ख़ुत्बात  
  72- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें लोगों को सलवात की तालीम दी गई है और सिफ़ाते ख़ुदा और रसूल (स0) का ज़िक्र किया गया है)


ऐ ख़ुदा! ऐ फ़र्षे ज़मीन के बिछाने वाले और बलन्दतरीन आसमानों को रोकने वाले और दिलों को इनकी नेक बख़्त या बदबख़्त फ़ितरतों पर पैदा करने वाले, अपनी पाकीज़ा तरीन और मुसलसल बढ़ने वाले बरकात को अपने बन्दे और रसूल हज़रत मोहम्मद (स0) पर क़रार दे जो सिलसिलए नबूवतों के ख़त्म करने वाले दिलो दिमाग़ के बन्द दरवाज़ों को खोलने वाले, हक़ के ज़रिये हक़ का एलान करने वाले, बातिल के जोष व ख़रोष को दफ़ा करने वाले और गुमराहियों के हमलों का सर कुचलने वाले थे। जो बार जिस तरह इनके हवाले किया गया उन्होंने उठा लिया। तेरे अम्र के साथ क़याम किया। तेरी मर्ज़ी की राह में तेज़ क़दम बढ़ाते रहे, न आगे बढ़ने से इनकार किया और न इनके इरादों में कमज़ोरी आई। तेरी वही को महफ़ूज़ किया तेरे अहद की हिफ़ाज़त की, तेरे हुक्म के निफ़ाज़ की राह में बढ़ते रहे यहां तक के रोषनी की जुस्तजू करने वालों के लिये आगणन रौषन कर दी और कुम करदा राह के लिये रास्ता वाज़ेह कर दिया। इनके ज़रिये दिलों ने फ़ितनों और गुनाहों में ग़र्क़ रहने के बाद भी हिदायत पा ली और इन्होंने रास्ता दिखाने वाले निषानात और वाज़ेह एहकाम क़ायम कर दिये। वह तेरे अमानतदार बन्दे, तेरे पोषीदा उलूम के ख़ज़ानादार, रोज़े क़यामत के लिये तेरे राहे हक़ के साथ भेजे हुए और मख़लूक़ात की तरफ़ तेरे नुमाइन्दे थे।
ख़ुदाया इनके लिये अपने सायए रहमत में वसीअतरीन मन्ज़िल क़रार दे दे और इनके ख़ैर को अपने फ़ज़्ल से दुगना, चैगना कर दे। ख़ुदाया इनकी इमारत को तमाम इमारतों से बलन्दतर और इनकी मन्ज़िल को अपने पास बुज़ुर्गतर बना दे। इनके नूर की तकमील फ़रमा और असरे रिसालत के सिले में इन्हें मक़बूल “ाहादत और पसन्दीदा अक़वाल का इनआम इनायत कर के इनकी गुफ़्तगू हमेषा आदिलाना और इनका फ़ैसला हमेषा हक़ व बातिल के दरमियान हदे फ़ासिल रहा है। ख़ुदाया हमें इनके साथ ख़ुषगवार ज़िन्दगी, नेमात की मन्ज़िल, ख़्वाहिषात व लज़्ज़ात की तकमील के मरकज़, आराइष व तमानत के मुक़ाम और करामत व “ाराफ़त के तोहफ़ों की मन्ज़िल पर जमा कर दे।


(((यह इस्लाम का मख़सूस फ़लसफ़ा है जो दुनियादारी के किसी निज़ाम में नहीं पाया जाता है। दुनियादारी का मषहूर व मारूफ़ निज़ाम व उसूल यह है के मक़सद हर ज़रिये को जाएज़ बना देता है। इन्सान को फ़क़त यह देखना चाहिये के मक़सद सही और बलन्द हो। इसके बाद इस मक़सद तक पहुंचने के लिये कोई भी रास्ता इख़्तेयार कर ले इसमें कोई हर्ज और मुज़ाएक़ा नहीं है लेकिन इसलाम का निज़ाम इससे बिल्कुल मुख़्तलिफ़ है, वह दुनिया में मक़सद और मज़हब दोनों का पैग़ाम लेकर आया है।
इसने ‘‘इन्नद्दीन’’ कहकर एलान किया है के इस्लाम तरीक़ाए हयात है और ‘‘इन्दल्लाह’’ कहकर वाज़ेह किया है के इसका हदफ़ हक़ीक़ी ज़ात परवरदिगार है। लेहाज़ा वह न ग़लत मक़सद को मक़सद क़रार देने की इजाज़त दे सकता है और न ग़लत रास्ते को रास्ता क़रार देने की। इसका मन्षा यह है के इसके मानने वाले सही रास्ते पर चलें और इसी रास्ते के ज़रिये मन्ज़िल तक पहुंचें। चुनांचे मौलाए कायनात ने सरकारे दो आलम (स0) की इसी फ़ज़ीलत की तरफ़ इषारा किया है के जब आपने जाहेलीयत के नक़्क़ारख़ाने में आवाज़े हक़ बलन्द की है लेकिन इस आवाज़ को बलन्द करने का तरीक़ा और रास्ता भी सही इख़्तेयार किया है वरना जाहेलीयत में आवाज़ बलन्द करने का एक तरीक़ा यह भी था के इस क़द्र “ाोर मचाओ के दूसरे की आवाज़ न सुनाई दे। इस्लाम ऐसे अहमक़ाना अन्दाज़े फ़िक्र की हिमायत नहीं कर सकता है। वह अपने फातेहीन से भी यही मुतालेबा करता है के हक़ का पैग़ाम हक़ के रास्ते से पहुंचाओ, ग़ारतगिरी और लूटमार के ज़रिये नहीं। यह इस्लाम की पैग़ाम रसानी नहीं है। ख़ुदा और रसूल (स0) के लिये ईज़ारसानी है जिसका जुर्म इन्तेहाई संगीन है और इसकी सज़ा दुनिया व आख़ेरत दोनों की लानत है।))