ख़ुत्बात  
  70-आपका इरषादे गिरामी
(उस सहर के हंगाम जब आपके सरे अक़दस पर ज़रबत लगाई गई)


अभी मैं बैठा हुआ था के अचानक आंख लग गई और ऐसा महसूस हुआ के रसूले अकरम (स0) के सामने तषरीफ़ फ़रमा हूँ। मैंने अर्ज़ की के मैंने आपकी उम्मत से बेपनाह कजरवी और दुष्मनी का मुषाहेदा किया है, फ़रमाया के बददुआ करो?
तो मैंने यह दुआ की ख़ुदाया मुझे इनसे बेहतर क़ौम दे दे और इन्हें मुझसे सख़्ततर रहनुमा दे दे।


(((यह भी रूयाए सादेक़ा की एक क़िस्म है जहां इन्सान वाक़ेयन यह देखता है और महसूस करता है जैसे ख़्वाब की बातों को बेदारी के आलम में देख रहा हो। रसूले अकरम (स0) का ख़्वाब में आना किसी तरह की तरदीद और तश्कीक का मुतहम्मल नहीं हो सकता है लेकिन यह मसला बहरहाल क़ाबिले ग़ौर है के जिस वसी ने इतने सारे मसायब बरदाष्त कर लिये और उफ़ तक नहीं की उसने ख़्वाब में रसूले अकरम (स0) को देखते ही फ़रयाद कर दी और जिस नबी ने सारी ज़िन्दगी मज़ालिम व मसाएब का सामना किया और बददुआ नहीं की, उसने बददुआ करने का हुक्म किस तरह दे दिया?
हक़ीकते अम्र यह है के हालात उस मन्ज़िल पर थे जिसके बाद फ़रयाद भी बरहक़ थी और बददुआ भी लाज़िम थी। अब यह मौलाए कायनात का कमाले किरदार है के बराहे रास्त क़ौम की तबाही और बरबादी की दुआ नहीं की बल्के उन्हें ख़ुद इन्हीं के नज़रियात के हवाले कर दिया के ख़ुदाया! यह मेरी नज़र में बुरे हैं तो मुझे इनसे बेहतर असहाब दे दे और मैं इनकी नज़र में बुरा हूं तो उन्हें मुझसे बदतर हाकिम दे दे ताके इन्हें अन्दाज़ा हो के बुरा हाकिम क्या होता है?
मौलाए कायनात (अ0) की यह दुआ फ़िलज़ोर क़ुबूल हो गई और चन्द लम्हों के बाद आपको मासूम बन्दगाने ख़ुदा का जवार हासिल हो गया और “ारीर क़ौम से निजात मिल गई।)))