ख़ुत्बात  
  75- आपका इरषादे गिरामी
(जब आपको ख़बर मिली के बनी उमय्या आप पर ख़ूने उस्मान का इल्ज़ाम लगा रहे हैं)


क्या बनी उमय्या के वाक़ई मालूमात उन्हें मुझ पर इल्ज़ाम तराषी से नहीं रोक सके और क्या जाहिलों को मेरे कारनामे इस इत्तेहाम से बाज़ नहीं रख सके? यक़ीनन परवरदिगार ने तोहमत व अफतरा के खि़लाफ़ जो नसीहत फ़रमाई है वह मेरे बयान से कहीं ज़्यादा बलीग़ है। मैं बहरहाल इन बेदीनों पर हुज्जत तमाम करने वाला, इन अहद षिकन मुब्तिलाए तषकीक अफ़राद का दुष्मन हूँ, और तमाम मुष्तबा मामलात को किताबे ख़ुदा पर पेष करना चाहिये और रोज़े क़यामत बन्दों का हिसाब उनके दिलों के मज़मरात (नीयतों) ही पर होगा।


((( आले मोहम्मद (स0) के इस किरदार का तारीख़े कायनात में कोई जवाब नहीं है, इन्होंने हमेषा फ़ज़्लो करम से काम लिया है। हद यह है के अगर माज़ल्लाह इमाम हसन (अ0) व इमाम हुसैन (अ0) की सिफ़ारिष को मुस्तक़बिल के हालात से नावाक़फ़ीयत भी तसव्वुर कर लिया जाए तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ0) के तर्ज़े अमल को क्या कहा जा सकता है जिन्होंने वाक़ेअन करबला के बाद भी मरवान के घरवालों को पनाह दी है और इस बेहया ने हज़रत से पनाह की दरख़्वास्त की है।
दरहक़ीक़त यह भी यहूदियत की एक “ााख़ है के वक़्त पड़ने पर हर एक के सामने ज़लील बन जाओ और काम निकलने के बाद परवरदिगार की नसीहतों की भी दरहक़ीक़त परवाह न करो। अल्लाह दीने इस्लाम को हर दौर की यहूदियत से महफ़ूज़ रखे।
अमीरूल मोमेनीन (अ0) का मक़सद यह है के खि़लाफ़त मेरे लिये किसी हदफ़ और मक़सदे हयात का मरतबा नहीं रखती है। यह दरहक़ीक़त आम इन्सानियत के लिये सुकून व इत्मीनान फ़राहम करने का एक ज़रिया है। लेहाज़ा अगर यह मक़सद किसी भी ज़रिये से हासिल हो गया तो मेरे लिये सुकूत जाएज़ हो जाएगा और मैं अपने ऊपर ज़ुल्म बरदाष्त कर लूंगा।
दूसरा फ़िक़रा इस बात की दलील है के बातिल खि़लाफ़त से मुकम्मल अद्ल व इन्साफ़ और सुकून व इत्मीनान की तवक़्क़ो मुहाल है लेकिन मौलाए कायनात (अ0) का मनषा यह है के अगर ज़ुल्म का निषाना मेरी ज़ात होगी तो बरदाष्त करूंगा लेकिन अवामुन्नास होंगे और मेरे पास माद्दी ताक़त होगी तो हरगिज़ बरदाष्त न करूंगा के यह अहदे इलाही के खि़लाफ़ है।)))