ख़ुत्बात  
 
54- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें आपने अपनी बैयत का तज़किरा किया है)


लोग मुझ पर यूँ टूट पड़े जैसे वह प्यासे ऊँट पानी पर टूट पड़ते हैं जिनके निगरानों ने उन्हें आज़ाद छोड़ दिया हो और उनके पैरों की रस्सियां खोल दी हों यहां तक के मुझे यह एहसास पैदा हो गया के यह मुझे मार ही डालेंगे या एक दूसरे को क़त्ल कर देंगे। मैंने इस अम्रे मुख़ालफ़त को यूँ उलट पलट कर देखा है के मेरी नीन्द तक उड़ गई है और अब यह महसूस किया है के या इनसे जेहाद करना होगा या पैग़म्बर (स0) के एहकाम का इन्कार कर देना होगा। ज़ाहिर है के मेरे लिये जंग की सख़्ितयों का बरदाष्त करना अज़ाब की सख़्ती बरदाष्त करने से आसानतर है और दुनिया की मौत आख़ेरत की मौत और तबाही से सुबुकतर है।


(((सवाल यह पैदा होता है के जिस इस्लाम में रोज़े अव्वल से बज़ोरे “ामषीर बैअत ली जा रही थी और इन्कारे बैअत करने पर घरों में आगणन लगाई जा रही थी या लोगों को ख़न्जर व “ामषीर और ताज़ियाना व दुर्रा का निषाना बनाया जा रहा था। इसमें यकबारगी यह इन्क़ेलाब कैसे आ गया के लोग एक इन्सान की बैअत करने के लिये टूट पड़े और यह महसूस होने लगा के जैसे एक दूसरे को क़त्ल कर देंगे।
क्या इसका राज़ यह था के लोग इस एक “ाख़्स के इल्म व फ़ज़्ल, ज़ोहद व तक़वा और “ाुजाअत व करम से मुतास्सिर हो गए थे। ऐसा होता तो यह सूरते हाल बहुत पहले पैदा हो जाती और लोग इस “ाख़्स पर क़ुरबान हो जाते। हालांके ऐसा नहीं हो सका जिसका मतलब यह है के क़ौम ने “ाख़्िसयत से ज़्यादा हालात को समझ लिया था और यह अन्दाज़ा कर लिया था के वह “ाख़्स जो उम्मत के दरमियान वाक़ेई इन्साफ़ कर सकता है और जिसकी ज़िन्दगी एक आम इन्सान की ज़िन्दगी की तरह सादगी रखती है और इसमें किसी तरह की हर्स व तमअ का गुज़र नहीं है वह इस मर्दे मोमिन और कुल्ले ईमान के अलावा कोई दूसरा नहीं है। लेहाज़ा इसकी बैयत में सबक़त करना एक इन्सानी और ईमानी फ़रीज़ा है और दरहक़ीक़त मौलाए कायनात (अ0) ने इस पूरी सूरते हाल को एक लफ़्ज़ में वाज़ेअ कर दिया है के यह दिन दर हक़ीक़त प्यासों के सेराब होने का दिन था और लोग मुद्दतों से तष्नाकाम थे लेहाज़ा इनका टूट पड़ना हक़ बजानिब था। इस एक तषबीह से माज़ी और हाल दोनों का मुकम्मल अन्दाज़ा किया जा सकता है।)))