ख़ुत्बात  
  45- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(यह ईदुल फ़ित्र के मौक़े पर आपके तवील ख़ुत्बे का एक जुज़ है जिसमें हम्दे ख़ुदा और मज़म्मते दुनिया का ज़िक्र किया गया है)


तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी रहमत से मायूस नहीं हुआ जाता और जिसकी नेमत से किसी का दामन ख़ाली नहीं है। न कोई “ाख़्स इसकी मग़फ़ेरत से मायूस हो सकता है और न किसी में इसकी इबादत से अकड़ने का इमकान है। न इसकी रहमत तमाम होती है और न इसकी नेमत का सिलसिला रूकता है।
यह दुनिया एक ऐसा घर है जिसके लिये फ़ना और इसके बाषिन्दों के लिये जिला वतनी मुक़र्रर है। यह देखने में “ाीरीं और सरसब्ज़ है जो अपने तलबगार की तरफ़ तेज़ी से बढ़ती है और उसके दिल में समा जाती है। लेहाज़ा ख़बरदार इससे कूच की तैयारी करो और बेहतरीन ज़ादे राह लेकर चलो। इस दुनिया में ज़रूरत से ज़्यादा सवाल न करना और जितने से काम चल जाए उससे ज़्यादा का मुतालबा न करना।
((( उस वाक़िये का ख़ुलासा यह है के तहकीम के बाद ख़वारिज ने जिन “ाोरषों का आगणऩाज़ किया था उनमें एक बनी नाजिया के एक “ाख़्स ख़रीत बिन राषिद का इक़दाम था जिसको दबाने के लिये हज़रत ने ज़ियादा बिन हफ़सा को रवाना किया था और उन्होंने “ाोरष को दबा दिया था लेकिन ख़रीत दूसरे इलाक़ों में फ़ितने बरपा करने लगा तो हज़रत ने माक़ल बिन क़ैस रियाही को दो हज़ार का लष्कर देकर रवाना कर दिया और उधर इब्ने अब्बास ने बसरा से मकक भेज दी और बाला आखि़र हज़रत (अ0) के लष्कर ने फ़ितना को दबा दिया और बहुत से अफ़राद को क़ैदी बना लिया। क़ैदियों को लेकर जा रहे थे के रास्ते में मुस्क़ला के “ाहर से गुज़र हुआ। इसने क़ैदियों की फ़रयाद पर उन्हें ख़रीद कर आज़ाद कर दिया और क़ीमत की सिर्फ़ एक क़िस्त अदा कर दी। इसके बाद ख़ामोष बैठ गया। हज़रत (अ0) ने बार-बार मुतालबा किया। आखि़र में कूफ़ा आकर दो लाख दिरहम दे दिये और जान बचाने के लिये “ााम भाग गया। हज़रत (अ0) ने फ़रमाया के काम “ारीफ़ों का किया था लेकिन वाक़ेयन ज़लील ही साबित हुआ।
काष इसे इस्लाम के इस क़ानून की इत्तेलाअ होती के क़र्ज़ की अदायगी में जब्र नहीं किया जाता है बल्कि हालात का इन्तेज़ार किया जाता है और जब मक़रूज़ के पास इमकानात फ़राहम हो जाते हैं तब क़र्ज़ का मुतालबा किया जाता है।)))