ख़ुत्बात  
  57- आपका इरषादे गिरामी (एक क़ाबिले मज़म्मत “ाख़्स के बारे में) आगाह हो जाओ के अनक़रीब तुम पर एक “ाख़्स मुसल्लत होगा जिसका हलक़ कुषादा और पेट बड़ा होगा। जो पा जाएगा खा जाएगा और जो न पाएगा उसकी जुस्तजू में रहेगा। तुम्हारी ज़िम्मेदारी होगी के उसे क़त्ल कर दो मगर तुम हरगिज़ क़त्ल न करोगे। ख़ैर, वह अनक़रीब तुम्हें, मुझे गालियाँ देने और मुझसे बेज़ारी करने का भी हुक्म देगा। तो अगर गालियों की बात हो तो मुझे बुरा भला कह लेना के यह मेरे लिये पाकीज़गी का सामान है और तुम्हारे लिये दुष्मन से निजात का, लेकिन ख़बरदार मुझसे बराएत न करना के मैं फ़ितरते इस्लाम पर पैदा हूआ हूँ और मैंने ईमान और हिजरत दोनों में सबक़त की है।