ख़ुत्बात  
  43- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जब जरीर बिन अब्दुल्लाह अल बजली को माविया के पास भेजने और माविया के इन्कारे बैयत के बाद असहाब को अहले “ााम से जंग पर आमादा करना चाहा)


इस वक़्त मेरी अहले “ााम से जंग की तैयारी जबके जरीर वहां मौजूद हैं “ााम पर तमाम दरवाज़े बन्द कर देना है और उन्हें ख़ैर के रास्ते से रोक देना है और अगर वह ख़ैर का इरादा भी करना चाहें मैंने ख़ैर के लिये एक वक़्त मुक़र्रर कर दिया है। इसके बाद वह वहाँ या किसी धोके की बिना पर रूक सकते हैं या नाफ़रमानी की बिना पर, और दोनों सूरतों में मेरी राय यही है के इन्तेज़ार किया जाए लेहाज़ा अभी पेषक़दमी न करो और मैं मना भी नहीं करता हूँ अगर अन्दर-अन्दर तैयारी करते रहो।
(((इन्सान की आक़ेबत का दारोमदार हक़ाएक और वाक़ेयात पर है और वहां हर “ाख़्स को इसकी माँ के नाम से पुकारा जाएगा के माँ ही एक साबित हक़ीक़त है बाप की त“ाख़ीस में तो इख़्तेलाफ़ हो सकता है लेकिन माँ की त“ाख़ीस में कोई इख़्तेलाफ़ नहीं हो सकता है। इमाम अलैहिस्सलाम का मक़सद यह है के दुनिया में आख़ेरत की गोद में परवरिष पाओ ताके क़यामत के दिन इसी से मिला दिये जाओ वरना अबनाए दुनिया इस दिन वह यतीम होंगे जिनका कोई बाप न होगा और माँ को भी पीछे छोड़ कर आए होंगे। ऐसा बेसहारा बनने से बेहतर यह है के यहीं से सहारे का इन्तेज़ाम कर लो और पूरे इन्तेज़ाम के साथ आख़ेरत का सफ़र इख़्तेयार करो।
यह इस अम्र की तरफ़ इषारा है के अमली एहतियात का तक़ाज़ा यह है के दुष्मन को कोई बहाना फ़राहम न करो और वाक़ई एहतियात का तक़ाज़ा यह है के उसके मक्रो फ़रेब से होशियार हो और हर वक़्त मुक़ाबला करने के लिये तैयार रहो।)))
मैंने इस मसले पर मुकम्मल ग़ौरो फ़िक्र कर लिया है और इसके ज़ाहिर व बातिन को उलट पलट कर देख लिया है। अब मेरे सामने दो ही रास्ते हैं या जंग करूं या बयानाते पैग़म्बरे इस्लाम (स0) का इन्कार कर दूँ। मुझसे पहले इस क़ौम का एक हुकमराँ था। उसने इस्लाम में बिदअतें ईजाद कीं और लोगों को बोलने का मौक़ा दिया तो लोगों ने ज़बान खोली। फिर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया और आखि़र में समाज का ढांचा बदल दिया।