ख़ुत्बात  
  55-आपका इरषादे गिरामी
(जब आपके असहाब ने यह इज़हार किया के अहले सिफ़फ़ीन से जेहाद की इजाज़त में ताख़ीर से काम ले रहे हैं)


तुम्हारा सवाल के क्या यह ताख़ीर मौत की नागवारी से है तो ख़ुदा की क़सम मुझे मौत की कोई परवाह नहीं है के मैं इसके पास वारिद हो जाऊँ या वह मेरी तरफ़ निकलकर आ जाए। और तुम्हारा यह ख़याल के मुझे अहले “ााम के बातिल के बारे में कोई “ाक है, तो ख़ुदा गवाह है के मैंने एक दिन भी जंग को नहीं टाला है मगर इस ख़याल से के “ाायद कोई गिरोह मुझ से मुलहक़ हो जाए और हिदायत पा जाए और मेरी रौषनी में अपनी कमज़ोर आंखों का इलाज कर ले के यह बात मेरे नज़दीक उससे कहीं ज़्यादा बेहतर है के मैं उसकी गुमराही की बिना पर उसे क़त्ल कर दूँ अगरचे इस क़त्ल का गुनाह उसी के ज़िम्मे होगा।