ख़ुत्बात  
  71-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(अहले इराक़ की मज़म्मत के बारे में)


अम्माबाद! ऐ एहले ईराक़ ! बस तुम्हारी मिसाल उस हामला औरत की है जो 9 माह तक बच्चे को षिकम में रखे और जब विलादत का वक़्त आए तो साक़ित कर दे और फिर उसका “ाौहर भी मर जाए और ब्योगी की मुद्दत भी तवील हो जाए के क़रीब का कोई वारिस न रह जाए और दूर वाले वारिस हो जाएं।
ख़ुदा गवाह है के मैं तुम्हारे पास अपने इख़्तेदार से नहीं आया हूं बल्के हालात के जब्र से आया हूं और मुझे यह ख़बर मिली है के तुम लोग मुझ पर झूट का इल्ज़ाम लगाते हो। ख़ुदा तुम्हें ग़ारत करे। मैं किसके खि़लाफ़ ग़लत बयानी करूंगा?
ख़ुदा के खि़लाफ़ ? जबके मैं सबसे पहले उस पर ईमान लाया हूँ।
या रसूले ख़ुदा के खि़लाफ़? जबके मैंने सबसे पहले उनकी तस्दीक़ की है।
ळरगिज़ नहीं! बल्कि यह बात ऐसी थी जो तुम्हारी समझ से इसके अहल नहीं थे। ख़ुदा तुमसे समझे। मैं तुम्हें जवाहर पारे नाप नाप कर दे रहा हूँ और कोई क़ीमत नहीं मांग रहा हूँ। मगर ऐ काष तुम्हारे पास इसका ज़र्फ़ होता। और अनक़रीब तुम्हें इसकी हक़ीक़त मालूम हो जाएगी।



(((दहवल अर्ज़ के बारे में दो तरह के तसव्वुरात पाए जाते हैं। बाज़ हज़रात का ख़याल है के ज़मीन को आफ़ताब से अलग करके फ़िज़ाए बसीत में लुढ़का दिया गया और इसी का नाम दहवल अर्ज़ है और बाज़ हज़रात का कहना है के दहव के मानी फ़र्ष बिछाने के हैं। गोया के ज़मीन को हमवार बनाकर क़ाबिले सुकूनत बना दिया गया और यही दहवल अर्ज़ है। बहरहाल रिवायात में इसकी तारीख़ 25 ज़ीक़ादा बताई गई है जिस तारीख़ को सरकारे दो आलम (स0) हुज्जतुलविदा के लिये मदीने से बरामद हुए थे और तख़लीक़े अर्ज़ की तारीख़ मक़सदे तख़लीक़ से हमआहंग हो गई थी। इस तारीख़ में रोज़ा रखना बेपनाह सवाब का हामिल है और यह तारीख़ साल के उन चार दिनों में “ाामिल है जिसका रोज़ा अज्र बेहिसाब रखता है।
25 ज़ीक़ादा, 17 रबीउल अव्वल, 27 रजब और 18 ज़िलहिज्जा
ग़ौर कीजिये तो यह निहायत दरजए हसीन इन्तेख़ाबे क़ुदरत है के पहला दिन वह है जिसमें ज़मीन का फ़र्ष बिछाया गया, दूसरा दिन वह है जब मक़सदे तख़लीक़ कायनात को ज़मीन पर भेजा गया, तीसरा दिन वह है जब इसके मन्सब का एलान करके इसका काम “ाुरू कराया गया और आखि़री दिन वह है जब इसका काम मुकम्मल हो गया और साहबे मन्सब को ‘‘अकमलतो लकुम दीनेकुम’’ की सनद मिल गई।)))