ख़ुत्बात  
  77- आपका इरषादे गिरामी
(जब सईद बिन अलआस ने आपको आपके हक़ से महरूम कर दिया)


यह बनी उमय्या मुझे मीरासे पैग़म्बर (स0) को भी थोड़ा थोड़ा करके दे रहे हैं हालांके अगर मैं ज़िन्दा रह गया तो इस तरह झाड़ कर फेंक दूंगा जिस तरह क़साब गोष्त के टुकड़े से मिट्टी को झाड़ देता है।
सय्यद रज़ी- बाज़ रिवायात में ‘‘वज़ाम तरबा’’ के बजाए ‘‘तराबुल वज़मा’’ है जो मानी के एतबार से मअकूस तरकीब है। ‘‘लैफ़ू क़ूननी’’ का मफ़हूम है माल का थोड़ा थोड़ा करके देना जिस तरह ऊँट का दूध निकाला जाता है। फवाक़ ऊँट का एक मरतबा का दुहा हुआ दूध है और वज़ाम वज़मा की जमा है जिसके मानी टुकड़े के हैं यानी जिगर या आँतों का वह टुकड़ा जो ज़मीन पर गिर जाए।


(((इसमें कोई “ाक नहीं है के रहमते इलाही का दाएरा बेहद वसीअ है और मुस्लिम व काफ़िर, दीनदार व बेदीन सबको “ाामिल है। यह हमेषा ग़ज़बे इलाही से आगे-आगे चलती है। लेकिन रोज़े क़यामत इस रहमत का इस्तेहक़ाक़ आसान नहीं है। वह हिसाब का दिन है और ख़ुदाए वाहिद क़हार की हुकूमत का दिन है। लेहाज़ा उस दिन रहमते ख़ुदा के इस्तेहक़ाक़ के लिये इन तमाम चीज़ों को इख़्तेयार करना होगा जिनकी तरफ़ मौलाए कायनात ने इषारा किया है और इनके बग़ैर रहमतुल लिल आलमीन का कलमा और इनकी मोहब्बत का दावा भी काम नहीं आ सकता है। दुनिया के एहकाम अलग हैं और आख़ेरत के एहकाम अलग हैं। यहां का निज़ामे रहमत अलग है और वहां का निज़ामे मकाफ़ात व मजाज़ात अलग।
कितनी हसीन तष्बीह है के बनी असया की हैसियत इस्लाम में न जिगर की है न मेदे की और न जिगर के टुकड़े की। यह वह गर्द हैं जो अलग हो जाने वाले कपड़े से पहले चिपक जाती है लेकिन गोष्त का इस्तेमाल करने वाला इसे भी बरदाष्त नहीं करता है और इसे झाड़ने के बाद ही ख़रीदार के हवाले करता है ताके दुकान बदनाम न होने पाए, और ताजिर नातजुर्बेकार और बदज़ौक़ न कहा जा सके।)))