ख़ुत्बात  
  59- आपका इरषादे गिरामी (आपने उस वक़्त इरषाद फ़रमाया जब आपने ख़वारिज से जंग का अज़्म कर लिया और नहरवान के पुल को पार कर लिया) याद रखो! दुष्मनों की क़त्लगाह दरिया के उस तरफ़ है। ख़ुदा की क़सम न उनमें से दस बाक़ी बचेंगे और न तुम्हारे दस हलाक हो सकेंगे। सय्यद रज़ी - नुत्फ़े से मुराद नहर का “ाफ़ाफ़ पानी है जो बेहतरीन कनाया है पानी के बारे में चाहे इसकी मिक़दार कितनी ही ज़्यादा क्यों न हो। (((जब अमीरूल मोमेनीन (अ0) को यह ख़बर दी गई के ख़वारिज ने सारे मुल्क में फ़साद फ़ैलाना “ाुरू कर दिया है, जनाबे अब्दुल्लाह बिन ख़बाब बिन इलारत को उनके घर की औरतों समेत क़त्ल कर दिया है और लोगों में मुसलसल दहषत फ़ैला रहे हैं तो आपने एक “ाख़्स को समझाने के लिये भेजा, इन ज़ालिमों ने उसे भी क़त्ल कर दिया। इसके बाद जब हज़रत अब्दुल्लाह बिन ख़बाब के क़ातिलों को हवाले करने का मुतालबा किया तो साफ़ कह दिया के हम सब क़ातिल हैं। इसके बाद हज़रत ने बनफ़्से नफ़ीस तौबा की दावत दी लेकिन उन लोगों ने उसे भी ठुकरा दिया। आखि़र एक दिन वह आ गया जब लोग एक लाष को लेकर आए और सवाल किया के सरकार अब फ़रमाएं अब क्या हुक्म है? तो आपने नारा-ए-तकबीर बलन्द करके जेहाद का हुक्म दे दिया और परवरदिगार के दिये हुए इल्मे ग़ैब की बिना पर अन्जामकार से भी बाख़बर कर दिया जो बक़ौल इब्नुल हदीद सद-फ़ीसद सही साबित हुआ और ख़वारिज के सिर्फ़ नौ अफ़राद बचे और हज़रत (अ0) के साथियों में सिर्र्फ़ आठ अफ़राद “ाहीद हुए।)))