ख़ुत्बात  
 
खु़त्बा-32


ऐ लोगों ! हम एक ऐसे कज रफ़्तार ज़माने (टेढ़ी चाल वाले युग) और नाशुक्र गुज़ार (कृतध्र) दुनिया में पैदा हुए हैं कि जिस में नेकू कार (सदाचारी) को खताकार (अपराधी) समझा जाता है और ज़ालिम (अत्याचारी) अपनी सरकशी (अवज्ञा) में बढ़ता ही जाता है। जिन चीज़ों को हम जानते हैं, उन से फ़ाइदा (लाभ) नहीं उठाते, और जिन चीज़ों को नहीं जानते, उन्हें दर्याफ़्त (पूछताछ) नहीं करते और जब तक मुसीबत आ नहीं जाती, हम ख़तरा महसूस नहीं करते। (इस ज़माने के) लोग चार तरह के हैं, (1) कुछ वह हैं जिन्हें मुफ़सिदा अंगेज़ी (उपद्रव फैलाने) से माने (निरोधक) सिर्फ उन के नफ़्स (आत्मा) का बे वक़्अत (अवमूल्य) होना, उन की धार का कुन्द (कुंठ) होना, (2) कुछ लोग वह हैं, जो तलवारें सौंते हुए अलानिया शर (आतंक) फैला रहे हैं और उन्होंने अपने सवार और पियादे जम्अ कर रखे हैं, सिर्फ़ कुछ माल बटोरने या किसी दस्ते (सैनिक टुकड़ी) की क़ियादत (नेतृत्व) या मिंबर पर बलन्द (ऊँचा) होने के लिये उन्हों ने अपने नफ्सों (प्राणों) को वक़्फ (समर्पित) कर दिया है और दीन (धर्म) को तबाहो बर्बाद (नष्ट) कर डाला है। कितना ही बुरा सौदा है कि तुम दुनिया को अपने नफ़्स (आत्मा) की क़ीमत (मूल्य) और अल्लाह के यहां की नेमतों का बदल क़रार दे लो। (3) और कुछ लोग वह हैं जो आख़िरत वाले कामों से दुनिया तलबी करते हैं और यह नहीं करते कि दुनिया के कामों से भी आख़िरत का बनाना मक़सूद रखें। यह अपने ऊपर बड़ा सुकून व वक़ार (शान्ति एंव गम्भीरता) तारी (व्याप्त) रखते हैं आहिस्ता आहिस्ता क़दम उठाते हैं और दामनों को ऊपर की तरफ़ समेटते रहते हैं और अपने नफ्सों को इस तरह संबार लेते हैं कि लोग उन्हें अमीन समझ लें। यह लोग अल्लाह की पर्दापोशी से फ़ाइदा उठा कर उस का गुनाह (पाप) करते हैं, (4) और कुछ लोग वह हैं जिन्हें उन के नफ्सों (आत्माओं) की कमज़ोर (दुर्बलता) और साज़ो सामान की ना फ़राहमी मुल्क गीरी के लिये उठने नहीं देती। इन हालात ने उन्हें तरक्क़ी व बलन्दी हासिल करने से दरमान्दा व आजि़ज़ कर दिया है। इस लिये क़िनाअत के नाम से उन्हों ने अपने आप को आरास्ता कर रखा है और ज़ाहिदों के लिबास से अपने को सजा लिया है। हालांकि उन्हें इन चीज़ों से किसी वक्त कभी कोई लगाव नहीं रहा। उस के बाद थोड़े से वह लोग रह गए हैं जिन की आंखे आख़िरत की याद और हश्र के खौफ़ से झुकी हुई हैं और उन से आंसू रवां रहते हैं। उन में कुछ तो वह हैं, जो दुनिया वालों से अलग थलग तनहाई में पड़े हैं। और कुछ ख़ौफ़ो हिरास के आलम में ज़िल्लतें सह रहे हैं और बअज़ ने इस तरह चुप साध ली है कि गोया उनके मुंह बांध दिये गए हैं। कुछ ख़ुलूस से दुआएं मांग रहे हैं, कुछ ग़म ज़दा व दर्द रसीदा (दुखी) हैं जिन्हें ख़ौफ़ (भय) ने गुमनामी के गोशे में बिठा दिया है और ख़स्तगी व दरमांदगी (दरिद्रता एंव दुख) उन पर छाई हुई है। वह एक शूर दरिया (खारी नदी) में हैं (कि बावजूद पानी की कसरत के फिर भी वह प्यासे हैं) उन के मुंह बन्द और दिल मजरुह (घायल) हैं। उन्हों ने लोगों को इतना समझाया, बुझाया कि वह उक्ता गए और इतना उन पर जब्र किया गया, कि वह बिलकुल दब गए, और इतने क़त्ल किये गए कि उन में (नुमायां) कमी हो गई। इस दुनिया को तुम्हारी नज़रों में कीकर (बबूल) के छिलकों और उन के रेज़ों से भी ज़ियादा हक़ीरो पस्त (तुच्छ व दलित) होना चाहिये और अपने क़ब्ल (पूर्व) के लोगों से तुम इबरत (शिक्षा) हासिल (प्राप्त) कर लो इस से क़ब्ल (पहले) कि तुमहारे हालात से बाद वाले इबरत हासिल करें और इस दुनिया की बुराई महसूस करते हुए इस से क़त्ए तअल्लुक़ (सम्बंध विच्छेद) कर लिया जो तुम से ज़ियादा उस के वालेहो शैदा (चाहने वाले) थे।



सैयद रज़ी फ़रमाते हैं कि बअज़ लोगों ने अपनी लाइल्मी की बिनी पर इस क़ुत्बे को मुआविया की तरफ़ मन्सूब किया है हालांकि यह अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम का कलाम है जिस में किसी शको शुब्ह की गुंजाइश नहीं है। भला सोने को मिट्टी से क्या निस्बत और शीरीं (मीठे) पानी को शूर (खारी) पानी से क्या रब्त ? चुनांचे इस वादी में राह दिखाने वाले माहिरे फ़न और परखने वाले बा बसीरत अमर इब्ने बहरे जाहिज़ ने इस की खबर दी है, और अपनी किताब '' अलबयान वक्तबयीन '' में इस का ज़िक्र किया है और उन लोगों का भी ज़िक्र किया है जिन्हों ने इसे मुआविया की तरफ़ मन्सूब किया है। इस के बाद कहा है कि यह कलाम अली अलैहिस सलाम के कलाम से हू बहू मिलता जुलता है और इस में जो लोगों की तक़सीम और उन की ज़िल्लत व पस्ती और ख़ौफ़ो हिरास की हालत बयान की है, यह आप ही के मस्लक से मेल खाती है। हम ने तो किसी हालत में भी मुआविया को ज़ाहिदों के अन्दाज़ और आबिदोंके तरीक़े पर कलाम करते हुए नहीं पाया।