ख़ुत्बात  
  66-आपका इरषादे गिरामी
(तालीमे जंग के बारे में)



मुसलमानों! ख़ौफ़े ख़ुदा को अपना ‘ाआर बनाओ, सुकून व वेक़ार की चादर ओढ़ लो, दाँतों को भींच लो के इससे तलवारें सरों से उचट जाती है, ज़िरह पोषी को मुकम्मल कर लो, तलवारों को न्याम से निकालने से पहले न्याम के अन्दर हरकत दे लो। दुष्मन को तिरछी नज़र से देखते रहो और नैज़ों से दोनों तरफ़ वार करते रहो। उसे अपनी तलवारों की बाढ़ पर रखो और तलवारों के हमले क़दम आगे बढ़ाकर करो और यह याद रखो के तुम परवरदिगार की निगाह में और रसूले अकरम (स0) के इब्न अम के साथ हो। दुष्मन पर मुसलसल हमले करते रहो और फ़रार से “ार्म करो के इसका आर नस्लों में रह जाता है और इसका अन्जाम जहन्नम होता है। अपने नफ़्स को हंसी ख़ुषी ख़ुदा के हवाले कर दो और मौत की तरफ़ नेहायत दरजए सुकून व इतमीनान से क़दम आगे बढ़ाओ। तुम्हारा निषाना एक दुष्मन का अज़ीम लष्कर और तनाबदारे ख़ेमा होना चाहिये के इसी के दस्त पर हमला करो के “ौतान इसी के एक गोषे में बैठा हुआ है। इसका हाल यह है के इसने एक क़दम हमले के लिये आगे बढ़ा रखा है और एक भागने के लिये पीछे कर रखा है लेहाज़ा तुम मज़बूती से अपने इरादे पर जमे रहो यहाँ तक के हक़ सुबह के उजाले की तरह वाज़ेह हो जाए और मुतमईन रहो के बलन्दी तुम्हारा हिस्सा है और अल्लाह तुम्हारे साथ है और वह तुम्हारे आमाल को ज़ाया नहीं कर सकता है।



(((इन तालीमात पर संजीदगी से ग़ौर किया जाए तो अन्दाज़ा होगा के एक मर्दे मुस्लिम के जेहाद का अन्दाज़ क्या होना चाहिये और उसे दुष्मन के मुक़ाबले में किस तरह जंग आज़मा होना चाहिये, इन तालीमात का मुख़्तसर ख़ुलासा यह है-
1. दिल के अन्दर ख़ौफ़े ख़ुदा हो।
2. बाहर सुकून व इत्मीनान का मुज़ाहिरा हो।
3. दाँतों को भींच लिया जाए।
4. आलाते जंग को मुकम्मल तौर पर साथ रखा जाए।
5. तलवार को न्याम के अन्दर हरकत दे ली जाए के बरवक़्त निकालने में ज़हमत न हो।
6- दुष्मन पर ग़ैत आलूद निगाह की जाए,
7- नेज़ों के हमले हर तरफ़ हों।
8- तलवार दुष्मन के सामने रहे।
9- तलवार दुष्मन तक न पहुँचे तो क़दम बढ़ाकर हमला करे।
10- फ़रार का इरादा न करे।
11- मौत की तरफ़ सुकून के साथ क़दम बढ़ाए।
12- जान जाने आफ़रीं के हवाले कर दे।
13- हदफ़ और निषाने पर निगाह रखे।
14- यह इत्मीनान रखे के ख़ुदा हमारे आमाल को देख रहा है और पैग़म्बर (स0) का भाई हमारी निगाह के सामने है।
ज़्ााहिर है के इन आदाब में बाज़ आदाब, तक़वा, ईमान, इत्मीनान वग़ैरा दाएमी हैसियत रखते हैं और बाज़ का ताल्लुक़ नेज़ा व “ामषीर के दौर से है लेकिन इसे भी हर दौर के आलाते हर्ब व ज़र्ब पर मुन्तबिक़ किया जा सकता है और उससे फ़ायदा उठाया जा सकता है।)))