ख़ुत्बात  
  46- आपका इरषादे गिरामी
(जब “ााम की तरफ़ जाने का इरादा फ़रमाया और इस दुआ को रकाब में पांव रखते हुए विर्दे ज़बान फ़रमाया)


ख़ुदाया मैं सफ़र की मषक्क़त और वापसी के अन्दोह व ग़म और अहल-व-माल-व-औलाद की बदहाली से तेरी पनाह चाहता हूँ। तू ही सफ़र का साथी है और घर का निगराँ है के यह दोनों काम तेरे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता है के जिसे घर में छोड़ दिया जाए वह सफ़र में काम नहीं आता है और जिसे सफ़र में साथ ले लिया जाए वह घर की निगरानी नहीं कर सकता है।
सय्यद रज़ी- इस दुआ का इब्तेदाई हिस्सा सरकारे दो आलम (स0) नक़ल किया गया है और आखि़री हिस्सा मौलाए कायनात की तज़मीन का है जो सरकार (अ0) के कलेमात की बेहतरीन तौज़ीअ और तकमील है ‘‘ला यहमाहमा ग़ैरक’’