ख़ुत्बात  
  48- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जो सिफ़्फ़ीन के लिये कूफ़े से निकलते हुए मक़ामे नख़लिया पर इरषाद फ़रमाया था)


परवरदिगार की हम्द है जब भी रात आए और तारीकी छाए या सितारा चमके और डूब जाए। परवरदिगार की हम्दो सना है के उसकी नेमतें ख़त्म नहीं होती हैं और उसके एहसानात का बदला नहीं दिया जा सकता।
अम्माबाद! मैंने अपने लश्कर का हरावल दस्ता रवाना कर दिया है और उन्हें हुक्म दिया है के इस नहर के किनारे ठहर कर मेरे हुक्म का इन्तेज़ार करें। मैं चाहता हूँ के इस दरियाए दजला को अबूर करके तुम्हारी एक मुख़्तसर जमाअत तक पहुँच जाऊँ जो एतराफ़े दजला में मुक़ीम हैं ताके उन्हें तुम्हारे साथ जेहाद के लिये आमादा कर सकूँ और उनके ज़रिये तुम्हारी क़ूवत में इज़ाफ़ा कर सकूँ।
सय्यद रज़ी- मलतात से मुराद दरिया का किनारा है और असल में यह लफ़्ज़ हमवार ज़मीन के मानों में इस्तेमाल होता है। नुत्फ़े से मुराद फ़ुरात का पानी है और यह अजीबो ग़रीब ताबीरात में है।


(((इस जमाअत से मुराद अहले मदायन हैं जिन्हें हज़रात (अ0) इस जेहाद में “ाामिल करना चाहते थे और उनके ज़रिये लष्कर की क़ूवत में इज़ाफ़ा करना चाहते थे। ख़ुत्बे के आगणऩाज़ में रात और सितारों का ज़िक्र इस अम्र की तरफ़ भी इषारा हो सकता है के लष्करे इस्लाम को रात की तारीकी और सितारे के ग़ुरूब व ज़वाल से परेषान नहीं होना चाहिए। नूरे मुतलक़ और ज़ियाए मुकम्मल साथ है तो तारीकी कोई नुक़सान नहीं पहुँच मार्गँचा सकती है और सितारों का क्या भरोसा है। सितारे तो डूब भी जाते हैं लेकिन जो परवरदिगार क़ाबिले हम्दो सना है उसके लिये ज़वाल व ग़ुरूब नहीं है और वह हमेषा बन्दए मोमिन के साथ रहता है।)))