ख़ुत्बात  
  65- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें इल्मे इलाही के लतीफ़तरीन मुबाहिस की तरफ़ इषारा किया गया है)


तमाम तारीफ़ें उस ख़ुदा के लिये हैं जिसके सिफ़ात में तक़दम व ताख़र नहीं होता है के वह आखि़र होने से पहले और अव्वल रहा हो और बातिन बनने से पहले ज़ाहिर रहा हो। उसके अलावा जिसे भी वाहिद कहा जाता है उसकी वहदत क़िल्लत है और जिसे भी अज़ीज़ समझा जाता है उसकी इज़्ज़त ज़िल्लत है। इसके सामने हर क़ौमी ज़ईफ़ है और हर मालिक ममलूक है, हर आलिम मुतअल्लिम है और हर क़ादिर आजिज़ है, हर सुनने वाला लतीफ़ आवाज़ों के लिये बहरा है और ऊंची आवाज़ें भी इसे बहरा बना देती हैं और दूर की आवाज़ें भी इसकी हद से बाहर निकल जाती हैं और इसी तरह इसके अलावा हर देखने वाला मख़फ़ी रंग और हर लतीफ़ जिस्म को नहीं देख सकता है। इसके अलावा हर ज़ाहिर ग़ैरे बातिन है और हर बातिन ग़ैरे ज़ाहिर है इसने मख़लूक़ात को अपनी हुकूमत के इस्तेहकाम या ज़माने के नताएज के ख़ौफ़ से नहीं पैदा किया है।
न उसे किसी बराबर वाले ख़मलावर या साहबे कसरत “ारीक या टकराने वाले मद्दे मुक़ाबिल के मुक़ाबले में मदद लेना थी। यह सारी मख़लूक़ उसी की पैदा की हुई है और पाली हुई है और यह सारे बन्दे उसी के सामने सरे तस्लीम ख़म किये हुए हैं। उसने अश्याअ में हुलूल नहीं किया है के उसे किसी के अन्दर समाया हुआ कहा जाए और न इतना दूर हो गया है के अलग थलग ख़्याल किया जाए। मख़लूक़ात की खि़लक़त और मसनूआत की तदबीर उसे थका नहीं सकती है और न कोई तख़लीक़ उसे आजिज़ बना सकती है और न किसी क़ज़ा व क़द्र में उसे कोई “ाुबह पैदा हो सकता है।
उसका हर फ़ैसला मोहकम और इसका हर इल्म मुतअत्तन और इसका हर हुक्म मुस्तहकम है। नाराज़गी में भी उससे उम्मीद वाबस्ता की जाती है और नेमतों में भी इसका ख़ौफ़ लाहक़ रहता है।


(((यह उस नुक्ते की तरफ़ इषारा है के परवरदिगार के सिफ़ाते कमाल ऐन ज़ात हैं और ज़ात से अलग कोई “ौ नहीं हैं। वह इल्म की वजह से आलिम नहीं है बल्कि ऐने हक़ीक़ते इल्म है और क़ुदरत के ज़रिये क़ादिर नहीं है बल्के ऐने क़ुदरते कामेला है और जब यह सारे सिफ़ात ऐने ज़ात हैं तो इनमें तक़दम व ताख़र का कोई सवाल ही नहीं है वह जैसे लख़्तए अव्वल है उसी तरह लख़्तए आखि़र भी है और जिस अन्दाज़ से ज़ाहिर है उसी अन्दाज़ से बातिन भी है। इसकी ज़ाते अक़दस में किसी तरह का तख़ीर क़ाबिले तसव्वुर नहीं है। हद यह है के उसकी समाअत व बसारत भी मख़लूक़ात की समाअत व बसारत से बिलकुल अलग है। दुनिया का हर समीअ व बसीर किसी “ौ को देखता और सुनता है और किसी “ौ के देखने और सुनने से क़ासिर रहता है लेकिन परवरदिगार की ज़ाते अक़दस ऐसी नहीं है वह मख़फ़ी तरीन मनाज़िर को देख रहा है और लतीफ़तरीन आवाज़ों को सुन रहा है। वह ऐसा ज़ाहिर है जो बातिन नहीं है और ऐसा बातिन है जो किसी अक़्ल व फ़हम पर ज़ाहिर नहीं हो सकता।)))