ख़ुत्बात  
  44- हज़रत का इरषादे गिरामी
(इस मौक़े पर जब मुस्क़िला बिन हबीरा “ाीबानी ने आपके आमिल से बनी नाजिया के असीर ख़रीद कर आज़ाद कर दिया और जब जब हज़रत ने उससे क़ीमत का मुतालबा किया तो बददयानती करते हुए “ााम की तरफ़ फ़रार कर गया)


ख़ुदा बुरा करे मुस्क़िला का के उसने काम “ारीफ़ों जैसा किया लेकिन फ़रार ग़ुलामों की तरह किया। अभी इसके मद्दाह ने ज़बान खोली भी नहीं थी के इसने ख़ुद ही ख़ामोष कर दिया और इसकी तारीफ़ कुछ कहने वाला कुछ कहने भी न पाया था के इसने मुंह बन्द कर दिया। अगर वह यहीं ठहरा रहता तो मैं जिस क़द्र क़ीमत मुमकिन होता उससे ले लेता और बाक़ी के लिये इसके माल की ज़्यादती का इन्तेज़ार करता।