ख़ुत्बात  
  ख़ुत्बा-35 आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा



(जब तहकीम के बाद इसके नतीजे की इत्तेला दी गई तो आपने हम्दो सनाए इलाही के बाद इस बलाए का सबब बयान फ़रमाया)

हर हाल में ख़ुदा का “ाुक्र है चाहिये ज़माना कोई बड़ी मुसीबत क्यों न ले आए और हादेसात कितने ही अज़ीम क्यों न हो जाएं। और मैं गवाही देता हूँ के वह ख़ुदा एक है, इसका कोई “ारीक नहीं है और इसके साथ कोई दूसरा माबूद नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स0) इसके बन्दे और रसूल हैं (ख़ुदा की रहमत इन पर और इनकी आल (अ0) पर)

(((-1- यह दयानतदारी और ईमानदारी की अज़ीमतरीन मिसाल है के कायनात का अमीर मुसलमानों का हाकिम, इस्लाम का ज़िम्मेदार क़ौम के सामने खड़े होकर इस हक़ीक़त का एलान कर रहा है के जिस तरह मेरा हक़ तुम्हारे ज़िम्मे है इसी तरह तुम्हारा हक़ मेरे ज़िम्मे भी है। इस्लाम में हाकिम हुक़ूक़ुल इबाद से बलन्दतर नहीं होता है और न उसे क़ानूने इलाही के मुक़ाबले में मुतलक़ुलअनान क़रार दिया जा सकता है। इसके बाद दूसरी एहतियात यह है के पहले अवाम के हुक़ूक़ को अदा करने का ज़िक्र किया। इसके बाद अपने हुक़ूक़ का मुतालबा किया और हुक़ूक़ के बयान में भी अवाम के हुक़ूक़ को अपने हक़ के मुक़ाबले में ज़्यादा अहमियत दी। अपना हक़ सिर्फ़ यह है के क़ौम मुख़लिस रहे और बैयत का हक़ अदा करती रहे और एहकाम की इताअत करती रहे जबके यह किसी हाकिम के इम्तेयाज़ी हुक़ूक़ नहीं हैं बल्के मज़हब के बुनियादी फ़राएज़ हैं। इख़लास व नसीहत हर “ाख़्स का बुनियादी फ़रीज़ा है। बैअत की पाबन्दी मुआहेदा की पाबन्दी और तक़ाज़ाए इन्सानियत है। एहकाम की इताअत एहकामे इलाहिया की इताअत है और यही ऐन तक़ाज़ाए इस्लाम है। इसके बरखि़लाफ़ अपने ऊपर जिन हुक़ूक़ का ज़िक्र किया गया है वह इस्लाम के बुनियादी फ़राएज़ में “ाामिल नहीं हैं बल्कि एक हाकिम की ज़िम्मेदारी के “ाोबे हैं के वह लोगों को तालीम देकर इनकी जेहालत का इलाज करे और उन्हें महज़ब बनाकर अमल की दावत दे और फिर बराबर नसीहत करता रहे और किसी आन भी इनके मसालेह व मनाफ़ेअ से ग़ाफ़िल न होने पाए।)))

अम्माबाद! (याद रखो) के नासेह “ाफ़ीक़ और आलिमे तजुरबेकार की नाफ़रमानी हमेषा बाइसे हसरत और मोजब निदामत हुआ करती है। मैंने तुम्हें तहकीम के बारे में अपनी राय से बाख़बर कर दिया था और अपनी क़ीमती राय का निचोड़ बयान कर दिया था लेकिन ऐ काष ‘‘क़सीर’’ के हुक्म की इताअत की जाती। तुमने तो मेरी इस तरह मुख़ालफ़त की जिस तरह बदतरीन मुख़ालफ़त और अहदे षिकन नाफ़रमान किया करते हैं यहाँ तक के नसीहत करने वाला ख़ुद भी “ाुबहा में पड़ जाए के किसको नसीहत कर दी और चक़माक़ ने “ाोले भड़काना बन्द कर दिये। अब हमारा और तुम्हारा वही हाल हुआ है जो बनी हवाज़न के “ाायर ने कहा थाः ‘‘मैंने तुमको अपनी बात मक़ामे मनारेजुललेवा में बता दी थी, लेकिन तुमने इसकी हक़ीक़त को दूसरे दिन की सुबह ही को पहचाना’’