ख़ुत्बात  
  36- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (अहले नहरवान को अन्जामकार से डराने के सिलसिले में) मैं तुम्हें बाख़बर किये देता हूँ के इस नहर के मोड़ों पर और इस नषेब की हमवार ज़मीनों पर पड़े दिखाई दोगे और तुम्हारे पास परवरदिगार की तरफ़ से कोई वाज़ेअ दलील और रौषन हुज्जत न होगी। तुम्हारे घरों ने तुम्हें निकाल बाहर कर दिया और क़ज़ा व क़द्र ने तुम्हें गिरफ़्तार कर लिया। मैं तुम्हें इस तहकीम से मना कर रहा था लेकिन तुमने अहदषिकन दुष्मनों की तरह मेरी मुख़ालेफ़त की यहाँतक के मैंने अपनी राय को छोड़कर मजबूरन तुम्हारी बात को तस्लीम कर लिया मगर तुम दिमाग़ के हल्के और अक़्ल के अहमक़ निकले। ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे। मैंने तो तुम्हें किसी मुसीबत में नहीं डाला है और तुम्हारे लिये कोई नुक़सान नहीं चाहा है। ((( सूरते हाल यह है के जंगे सिफ़फ़ीन के इख़्तेताम के क़रीब जब अम्र व आस के मष्विरे से माविया ने नैज़ों पर क़ुरान बलन्द कर दिये और क़ौम ने जंग रोकने का इरादा कर लिया तो हज़रत ने मुतनब्बेह किया के सिर्फ़ मक्कारी है। इस क़ौम का क़ुरान से कोई ताल्लुक़ नहीं है। लेकिन क़ौम ने इस हद तक इसरार किया के अगर आप क़ुरान के फ़ैसले को न मानेंगे तो हम आपको क़त्ल कर देंगे या गिरफ़्तार करके माविया के हवाले कर देंगे। ज़ाहिर है के इसके नताएज इन्तेहाई बदतर और संगीन थे लेहाज़ा आपने अपनी राय से क़ता नज़र करके इस बात को तसलीम कर लिया मगर “ार्त यही रखी के फ़ैसला किताब व सुन्नत ही के ज़रिये होगा। ममला रफ़ा दफ़ा हो गया लेकिन फ़ैसले के वक़्त माविया के नुमाइन्दे अम्र व आस ने हज़रत अली (अ0) की तरफ़ के नुमाइन्दे अबू मूसा अषअरी को धोका दे दिया और उसने हज़रत अली (अ0) के माज़ूल करने का एलान कर दिया जिसके बाद अम्र व आस ने माविया को नामज़द कर दिया और इसकी हुकूमत मुसल्लम हो गई। हज़रत अली (अ0) के नाम नेहाद असहाब को अपनी हिमाक़त का अन्दाज़ा हुआ और “ार्मिन्दगी को मिटाने के लिये उलटा इलज़ाम लगाना “ाुरू कर दिया के आपने इस तहकीम को क्यों मंज़ूर किया था और ख़ुदा के अलावा किसी को हुक्म क्यों तस्लीम किया था। आप काफ़िर हो गए हैं और आपसे जंग, वाजिब है और यह कहकर मक़ाम हरोरा पर लष्कर जमा करना “ाुरू कर दिया। उधर हज़रत “ााम के मुक़ाबले की तैयारी कर रहे थे लेकिन जब इन ज़ालिमों की “ारारत हद से आगे बढ़ गई तो आपने अबू अयूब अन्सारी को फ़हमाइष के लिये भेजा। इनकी तक़रीर का यह असर हुआ के बारा हज़ार में से अक्सरीयत कूफ़े चली गई, या ग़ैर जानिबदार हो गई या हज़रत के साथ आ गई और सिर्फ़ दो तीन हज़ार ख़वारिज रह गए जिनसे मुक़ाबला हुआ तो इस क़यामत का हुआ के सिर्फ़ नौ आदमी बचे। बाक़ी सब फ़िन्नार हो गए और हज़रत के लष्कर से सिर्फ़ आठ अफ़राद “ाहीद हुए वाक़ेया 9 सफ़र 538 हि0 को पेष आया।)))