर के दफ़ा करने में मददे ख़ुदा से बे नियाज़ हो जाएगा। क्या तुम्हारी ख़्वाहिष यह है के तुम्हारे अफ़आल के मुताबिक़ अमल करने वाला परवरदिगार के बजाए तुम्हारी ही तारीफ़ करे इसलिये के तुमने अपने ख़याल में उसे उस साअत का पता बता दिया है जिसमें मनफ़अत हासिल की जाती है और नुक़सानात से महफ़ूज़ रहा जाता है।
अय्योहन्नास! ख़बरदार नुजूम का इल्म मत हासिल करो मगर उतना ही जिससे बरोबहर में रास्ते दरयाफ़्त किये जा सकें। के यह इल्म कहानत की तरफ़ ले जाता है और मुनज्जिम भी एक तरह का काहन (ग़ैब की ख़बर देने वाला) हो जाता है जबके काहन जादूगर जैसा होता है और जादूगर काफ़िर जैसा होता है और काफ़िर का अन्जाम जहन्नम है। चलो, नामे ख़ुदा लेकर निकल पड़ो।


(((वाज़ेह रहे के इल्मे नुजूम हासिल करने से मुराद उन असरात व नताएज का मालूम करना है जो सितारों की हरकात के बारे में इस इल्म के मुद्दई हज़रात ने बयान किये हैं वरना असल सितारों के बारे में मालूमात हासिल करना कोई ऐब नहीं है। इससे इन्सान के ईमान व अक़ीदे में भी इस्तेहकाम पैदा होता है और बहुत से दूसरे मसाएल भी हल हो जाते हैं और सितारों का वह इल्म जो उनके हक़ीक़ी असरात पर मबनी है एक फ़ज़्ल व “ारफ़ है और इल्मे परवरदिगार का एक “ाोबा है वह जिसे चाहता है इनायत कर देता है।
इमाम अलैहिस्सलाम ने अव्वलन इल्मे नजूम को कहानत का एक “ाोबा क़रार दिया के ग़ैब की ख़बर देने वाले अपने अख़बार के मुख़्तलिफ़ माख़ज़ व मदारक बयान करते हैं। जिनमें से एक इल्मे नजूम भी है। इसके बाद ज बवह ग़ैब की ख़बर में बयान कर देते हैं तो उन्हें क़ब्रों के ज़रिये इन्सान के दिल व दिमाग़ पर मुसल्लत हो जाना चाहते हैं जो जादूगरी का एक “ाोबा है और जादूगरी इन्सान को यह महसूस कराना चाहती है के इस कायनात में अमल दख़ल हमारा ही है और इस जादू का चढ़ाना और उतारना हमारे ही बस का काम है, दूसरा कोई यह कारनामा अन्जाम नहीं दे सकता है और इसी का नाम कुफ्ऱ है।)))