ख़ुत्बा-30

[ क़त्ले उस्मान की हक़ीक़त (वास्तविकता) का इन्किशाफ़ (रहस्योदघाटन) करते हुए फ़रमाया ]

अगर मैं उन के क़त्ल का हुक्म देता तो अलबत्ता उन का क़ातिल ठहरता और अगर उन के क़त्ल से (दूसरों को) रोकता तो उन का मुआविन मददगार (सहायक व सहयोगी) होता। मैं बिलकुल ग़ैर जानिबदार (निष्पक्ष) रहा लेकिन हालात (परिस्थितियां) ऐसे थे कि जिन लोगों ने उन की नुस्रत व इम्दाद की वह यह से हाथ उठा लिया वह नहीं ख़यात करते कि उन की मदद करने वाले हम से बेह्तर व बर्तर हैं। मैं हक़ीक़ते अमर को तुम से बयान किये देता हूं और वह यह है कि उन्हों ने (अपने रिश्तेदारों) की तरफ़दारी (पक्षपात) किया तो तरफ़दारी बुरी तरह की, और तुम घबरा गए, तो बुरी तरह घबरा गए और (इन दोनों फ़रीक़) बेजा तरफ़दारी करने वाले और घबरा उठने वाले के दरमियान (बीच) फ़ैसला (निर्णय) करने वाला अल्लाह है।

हज़रत उसमान इसलामी दौर के पहले उमवी खलीफ़ा हैं जो यकुम मुहर्रम सन् 24 हिजरी में सत्तर बरस की उम्र में मस्नदे खिलाफ़त पर मुतमक्किन हुए (पधारे) और बारह बरस तक मुसलमानों के सियाहो सफ़ैद के मालिक बने रहने के बाद उन्हीं के हाथों से 18 ज़िल हिज्ज सन् 35 हिज्री में क़त्ल हो कर हशे कौकब में दफ़्न हुए।

इस हक़ीक़त (यथार्थ) से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हज़रते उसमान का क़त्ल उन की कमज़ोरियों और उन के उम्माल (कर्मचारियों) के सियाह कारनामों का नतीजा (परिणाम) था। वर्ना कोई वजह न थी कि मुसलमान मुत्तफ़िक़ा तौर पर (सर्व सहमति से) उन के क़त्ल पर आमादा और उन की जान लेने के दरपय हो जाते और उन के घर के चन्द (कतिपय) आदमियों के अलावा कोई उन की हिमायत (समर्थन) व मुदाफ़िअत (बचाव) के लिये खड़ा न होता। मुसलमान यक़ीनन (निस्सन्देह) उन के लिनो साल, उन की बुज़ुर्गी व वक़ार और शरफ़े मुसाहिबत का पासो लिहाज़ करते। मगर उन के तौर तरीक़ों ने फ़ज़ा (वातावरण) को इस तरह बिगाड़ रखा था कि कोई उन की हम दर्दी व पास दारी के लिये आमादा नज़र न आता था। पैग़म्बर (स.) के बरगुज़ीदा सहाबियों पर जो ज़ुल्मों सितम ढाया गया था उस के क़बाइले अरब में उन के खिलाफ़, ग़मो ग़ुस्सा की लह्र दौड़ा रखी थी। हर शख्स पेचो ताब खा रहा था और उन की खुद सरी व बेराह को नफ़रत की निगाह से देखता था। चुनांचे हज़रते अबूज़र की तौहीनो तज़लील और जिलावतनी के सबब से बनी ग़फ्फ़ार और उन के हलीफ़ बनी ज़ोह्रा, अम्मारे यासिर की पसलियां तोड़ देने के बाइस बनी हज़ील और उन के हलीफ़ क़बीले और मोहम्मद इब्ने अबी बक्र के क़त्ल का सरो सामान करने की वजह से बनी तैम के दिलों में ग़ुस्से का एक तूफ़ान मौजज़न था। दूसरे शहरों के मुसलमान भी उन के उम्माल के हाथों से नालां थे कि जो दौलत की सरशरियों और बादए इशरत की सरमस्तियों में जो चाहते थे कर गुज़रते थे, और जिसे चाहते थे उसे पामाल कर के रख देते थे, न उम्हें मर्कज़ की तरफ़ से इताब का डर था, और किसी बाज़पुर्स का अन्देशा। लोग उन के पंजए इसतिबदाद से निकल ने के लिये फड़फड़ाते थे मगर कोई उन के कर्बों अज़ीयत की सदायें सुनने के लिये आमादा न होता था। नफ़्रत के जज़बात उभर रहे थे, मगर उनके दबाने की कोई फ़िक्र न की जाती थी, सहाबा भी उन से बद दिल हो चुके थे क्यों कि वह देख रहे थे कि अम्ने आलम तबाह, नज़्मो नसक़ तहो बाला और इस्लामी खदोखाल मस्ख किये जा रहे हैं। नादारों फ़ाक़ा कश टुकड़ों को तरस रहे हैं और बनी उमैया के हां हुन बरस रहा है। खिलाफ़त शिकम पुरी का ज़रीआ और सरमाया अन्दोज़ी का वसीला बन कर रह गई है लिहाज़ा वह भी उन के क़त्ल के लिये ज़मीन हमवार करने में किसी से पीछे न थे, बल्कि उन्हीं खुतूत व पैग़ामात की बिना पर कूफ़ा, बसरा, और मिस्र के लोग मदीने में आ जम्अ हुए थे। चुनांचे अहले मदीना के इस रवैये को देखते हुए हज़रते उस्मान ने मुआविया को तहरीर किया कि :--

'' वाज़ेह हो कि अहले मदीना काफ़िर हो गए हैं और इताअत से मुह फेर लिया है और बैअत तोड़ डाली है। तुम शाम के लड़ने भिड़ने वालों को तेज़ व तुन्द सवारियों पर मेरे तरफ़ भेजो ।'' (तबरी जिल्द 3 सफ़्हा 402)

मुआविया ने इस ख़त के पहुंचने पर जो तर्ज़े अमल इखतियार किया उस से भी सहाबा की हालत पर रौशनी पड़ती है। चुनांचे तबरी ने उस के बाद लिखा है कि :--

'' जब मुआविया को यह ख़त मिला तो उस ने तवक़क़ुफ़ किया और अस्हाबे पैग़म्बर (स.) की खुल्लम खुल्ला मुखालिफ़त को बुरा जाना चूंकि उसे मअलूम हो चुका था कि वह उन की मुखालिफ़त पर यक जेह्ती से मुत्तफ़िक़ हैं ।''

इस वाक़िआत के पेशे नज़र हज़रत उसमान के क़त्ल को वक्ती जोश और हंगामी जज़्बे का नतीजा क़रार देकर चंन्द बलवाइयों के सर थोप देना, हक़ीक़त पर पर्दा डालना है। जब कि उन की मुख़ालिफ़त के तमाम अनासिर मदीने ही में मौजूद थे और बाहर से आने वाले तो उन की आवाज़ पर दुख दर्द की चारा जूई के लिये जम्अ हुए थे जिन का मक़सद सिर्फ़ इस्लाहे हाल (वर्तमान में सुधार) था। न क़त्लो खूंरेज़ी। अगर उन की दाद फ़र्याद सुन ली जाती तो इस खून खराबे तक कभी नौबत न पहुंचती। मगर हुआ यह कि अहले मिस्र हज़रत उसमान के दूध शरीक भाई अब्दुल्लाह इब्ने सअद इब्ने अबी सर्ह के ज़ुल्मो तशद्दुद से तंग आकर मदीने की तरफ़ बढ़े और शहर के क़रीब वादिए ज़ी खशब में पड़ाव जाल दिया तो एक शख्स के हाथ ख़त भेज कर हज़रत उसमान से मुतालबा किया कि उन के मज़ालिम मिटाए जायें, मौजूदा रविश का बदला लिया जाए और आइन्दा के लिये तौबा की जाए। मगर आप ने जवाब देने के बजाय उस शख़्स को घर से निकलवा दिया और उन के मुतालबे को क़ाबिले एतिना न समझा, जिस पर वह लोग इस ग़ुरुरो तुग़यान के खिलाफ़ आवाज़ बलन्द करने के लिये शहर के अन्दर दाखिल हुए और लोगों से हुकूमत की सिमत रानियों के साथ उस तर्ज़े अमल का भी शिकवा किया। इधर कूफ़ा और बसरा के भी सैकड़ों आदमी अपने शिक्वे शिकायत लेकर मदीना आए हुए थे, जो इनके हमनवा हो कर अहले मदीना की पुश्त पनाही पर आगे बढ़े और हज़रते उसमान को पाबन्दे मसकन बना लिया। मगर उन के लिये मस्जिद में आने जाने के लिये कोई रुकावट न थी। लेकिन उन्हों ने पहले ही जुमा में जो खुत्बा दिया उस में उन लोगों को सख्त अल्फ़ाज़ में बुरा भला कहा और मल्ऊन तक क़रार दिया। जिस पर लोगों ने मुशतइल हो कर उन पर संगरेज़े फ़ेंके। जिस से बेहाल हे कर मिंबर से निचे गिर पड़े और चन्द दिनों के बाद उन के मस्जिद में आने जाने पर भी पाबन्दी आइद कर दी गई।

जब हज़रत उसमान ने इस हद तक हालात बिगड़े हुए देखे तो बड़ी लजाजत से अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) से ख़्वाहिश की कि वह उन के लिये छुटकारे की कोई सबील करें और जिस तरह बन पड़े उन लोगों को मुतफ़र्रिक़ कर दें। हज़रत ने फ़रमाया मैं किस क़रारदाद पर उन्हें जाने के लिये कहूं जब कि उन के मुतालबात हक़ बजानिब हैं। हज़रत उसमान ने कहा कि मैं इस का इख्तियार आप को देता हूं आप उन से जो भी मुआहदा करेंगे मैं उस का पाबन्द रहूंगा। चुनांचे हज़रत मिस्रियों से जाकर मिले और उन से बात चीत की और वह इस शर्त पर वापिस जाने के लिये आमादा हो गये कि तमाम मज़ालिम मिटाए जायें और इब्ने अबी सर्ह को मअज़ूल कर के उस की जगह मोहम्मद इब्ने अबी बक्र को मुक़र्रर किया जाए। हज़रत ने पलट कर उन का मुतालबा हज़रत उसमान के सामने रखा जिसे उन्हों ने बग़ैर किसी पसो पेश के मान लिया और कहा कि इन तमाम मज़ालिम से उहदा बरआ होने के लिये कुछ मोहलत होना चाहिये। हज़रत ने फ़रमाया जो चीज़ें मदीने से मुतअल्लिक़ हैं उन में मोहलत के कोई मअनी नहीं, अलबत्ता दूसरी जगहों के लिये इतना वक़्फ़ा दिया दा सकता है कि तुम्हारा पैग़ाम वहां तक पहुंच सके। उन्हों ने कहा कि नहीं मदीने के लिये भी तीन दिन की मोहलत होना चाहिये। हज़रत ने मिस्रियों से बात चीत करने के बाद उसे भी मंज़ूर कर लिया उन की तमाम ज़िम्मेदारी अपने सर ले ली और वह लोग हज़रत के कहने से मुनतशिर हो गए। कुछ मोहम्मद इब्ने अबी बक्र के हमराह मिस्र को चले गए और कुछ लोग वादिये ज़ी खशब में आ कर ठहर गए, और यह मुआमला रफ़ा दफ़ा हो गया। इस वाक़िए के दूसरे दिन मर्वान ने हज़रत उसमान से कहा कि खैर यह लोग तो चलते बने, मगर दूसरे शहरों से आने वालों की रोक थाम के लिये आप एक बयान दें ताकि वह इधर का रुख न करें और अपनी अपनी जगह पर मुतमइन हो कर बैठे रहें। और वह बयान यह हो कि कुछ लोग मिस्र के झूट सच बातें सुन कर मदीने में जम्अ हो गए थे और जब उन्हें यह मालूम हुआ कि वह जो सुनते थे ग़लत था, तो वह मुतमइन होकर वापस चले गए हैं। हज़रत उसमान ऐसा सरीह झू़ट बोलना न चाहते थे मगर मर्वान ने कुछ ऐसा चकमा दिया कि वह आमादा हो गए और मस्जिदे नबवी में खुत्बा देते हुए फ़रमाया :--

'' इन मिस्रीयों को अपने ख़लीफ़ा के मुतअल्लिक़ कुछ ख़बरें मिली थीं और जब उन्हें यक़ीन हो गया कि वह सब ग़लत और बे सरो पा थीं तो वह अपने शहरों की तरफ़ पलट गए।'''

यह कहना था कि मस्जिद में एक हुल्लड़ मच गया और लोगों ने पुकार पुकार कर कहने शुरुउ किया कि ऐ उसमान ! तौबा करो, अल्लाह से डरो, यह क्या झूट कह रहे हो। हज़रत उसमान इस हड़बोंग पर सिटपिटा कर रह गए और तौबा करते ही बनी। चुनांचे क़िबले की तरफ़ रुख कर के अल्लाह की बारगाह में गिड़गिड़ाए और फिर घर पलट आए।

अमीरुल मोमिनीन ने ग़ालिबन इसी वाक़िए के बाद हज़रत उसमान को यह मशविरा दिया कि तुम साबिक़ा लग़ज़िशों से खुल्लम खुल्ला तौबा करो, ताकि शोरिशें हमेशा के लिये खत्म हो जायें। वरना कल को कहीं और के लोग आ गए तो फिर मुझे चिम्टोगे कि तुम्हारी गुलू ख़लासी कराऊं। चुनांचे उन्हों ने मस्जिदे नबावि में खुत्बा दिया। जिस में अपनी ग़लतियों का एतिराफ़ करते हुए तौबा की और आइन्दा मोह्तात रहने का अह्द किया, और लोगों से कहा कि जब मैं मिंबर से नीचे उतरूं तो तुम्हारे नुमाइन्दे मेरे घर पर आएं, मैं तुम्हारी शिकायतों का इज़ाला करुंगा और तुम्हारे मुतालबे पूरे करुंगा। जिस पर लोगोंने आप के इस इक़दाम को बहुत सराहा और बड़ी हद तक दिली कुदूरतों को आंसुओं से धो डाला। यहां से फ़ारिग़ हो कर जब दौलत सरा पर पहुंचे, तो मर्वान ने कुछ कहने की इजाज़त चाही। मगर हज़रत उसमान की ज़ौजा नाइला बिन्ते फ़राफ़सा मानें हुई और मर्वान से मुखातिब हो कर कहा कि खुदा के लिये तुम चुप रहो, तुम कोई ऐसी ही बात कहोगे जो इन के लिये मौत का पेश ख़ैमा बन कर रहेगी। मर्वाम ने बिगड़ कर कहा कि तुम्हें इन मुआमलात में दख्ल देने का कोई हक़ नही, तुम उसी की तो बेटी हो जिसे मरते दम तक वुज़ू करना भी न आया। नाइला ने झल्ला कर कहा कि तुम ग़लत कहते हो और बोह्तान बांधते हो। मेरे बाप को कुछ कहने से पहले ज़रा अपने बाप का हुल्या भी देख लिया होता। अगर इन बड़े मिया का खयाल न होता तो फिर वोह सुनाती कि लोग कानों पर हाथ रखते। और हर बात में मेरी हां में हां मिलाते। हज़रत उसमान ने जब बात बढ़ते देखी, तो उन्हें रोक दिया और मर्वान से कहा कहो क्या कहना चाहते हो ? मर्वान ने कहा कि यह आप मस्जिद में क्या कह आए हैं और केसी तौबा कर आए हैं ? मेरे नज़दीक तो गुनाह पर अड़े रहना आप की इस तौबा से हज़ार दरजा बेह्तर था। क्योंकि गुनाह ख़्वाह किस हद तक बढ़ जाएं उन के लिये तौबा की गुंजाइश रहती है, और मारे बांधे की तौबा कोई तौबा नहीं होती। कहने को तो आप कह आए हैं, मगर इस सिलाए आम का नतीजा देख लीजिये कि दरवाज़े पर लोगों के ठठ के ठठ लगे हुए हैं, तो आप आगे बढ़िये और पूरा कीजिये उन के मुतालबात को। हज़रत उसमान ने कहा ख़ैर मैं जो कह आया सो कह आया, अब तुम इन लोगों से निपट लो, मेरे बस का रोग नहीं कि मैं उन्हें निपटाऊं। चुनांचे मर्वान आप का ईमा पाकर बाहर आया और लोगों से खिताब कर के कहा कि तुम लोग यहां पर क्यों जमा हो ? क्या धावा बोलने का इरादा है या लूट मार का क़स्द है ? याद रखो कि तुम बआसानी हमारे हाथों से इक़तिदार नहीं छीन सकते और यह खयाल दिलों से निकाल डालो कि तुम हमें दबा लोगे, हम किसी से दब कर रहने वाले नहीं हैं। यहां से मुंह काला करो, खुदा तुम्हें रुसवा व ज़लील करे।

लोगों ने यह बिगड़े हुये तेवर और बदला हुआ नक़शा देखा तो ग़ैज़ो ग़ज़ब में भरे हुये वहां से उठ खड़े हुये और सीधे अमीरुल मोमिनीन के हां पहुंचे और उन्हें सारी रुएदाद सुनाई जिसे सुन कर हज़रत मारे ग़ुस्से के पेचो ताब खाने लगे, और उसी वक्त उठ कर उसमान के यहां गए और उन से कहा '' वाह सुबहानल्लाह !''' क्या मुसलमानों की दुर्गत बनाई है। तुम ने एक बे बीन व बद किरदार की खातिर दीन से भी हाथ उठा लिया है और अक़्ल को भी जवाब दे दिया। आखिर तुम्हें कुछ तो अपने वादे का पास व लिहाज़ होना चाहिये था। यह क्या कि मर्वान के इशारे पर आंख बन्द कर के चल पड़े। याद रखो कि वह तुम्हें एक ऐसे अंधे कुयें में फ़ेकेगा कि फिर उस से निकल न सकोगे। तुम तो मर्वान की सवारी बन गए हो कि वह जिस तरह चाहे तुम पर सवारी गांठ ले, और जिस राह पर चाहे तुम्हें डाल दे। आइन्दा से मैं तुम्हारे मुआमले में कोई दखल न दूंगा और न लोगों से कुछ कहूं सुनूंगा, अब तुम जानो और तुम्हारा काम।

इतना कह सुन कर हज़रत तो वापस आए और नाइला की बन आई। उन्हों ने हज़रत उसमान से कहा, मैं ने कहती थी कि मर्वान से पीछा छुड़ाइये वरना वह ऐसा कलंग का टीका लगायेगा कि मिटाए न मिटेगा, भला उस के कहने पर क्या चलना कि जो लोगों में बे आबरु और नज़रों से गिरा हुआ हो। अली इब्ने अबी तालिब को मनाइये वरना याद रखिये कि बिगड़े हुए हालात का बनाना न आप के बस में है और न मर्वान के इख्तियार में है। हज़रते उसमान इस से मुतअस्सिर हुए और अमीरिल मोमिनीन के यहां जा पहुंचे और अपनी बे बसी और लाचारी का रोना रोया, उज़्र, मअज़िरत भी की, वादे की पाबन्दी का यक़ीन भी दिलाया। मगर हज़रत ने फ़रमाया कि तुम मस्जिदे नबवी में मिंबरे रसूल (स.) पर खड़े हो कर मुसलमानों के भरे मजमे में एक वादा करते हो, तो उस का ईफ़ा यूं होता है कि जब लोग तुम्हारे यहां पहुंचते हैं तो उन्हें बुरा भला कहा जाता है और ग़ालियां तक दी जाती हैं। जब तुम्हारे क़ौलो क़रार की यह सूरत है कि जिसे दुनिया देख चुकी है, तो किस भरोसे पर मैं आइन्दा के लिये तुम्हारी किसी बात का एतिमाद कर लूं। अब मुझ से कोई तवक्को न रखो। मैं तुम्हारी तरफ़ से कोई ज़िम्मेदारी अपने सर लेने के लिये तैयार नहीं। रास्ते तुम्हारे सामने खुले हुए हैं जो रास्ता चाहो इख्तियार करो, और जिस दर्रे पर चाहो चलो। इस बात चीत के बाद हज़रत उसमान पलट आए और उलटा अमीरुल मोमिनीन को मौरिदे इल्ज़ाम ठहराना शुरुउ कर दिया कि इन की शह पर यह हंगामे उठ रहे हैं, और सब कुछ कर सकने के बावजूद कुछ नहीं करते।