ख़ुत्बात  
  69- आपका इरषादे गिरामी
(अपने असहाब को सरज़न्शि करते हुए)


कब तक मैं तुम्हारे साथ वह नरमी का बरताव करूं जो बीमार ऊंट के साथ किया जाता है जिसका कोहान अन्दर से खोखला हो गया हो या इस बोसीदा कपड़े के साथ किया जाता है जिसे एक तरफ़ से सिया जाए तो दूसरी तरफ़ से फट जाता है। जब भी “ााम का कोई दस्ता तुम्हारे किसी दस्ते के सामने आता है तो तुममें से हर “ाख़्स अपने घर का दरवाज़ा बन्द कर लेता है और इस तरह छिप जाता है जैसे सूराख़ में गोह या भट में बिज्जू। ख़ुदा की क़सम ज़लील वही होगा जिसके तुम जैसे मददगार होंगे और जो तुम्हारे ज़रिये तीरअन्दाज़ी करेगा गोया वह सोफ़ारे षिकस्ता और पैकाने निदाष्ता तीर से निषाना लगाएगा ख़ुदा की क़सम तुम सहने ख़ाना में बहुत दिखाई देते हो और परचमे लष्कर के ज़ेरे साये बहुत कम नज़र आते हो। मैं तुम्हारी इस्लाह का तरीक़ा जानता हूं और तुम्हें सीधा कर सकता हूं लेकिन क्या करूं अपने दीन को बरबाद करके तुम्हारी इस्लाह नहीं करना चाहता हूं। ख़ुदा तुम्हारे चेहरों को ज़लील करे और तुम्हारे नसीब को बदनसीब करे। तुम हक़ को इस तरह नहीं पहुंचाते हो जिस तरह बातिल की मारेफ़त रखते हो और बातिल को इस तरह बातिल नहीं क़रार देते हो जिस तरह हक़ को ग़लत ठहराते हो।