ख़ुत्बा-29


ऐ वह लोगों जिनके जिस्म (शरीर) यकजा और ख़्वाहिशें (इच्छायें) जुदा जुदा हैं। तुम्हारी बातें तो सख्त पत्थरों को भी नर्म कर देती हैं, और तुम्हारा अमल (कर्म) ऐसा है कि जो दुश्मनों को तुम पर दन्दाने आज़ तेज़ करने (लालच से देखने) का मौक़ा (अवसर) देता है। अपनी मज्लिसों (सभाओं) में तो तुम कहते फिरते हो कि यह कर देंगे वह कर देंगे और जब जंग छिड़ ही जाती है तो तुम उस से पनाह मांगने लगते हो। जो तुम को मदद (सहायता) के लिये पुकारे उस की सदा (आवाज़) बे वक़्अत (क़ीमत) और जिस का तुम जैसे लोगों से वासिता (सम्पर्क) पड़ा हो उस का दिल (हृदय) हमेशा बेचैन (सदैव विचलित) है। हीले हवाले हैं ग़लत सलत, और मुझसे जंग में ताख़ीर (विलम्ब) करने की ख़्वाहिशें (इच्छायें) हैं। जैसे ना देहन्द मक़रुज़ अपने क़र्ज़ ख़्वाह (देनदार) को टालने की कोशिश करता है। ज़लील आदमी ज़िल्लत आमेज़ ज़ियादतियों की रोक थाम नहीं कर सकता, और हक़ तो बग़ैर कोशिश के नहीं मिला करता। इस घर के बाद और कोन सा घर है जिस की हिफ़ाज़त (रक्षा) करोगे। और मेरे बाद और किस इमाम के साथ हो कर जिहाद करोगे। ख़ुदा की क़सम ! जिसे तुम ने धोका दिया हो उसके फ़रेब ख़ुर्दा होने में कोई शक (सन्देह) नहीं, और जिसे तुम जेसे लोग मिले हों तो उस के हिस्से में वह तीर आता है जो ख़ाली होता है। और जिस ने तुम को (तीरों की तरह) दुश्मनों पर फेंका हो और पैकान (भाल) भी शिकस्ता (टूटा हुआ) हो। ख़ुदा की क़सम ! मेरी कैफ़ियत (स्थिति) तो अब यह है कि न मैं तुम्हारी किसी बात की तस्दीक़ (पुष्टि) कर सकता हूं और न तुम्हारी नुस्रत (सहायता) की मुझे आस बाक़ी रही है, और न तुम्हारी वजह से (तुम्हारे भरोसे पर) दुश्मन को जंग की धम्की दे सकता हूं। तुम्हें क्या हो गया है ? तुम्हारा मरज़ (रोग) क्या है ? और उसका चारा (उपचार) क्या है ? उस क़ौम (अहले शाम) के अफ़्राद (व्यक्ति) भी तो तुम्हारी शक्लो सूरत के मर्द हैं। क्या बातें ही बातें रहेंगी जाने मुझे बग़ैर, सिर्फ़ ग़फ़लत (अचेतना) व मदहोशा (मदोन्मता) है। तक़वा व पर्हेज़गारी के बग़ैर (बलन्दी की) हिर्स ही हिर्स (लालच ही लालच) है। मगर बिलकुल नाहक़ (नितान्त अनाधिकार)।



जंगे नह्रवान के बाद मुआविया ने ज़हाक इब्ने क़ैसे फ़हरी को चार हज़ार की जम्ईयत के साथ अतराफ़े कूफ़ा में इस मक़्सद से भेजा कि वह उन नवाही में शोरिश व इनतिशार (उपद्रव एंव अशान्ति) फैलाए, और जिसे पाए उसे क़त्ल कर दे और जहां तक हो सके क़त्लो ग़ारत का बाज़ार गर्म करे ताकि अमीरुल मोमिनीन सुकूनो इत्मीनान (सुख शान्ति) से न बैठ सकें। चुनांचे वह इस मक़्सद (अद्देश्य) को सरअंजाम देने के लिये रवाना हुआ, और बेगुनाहों (निर्दोषों) का खून बहाता हुआ और हर तरफ़ तबाही मचाता हुआ मक़ामे सअलबीया तक पहुंच गया। यहां पर हज्जाज (हाजियों) के एक क़ाफ़िले पर हमला (आक्रमण) किया और उन का सारा मालो असबाब लूट लिया और फिर मक़ामे क़त्क़ताना पर सहाबिये रसूल (स.) अब्बुल्लाह इब्ने मसऊद के भतीजे उमर इब्ने अमीस और उस के साथियों को तहे तेग़ कर दिया और यूं ही हर जगह वह्शत व खूंख़्वारी शुरुउ कर दी। अमीरुल मोमिनीन को जब इन ग़ारत गरियों का इन्म हुआ, तो आप ने अपेन साथियों को जंग के लिये बुलाया ताकि इन दरिन्दगियों की रोक थाम की जाए। मगर लोग जंग से पहलू बचाते हुए नज़र आए। आप उन लोगों की सुस्त क़दमी व बद दिली से मुतअस्सिर हो कर बिंबर पर तशरीफ़ ले गए और यह ख़ुत्बा इर्शाद फ़रमाया जिस में उन लोगों को ग़ैरत दिलाई है कि वह बुज़दिलों (कायरों) की तरह जंग से बचने की कोशिश न करें, और अपने मुल्क (स्वदेश) की हिफ़ाज़त (रक्षा) के लिये जवें मर्दों की तरह उठ खड़े हों, और ग़लत सलत हीले हवालों से काम न लें। आखिर हज्र इब्ने अदीये किन्दी चार हज़ार की जम्ईयत के साथ दुश्मन की सरकोबी के लिये उठ खड़े हुए और मक़ामे तदमर पर उसे जा लिया। अभी दोनों फ़रीक़ में मामूली (साधारण) सी झड़प हुई थी कि रात का अंधेरा फ़ैलने लगा, और वह सिर्फ़ अन्नीस आदमी कट्वा कर भग खड़ा हुआ। अमीरुल मोमिनीन की फ़ौज में से भी दो आदमियों ने जामे शहादत पिया।