ख़ुत्बात  
  58- आपका इरषादे गिरामी (जिसका मुख़ातिब उन ख़वारिज को बनाया गया है जो तहकीम से किनाराकष हो गए और ‘‘ला हुक्म इलल्लाह’’ का नारा लगाने लगे) ख़ुदा करे तुम पर सख़्त आन्धियाँ आएं और कोई तुम्हारे हाल का इस्लाह करने वाला न रह जाए। क्या मैं परवरदिगार पर ईमान लाने और रसूले अकरम (स0) के साथ जेहाद करने के बाद अपने बारे में कुफ्ऱ का ऐलान कर दूँ। ऐसा करूंगा तो मैं गुमराह हो जाऊँगा और हिदायत याफ़ता लोगों में न रह जाउंगा। जाओ पलट जाओ अपनी बदतरीन मंज़िल की तरफ़ और वापस चले जाओ अपने निषानाते क़दम पर। मगर आगाह रहो के मेरे बाद तुम्हें हमागीर ज़िल्लत और काटने वाली तलवार का सामना करना होगा और इस तरीक़ए कार का मुक़ाबला करना होगा जिसे ज़ालिम तुम्हारे बारे में अपने सुन्नत बना लेँ यानी हर चीज़ को अपने लिये मख़सूस कर लेना। सय्यद रज़ी- हज़रत का इरषाद ‘‘ला बक़ी मिनकुम आबरुन’’ तीन तरीक़ों से नक़्ल किया गया है- आबरुन- वह “ाख़्स जो दरख़्ते ख़ुरमा को कांट छाट कर उसकी इसलाह करता है। आसरुन- रिवायत करने वाला यानी तुम्हारी ख़बर देने वाला कोई न रह जाएगा और यही ज़्यादा मुनासिब मालूम होता है। आबज़ुन- कूदने वाला या हलाक होने वाला के मज़ीद हलाकत के लिये भी कोई न रह जाएगा।