ख़ुत्बात  
  64- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (नेक आमाल की तरफ़ सबक़त के बारे में) बन्दगाने ख़ुदा अल्लाह से डरो और आमाल के साथ अजल की तरफ़ सबक़त करो। इस दुनिया के फ़ानी माल के ज़रिये बाक़ी रहने वाली आख़ेरत को ख़रीद लो और यहाँ से कूच कर जाओ के तुम्हें तेज़ी से ले जाया जा रहा है और मौत के लिये आमादा हो जाओ के वह तुम्हारे सरों पर मण्डला रही है। उस क़ौम जैसे हो जाओ जिसे पुकारा गया तो फ़ौरन होषियार हो गई। और उसने जान लिया के दुनिया इसकी मन्ज़िल नहीं है तो उसे आखि़रत से बदल लिया। इसलिये के परवरदिगार ने तुम्हें बेकार नहीं पैदा किया है और न महमिल छोड़ दिया है और याद रखो के तुम्हारे और जन्नत व जहन्नम के दरमियान इतना ही वक़्फ़ा है के मौत नाज़िल हो जाए और अन्जाम सामने आ जाए और वह मुद्दते हयात जिसे हर लम्हज़ कम कर रहा हो और हर साअत इसकी इमारत को मुनहदिम कर रही हो वह क़सीरूल मुद्दत ही समझने के लाएक़ है और वह मौत जिसे दिन व रात ढकेल कर आगे ला रहे हों उसे बहुत जल्द आने वाला ही ख़याल करना चाहिये और वह “ाख़्स जिसके सामने कामयाबी या नाकामी और बदबख़्ती आने वाली है उसे बेहतरीन सामान मुहैया ही करना चाहिये। लेहाज़ा दुनिया में रहकर दुनिया से ज़ादे राह हासिल कर लो जिससे कल अपने नफ़्स का तहफ़्फ़ुज़ कर सको। इसका रास्ता यह है के बन्दा अपने परवरदिगार से डरे। अपने नफ़्स से इख़लास रखे, तौबा की मक़दम करे, ख़्वाहिषात पर ग़लबा हासिल करे इसलिये के इसकी अजल इससे पोषीदा है और इसकी ख़्वाहिष इसे मुसलसल धोका देने वाली है और “ौतान इसके सर पर सवार है जो मासियतों को आरास्ता कर रहा है ताके इन्सान मुरतकब हो जाए और वौबा की उम्मीदें दिलाता है ताके इसमें ताख़ीर करे यहाँ तक के ख़फ़लत और बे ख़बरी के आलम में मौत इस पर हमलावर हो जाती है। हाए किस क़दर हसरत का मक़ाम है के इन्सान की अम्र ही इसके खि़लाफ़ हुज्जत बन जाए और इसका रोज़गार ही इसे बदबख़्ती तक पहुंचा दे। परवरदिगार से दुआ है के हमें और तुम्हें उन लोगों में क़रार दे जिन्हें नेमतें मग़रूर नहीं बनाती हैं और कोई मक़सद इताअते ख़ुदा में कोताही पर आमादा नहीं करता है और मौत के बाद इन पर निदामत और रंज व ग़म का नुज़ूल नहीं होता है।