ख़ुत्बात
 


ख़ुत्बा-18

[ फ़तावा (फ़त्वों, निर्णयों) में उलमा के मुख्तलिफुल आरा (विभित्र मत) होने की मज़म्मत (निन्दा) में फ़रमाया ]

जब उन में से किसी एक के सामने कोई मुआमला (वाद, अभियोग) फ़ैसले (निर्णय) के लिये पेश होता है तो वह अपनी राय (विचार) से उन का हुक्म (निर्णय) लगा देता है। फिर वही मस्अला (वाद) ब ऐनेही (अक्षरश :) दूसरे के सामने पेस होता है वह उस पहले हुक्म (पूर्वादेश) के ख़िलाफ़ (विपरीत) हुक्म (आदेश) लगा देता है, फिर यह तमाम के तमाम (समस्त) क़ाज़ी के पास जम्अ (कत्र) होते है, जिस ने उन्हें क़ाज़ी बना रखा है, तो वह सब रायों (मतों) को सहीह क़रार देता है। हालेंकि (यद्दपि) उन का अल्लाह एक, नबी एक, और किताब एक है। (उन्हें ग़ौर तो करना चाहिये) क्या अल्लाह ने उन्हें इख़तिलाफ़ (मतभेद) कर के उसका हुक्म (आदेश) दिया था। और यह इख़तिलाफ़ (मतभेद) कर के उस का हुक्म बजा लाते हैं या उस ने हक़ीक़तन (वास्तव में) इख़तिलाफ़ कर के उस की नाफ़रमानी (अवज्ञा) करना चाहते हैं। या यह कि अल्लाह ने दीन को अधूरा छोड़ा था और इन के तक्मील (पूर्ण करने) के लिये हाथ बटाने का ख़्वाहिशमन्द (इच्छुक) हुआ था, या यह कि अल्लाह के शरीक (सहयोगी) थे कि उन्हें उस के अह्काम (आदेशों) में दखू़ल देने (हस्तक्षेप करने) का हक़ (अधिकार) हो,और उस पर लाज़िम (अनिवार्य) हो कि वह उस पर रज़ामन्द (सहमत) रहे, या यह कि अल्लाह ने दीन (धर्म) को तो मुकम्मल उतारा था मगर उसके रसूल (स.) ने उसके पहुंचाने और अदा करने में कोताही (उदासीनता) की थी। अल्लाह ने क़ुरआन में तो फ़रमाया है कि हम ने किताब में कोई चीज़ बयान करने में कोताही (उदासीनता) नहीं की और उस में हर चीज़ (वस्तु) का वाज़ेह बयान (स्पष्ट वर्णन) है और यह बी कहा है कि क़ुरआन के बअज़ (अमुक) हिस्से (भाग) बअज़ हिस्सों (अमुक हिस्सों) की तस्दीक़ (पुष्टि) करते हैं और उस में कोई इख़तिलाफ़ (मतभेद) नहीं। चुनांचे अल्लाह का यह इर्शाद है कि अगर यह क़ुरआन अल्लाह के अलावा (अतिरिक्त) किसी और का भेजा होता, तो तुम इस में काफ़ी इख़तिलाफ़ पाते और यह कि इस का ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) ख़ुशनुमा (सुदृश्य) और बातिन गहरा है न इस के अजाइबात मिटने वाले (नाशवान) न इस के लताइफ़ (मृदुलता व स्वच्छता) ख़त्म (समाप्त) होने वाले हैं। जु़मलात (जहालत, अज्ञान) का पर्दा इसी से चाक किया जाता है ।

यह मस्अला (प्रकरण) महल्ले निज़ाअ (विवादग्रस्त) है कि जिस चीज़ पर शरअ (धर्म शास्त्र) की रु से (अनुसार) कोई क़तई दलील क़ाइम (अन्तिम तर्क स्थापित) न हो। आया वाक़े (वास्तव) में उस का कोई हुक्म (निर्णय) होता भी है या नहीं। अबुल हसन अश्अरी और उन के उस्ताद (गुरु) अबू अली जिबाई का मस्लक (मत) यह है कि अल्लाह ने उस के लिये कोई हुक्म (निर्णय) तजवीज़ (प्रस्ताविक) ही नहीं किया बल्कि ऐसे मवारिद (अवसरों) में तश्रीइ व हुक्म (विधान बनाने एंव निर्णय) का इख़तियार (अधिकार) मुज्तहिदीन (धर्म शास्त्रीय विद्धानों) को सौंप दिया है कि वह अपनी सवाबदीद (शुद्ध दृष्टि) से जिसे हराम (वर्जित) ठहरा लें उसे वाक़ई (वास्तव में) हराम (वर्जित) क़रार दे दिया जायेगा। और जिसे हलाल कर दें, उसे वाक़ई हलाल क़रार दिया जायेगा और अगर कोई कुछ कहे और कोई कुछ तो फिर जितनी उन की रायें (मत) होंगीं उतने अह्काम (आदेश) बनते चले जायेंगे और उन में से हर एक का नुक़्तए निगाह (दृष्टिकोण) हुक्मे वाक़ई (वस्तुत: आदेश) का तर्जुमान द्दोतक) होगा। मसलन (उदाहरणार्थ) अगर एक मुजताहिद (धर्मशास्त्रीय विद्धान) की राय यह ठहरी कि नबीज़ (मदिरा, शराब) हराम है और दूसरे मुजतहिद की राय यह हुई कि नबीज़ (मदिरा, शराब) हलाल है तो वह वाक़े (वास्तव में हलाल भी होगी हराम भी) । यअनी (अर्थात्) जो उसे हराम समझे उस के लिये पीना नाजाइज़ है और जो हलाल समझ कर पिये उस के लिये पीना जाइज़ है। चुनांचे शहरिस्तानी इस तस्वीब (मत) के मुतअल्लिक़ तहरीर करते हैं :--

उसूलीयीन का एक गुरोह (रुढ़वादियों का एक वर्ग) इस का क़ाइल है कि जिन मसाइल (प्रकरणों) में इज्तिहाद (धर्म सम्बंधी शोध कार्य) किया जाता है, उन के लिये जवाज़ (औचित्य) व अदमे जवाज़ (अनौचित्य) और हलाल व हराम के एतिबार से (अनुसार) कोई तयशुदा (निशि्चत) हुक्म (आदेश) नहीं होता। बल्कि जो मुजतहिद की राय होती है वही ख़ुदा का हुक्म होता है। क्यों कि हुक्म का क़रार पाना ही इस बात पर मौक़ूफ़ (निर्भर) है कि वह किसी मुजतहिद के नज़रीये (विचारधारा) से तय (निर्णित) हो। अगर यह चीज़ न होगी तो हुक्म भी साबित (सिद्ध) न होगा। और इस मस्लक की बिना पर हर मुज्तहिद अपनी राये में दुरुस्त होगा।

इस सूरत (सि्थति) में मुजतहिद खता (दोष) से इस लिये महफ़ूज़ (सुरक्षित) समझा जाता है कि खता (दोष) तो वहां मुतसव्विर हुआ करती है जहां कोई क़दम वाक़े के खिलाफ़ उठे और जहां कोई वाक़े ही न हो वहां ख़ता के क्या मअनी (अर्थ) । इसके अलावा इस सूरत में भी मुज्तहिद से ख़ता का इम्कान न होगा कि जब यह नज़रीया (विचारधारा) क़ाइम कर लिया जाये कि मुज्तहिदीन की आइन्दा (भविष्य में) जितनी राय होने वाली थीं अल्लाह ने उन से बाखबर (अवगत) होने की बिना पर पहले ही से उतने अह्काम बना रखे हैं कि जिस की वजह से हर राय हुक्म वाक़ई के मुताबिक़ ही पड़ती है। या यह कि उस ने यह इन्तिज़ाम (व्यवस्था) कर रखा है कि बर सबीले इत्तिफ़ाक़ (संयोगवश) उन में से हर एक की राय उन अह्काम में से किसी एक न एक हुक्म से बहर सूरत (प्रत्येक दशा में) मुवाफ़िक़त (सहमति) करेगी।

लेकिन फ़िर्क़ए इमामिया यह है कि अल्लाह ने न किसी को शरीअत साज़ी (शरीअत बनाने) का हक़ दिया है और न किसी चीज़ के हुक्म को मुज्तहिद की राय के ताबे (अधीन) ठहराया है और न आरा (रायों) के मुख़्तलिफ़ (भित्र) होने की सूरत में एक ही चीज़ के लिये वाक़े में मुतअद्दिद (अनेक) अहकामात (आदेश) बनाए हैं। अलबत्ता जब मुज्तहिद की हुक्म वाक़ई (वीस्तविक आदेश) तक रसाई (पहुंच) नहीं हो पाती तो तलाशो तफ़हहुस (खोज का शोध) के बाद जो नज़रीया (विचार धारा) उस का क़रार पाता है उस पर अमल पैरा (कार्यरत) होना उस के लिये और उस के मुक़ल्लिदीन (अनुयाइयों) के लिये किफ़ायत (पर्याप्त) कर जाता है। लेकिन उस की हैसियत सिर्फ हुक्मे ज़ाहिरी की होती है जो हुक्म वाक़ई का बदल है और ऐसी सूरत में हुक्मे वाक़ई के छूट जाने पर वह माज़ूर (विवश) क़रार पा जाता है। क्यों कि उस दरियाए ना पैदा किनार में ग़ोता लगाने और उसकी तह तक पहुंचने में कोई कोशिश प्रयत्न) उठा नहीं रखी। मगर इस पर क्या इख़तियार कि दुरे शाहवार (बड़े मोती) के बजाय ख़ाली सदफ़ (सीप) ही उस के हाथ लगे। लेकिन वह यह नहीं कहता है कि दिखने वाले उसे मोती समझें और मोती के भाव बिके। यह दूसरी बात है कि कोशिशों का परखने वाला उस की भी आधी क़ीमत लगा दे ताकि न उस की मेहनत अकारत जाए और न उस की हिम्मत टूटने पाए।

अगर इस तसवीब (शुद्ध विचार) के उसूल (सिद्धान्त) को मान लिया जाए तो फिर हर फ़त्वे को दुरुस्त और हर क़ौस (कथन) को सहीह मानना पड़ेगा जैसा कि मुबैज़ी ने फ़वातेह में लिखा है :--

हक़ दर इन मस्अला मज़्हबे अश्अरी अस्त पस तवानद बूद कि मज़ाहिबे मुतनाक़िज़ा हमा हक़ बाशन्द ज़िन्हार दर शाने उलमा गुमाने बद मबर व ज़बान बतअने ईशान मकुशा ।

जब मुतज़ाद नज़रीये (परस्पर विरोधी विचार धारायें) और मुखतलिफ़ (विभित्र) फ़त्वे (निर्णय) तक सहीह तस्लीम (स्वीकार) किये जाते हैं तो हैरत (आश्चर्य) है कि बअज़ नुमायां फ़राद के इक़्दामात को खताए इजतिहादी से क्यों तअबीर (अभिप्राय) किया जाता है। जब कि मुज्तहिद के लिये खता (त्रुंटि) का तसव्वुर (कल्पना) ही नहीं हो सकता। अगर अक़ीदए तसवीब (शुद्ध विचारो का विश्वास) सहीह है तो अमीरे शाम (शाम के शासक) और उम्मुल मोमिनीन के इक़दामात (द्वारा उठाए गए क़दम) दुरुस्त मानना पड़ेंगा। और अगर उन के इक़्दामात (कृत कार्यवाहियां) ग़लत समझे जाते हैं तो तसलीम (स्वीकार) कीजिये कि इज्तिहाद ठोकर भी खा सकता है। और तस्वीब का अक़ीदा ग़लत है और यह अपने मक़ाम पर तय होता रहेगा कि उम्मुल मोमिनीन के इज्तिआद में अनूसियत (स्त्रित्व) तो सद्दे राह (बाधक) नहीं होती या अमीरे शामका यह इज्तिहाद था या कुछ और। बहर सूरत (प्रत्येक दशा में) यह तस्वीब का अक़ीदा खताओं (त्रुटियों) के छिपाने और ग़लतियों पर हुक्मे इलाही की नक़ाब डालने के लिये ईजाद (आविष्कार) किया गया था ताकि न मक़सद बर आरियों (उद्देश्य प्राप्तियों) में रोक पैदा हो और न मन मानी कार्यवाहियों के खिलाफ़ कोई ज़बान खोल सके । अमीरुल मोमिनीन ने इस ख़ुत्बे में ऐसे ही लोगों का ज़िक्र किया है जो अल्लाह की राह से कट कर और वहिये इलाही की रौशनी से आंखे बन्द कर के क़ियास व राय (कल्पना एंव अनुमान) के अंधेरों में टाबक टोइयें मारते रहते हैं और दीन (धर्म) को अफ़्कारो आरा (विचारों एंव मतों) की आमाजगाह (केन्द्र) बना कर नित नए फ़त्वे देते रहते है और अपने जी से अह्काम गढ़कर इखतिलाफ़ात (मतभेदों) के शाखसाने (वाद विवाद) छोढ़ते रहते हैं। और फिर तस्वीब की बना पर तमाम मुख्तलिफ़ व मुतज़ाद अह्काम को अल्लाह की तरफ़ से समझ लेते हैं। गोया उन का हर हुक्म वहिये इलाही का तर्जुमान है कि न उन का कोई हुक्म ग़लत हो सकता है और न किसी मोक़े पर वह ठोकर खा सकते हैं। चुनांचे हज़रत इस मस्लक की रद में बयान फ़रमाते है कि :--

(1) जब अल्लाह एक किताब व एक रसूल (स.) एक हैं तो फिर दीन भी एक ही होना चाहिये, और जब दीन एक है तो एक ही चीज़ के लिये मुखतलिफ़ व मुतज़ाद अह्काम क्यों कर हो सकते हैं। क्यों हुक्म में तज़ाद (विरोधाभास) इस सूरत (स्थिति) में हुआ करता है कि जब हुक्म देने वाला पहला हुक्म भूल चुका हो, या उस पर ग़फ़्लत या मदहोशी तारी हो गई हो। या जान बूझ कर उन भूल भुलैयों में चाहता हो, और अल्लाहो रसूल (स.) इन चीज़ो से बलन्द तर हैं। लिहाज़ा इस इखतिलाफ़ को उन की तरफ़ मन्सूब नहीं किया जा सकता। बल्कि यह इखतिलाफ़ात उन लोगों के खयालात व आरा का नतीजा हैं कि जिन्हों ने क़ियास आराइयों से दीन के नुक़ूश को मस्ख करने का तहैया कर लिया था।

(2) अल्लाह ने या तो उन इखतिलाफ़ (मतभेदों) से मनआ किया होगा या इखतिलाफ़ (मतभेद) पैदा करने का हुक्म दिया होगा। अगर हुक्म दिया है तो वह कहां और किस मक़ाम पर है और मुमानिअत (रोकना) सुनना चाहो तो क़ुरआन कहता है :--

इन से कहो क्या अल्लाह ने तुम्हें इजाज़त दे दी है या तुम अल्लाह पर इफ़तिरा (लांछन) करते हो।

यअनी (अर्थात्) हर वह चीज़ जो बहुक्मे खुदा न हो वह इफ़्तिरा (लांछन) है और यह इफ़्तिरा मम्नउ (वर्जित) और हराम (निषिद्ध) है। और इफ़्तिरा पर्दाज़ों (लांछन लगाने वालों) के लिये उक़बा (मृत्योपरान्त जीवन) में न फ़ौजो कामरानी (पद व सफ़लता) है न फ़लाहो बहबूद (हित व भलाई), चुनांचे इर्शाद क़ुद्रत है :--

जो तुम्हारी ज़बानों पर झूटी बातें चढ़ी हुई हैं उन्हें कहा न कहो और न अपनी तरफ़ (ओर) से हुक्म (आदेश) लगाया करो कि यह हलाल है। और यह हराम है कि अल्लाह पर झूट बोह्तान (लांछन) बांधने लगो और जो इफ़्तिरा पर्दाज़ियां करते हैं वह कामयाबी व कामरान से हम किनार न होंगे।

(3) अगर अल्लाह ने दीन (धर्म) को नातमाम (अपूर्ण) रखा है तो उसे अधूरा छोड़ने की यह वजह होगी कि उस ने अपने बन्दों से यह चाहा होगा कि वह शरीअत (धर्म विधान) को पायए तक्मील (पूर्णता) तक पहुंचाने में उस का हाथ बटायें और शरीअत साज़ी (विधायन) में उस के शरीक (सहयोगी) हों तो यह अक़ीदा (विश्वास) सरासर (शिर्क, अनेकेश्वरवाद) है । अगर उस ने दीन को मुकम्मल (पूर्ण) उतारा है तो फिर पैग़म्बर (स.) ने उस के पहुंचाने में कोताही (उदासीनता) की होगी ताकि दूसरों के लिये उस में क़यास व राय (अनुमान एंव विचार) की गुंजाइश रहे तो मआज़ल्लाह (अल्लाह की पनाह) यह पैग़म्बर (स.) की कमज़ोरी औऱ इन्तिखाबे क़ुद्रत (अल्लाह द्वारा चयन) पर बदनुमा धब्बा होगा।

(4) अल्लाह सुब्हानहू ने क़ुरआन में फ़रमाया है कि हम ने किताब में किसी चीज़ को उठा नहीं रखा और हर चीज़ को खोल कर बयान कर दिया है। तो फिर क़ुरआन से हट कर जो हुक्म तराशा जायेगा वह शरीईत से बाहर होगा और उस की असास (अधार) इल्मो बसीरत (ज्ञान एंव चेतना) और क़ुरआनो सुत्रत पर न होगी। बल्कि अपनी ज़ाती राय और अपना ज़ाती फ़ैसला होगा। जिस का दीन व मज़हब से कोई लगाव नहीं समझा जा सकता।

(5) क़ुरआन दीन (धर्म) का मब्ना (मूल आधार) व माखज़ (स्त्रोत) और अह्कामे शरीअत का सरचश्मा (उदगम) है। अगर अह्कामें शरीअत मुख्तलिफ़ (विभित्र) और जुदा जुदा (पृथक-पृथक) होते तो फिर उस में भी इख़तिलाफ़ (मतभेद) होना चाहिये था और उस में इख़तिलाफ़ होता तो यह अल्लाह का कलाम न रहता और जब यह अल्लाह का कलाम है तो फिर शरीअत के अह्काम मुख्तलिफ़ (विभित्र) हो ही नहीं सकते कि तमाम मुख्तलिफ़ (विभित्र) व मुतज़ाद (परस्पर विरोधी) नज़रीयों (विचार धाराओं) को सहीह समझ लिया जाए और क़ियासी फ़त्वों (अनुमान पर आधारित निर्णयों) को उस का हुक्म (आदेश) क़रार दे दिया जाए।
इतना कह सुन कर हज़रत तो वापस आए और नाइला की बन आई। उन्हों ने हज़रत उसमान से कहा, मैं ने कहती थी कि मर्वान से पीछा छुड़ाइये वरना वह ऐसा कलंग का टीका लगायेगा कि मिटाए न मिटेगा, भला उस के कहने पर क्या चलना कि जो लोगों में बे आबरु और नज़रों से गिरा हुआ हो। अली इब्ने अबी तालिब को मनाइये वरना याद रखिये कि बिगड़े हुए हालात का बनाना न आप के बस में है और न मर्वान के इख्तियार में है। हज़रते उसमान इस से मुतअस्सिर हुए और अमीरिल मोमिनीन के यहां जा पहुंचे और अपनी बे बसी और लाचारी का रोना रोया, उज़्र, मअज़िरत भी की, वादे की पाबन्दी का यक़ीन भी दिलाया। मगर हज़रत ने फ़रमाया कि तुम मस्जिदे नबवी में मिंबरे रसूल (स.) पर खड़े हो कर मुसलमानों के भरे मजमे में एक वादा करते हो, तो उस का ईफ़ा यूं होता है कि जब लोग तुम्हारे यहां पहुंचते हैं तो उन्हें बुरा भला कहा जाता है और ग़ालियां तक दी जाती हैं। जब तुम्हारे क़ौलो क़रार की यह सूरत है कि जिसे दुनिया देख चुकी है, तो किस भरोसे पर मैं आइन्दा के लिये तुम्हारी किसी बात का एतिमाद कर लूं। अब मुझ से कोई तवक्को न रखो। मैं तुम्हारी तरफ़ से कोई ज़िम्मेदारी अपने सर लेने के लिये तैयार नहीं। रास्ते तुम्हारे सामने खुले हुए हैं जो रास्ता चाहो इख्तियार करो, और जिस दर्रे पर चाहो चलो। इस बात चीत के बाद हज़रत उसमान पलट आए और उलटा अमीरुल मोमिनीन को मौरिदे इल्ज़ाम ठहराना शुरुउ कर दिया कि इन की शह पर यह हंगामे उठ रहे हैं, और सब कुछ कर सकने के बावजूद कुछ नहीं करते।

इधर तौबा को जो हश्र हुआ सो हुआ। अब दूसरी तरफ़ सुनिये कि जब मोहम्मद इब्ने अबी बक्र हिजाज़ की सरहद तय कर के दरियाए क़ुलज़ुम के कनारे मक़ामे ईला तक पहुंचे तो लोगों की नज़रें एक नाक़ा सवार पर पड़ीं जो अपनी सवारी को इस तरह बगटुट दौड़ाए लिये जा रहा था जेसे दुशमन उसके तआक़ुब में हों। उन लोगों को उस पर कुछ शुब्दा हुआ तो उसे बुला कर पूछा कि तुम कौन हो ? उन ने कहा कि मैं हज़रत उसमान का ग़ुलाम हूं। पूछा कहां का इरादा है ? उस ने कहा मिस्र का। पूछा किसके पास जा रहे गो ? उसने कहा कि वालिये मिस्र के पास। लोगों ने कहा कि वालिये मिस्र तो हमारे हमराह हैं तुम किस के पास जा रहे हो ? उस ने कहा अबी सर्ह के पास जाना है। लोगों ने कहा तुम्हारे पास कोई खत वग़ैरा भी है ? उस ने कहा कि नहीं। पूछा कि किस मक़सद से जा रहे हो ? उस ने कहा कि यह नहीं मालूम। लोगों ने कहा कि इस की जामा तलाशी लेना चाहिये। चुनांचे तलाशी ली गई मगर उस से कोई चीज़ बर आमद न हुई। किनाना इब्ने बशर ने कहा कि ज़रा इस का मशकीज़ा तो देखो। लोगों ने कहा छोड़ो, भला पानी में खत कहां हो सकता है। किनाना ने कहा तुम क्या जानो ये लोग क्या क्या चालें चला करते हैं। चुनांचे मशकीज़ा खोल कर देखा गया तो उस में सीसे की एक नकली थी जिस में खत रखा हुआ था। जब खोल कर पढ़ा गया तो फ़रमाने खिलाफ़त यह था कि, '' जब मोहम्मद इब्ने अबी बक्र अपने हमराहियों के साथ तुम्हारे पास पहुंचे तो उन में से फ़लां का क़त्ल करो, फ़लां के हाथ काटो और फ़लां को जेल में डालो और अपने उहदे पर बरक़रार रहो।''' यह पढ़ कर सब पर सन्नाटा छा गया और हैरत से एक दूसरे का मुह तकने लगे।

अब आगे बढ़ना तो मौत के मुंह में जाना था, चुनांचे उस ग़ुलाम को साथ लेकर सब मदीने की तरफ़ पलट पड़े और वहां पहुंच कर वह खत सहाबा के सामने रख दिया। इस वाक़िए को जिस ने सुना, अंगुश्त बदन्दां हो कर रह गया और कोई ऐसे शख्स न था कि जो हज़रत उसमान को बुरा न कह रहा हो। उस के बाद चन्द सहाबा उन लोगों के हमराह हज़रत उसमान के यहां पहुंचे और वह खत उन के सामने रख दिया और पूछा कि इस खत पर मुह्र किस की है ? कहा कि मेरी। पूछा यह तहरीर किस की है ? कहा कि मेरे कातिब की। पूछा यह ग़ुलाम किस का है ? कहा कि मेरा। पूछा कि यह सवारी किस की है ? कहा कि हुकूमत की। पूछा कि इसे भेजा किस ने है ? फ़रमाया मुझे इस का इल्म नहीं। लोगों ने कहा सुबहानल्लाह ! सब कुछ आप का और आप को यह तक पता न चलने पाए कि यह किस ने भेजा है। जब आप इतने ही बे बस हैं तो छोड़िये खिलाफ़त को और अलग हो जाइये ताकि कोई ऐसे शख्स आए जो मुसलमानों के उमूर की देख भाल कर सकता हो। उन्हों ने कहा कि यह नहीं हो सकता कि मैं उस पैराहनको उतार दूं जो अल्लाह ने मुझे पहनाया है। अलबत्ता तौबा किये लेता हूं। लोगों ने कहा तौबा की भली कही। उसकी तो मिट्टी उसी दिन खराब हो गई थी जब आप के दरवाज़े पर मर्वान आप की तर्जुमानी कर रहा था और रही सही कसर इस खत ने निकाल दी है, हम इन भर्रो में आने वाले नहीं हैं, खिलाफ़त को छोड़िये। अगर आप के भाई बन्द हमारे सद्दे राह हुए तो हम उन्हें रोकेंगे और अगर लड़ने के लिये आमादा हुए तो हम भी लड़ेंगे। न हमारे हाथ शल हैं और न हमारी तलवारें कुन्द हैं। अगर आप मुसलमानों को एक नज़र से देखते हैं और इन्साफ़ के अलमबर्दार हैं तो मर्वान को हमारे हवाले कीजिये ताकि हम उस से बाज़ पुर्स करें कि वह किस के बल बूते पर खत लिक कर मुसलमानों की अज़ीज़ जान से खेलना चाह रहा था। मगर आप ने इस मुतालबे को ठुकरा दिया और मर्वान को उन के हवाले करने से इन्कार कर दिया जिस पर लोगों ने कहा कि फिर यह खत भी आप ही के हुक्म से लिखा गया है। बहर सूरत सुधरे हुए हालात फिर से बिगड़ गए, और उन्हें बिगड़ना ही चाहिये था। क्योंकि मत्लूबा मुद्दत के गुज़र जाने के बावजूद हर चीज़ जूं की तूं थी, और राई बराबर भी इधर से उधर न हुई थी। चुनांचे तौबा का अन्जाम देखने के लिये वादिए खशब में जो लोग ठहरे हुए थे, वह भी फिर सैलाब की तरह बढ़े, और मदीना की गलियों में फैल गए और हर तरफ़ से नाका बन्दी कर के उन के घर का मुहासिरा कर लिया।

इन्हीं मुहासिरे के दिनों में पैग़म्बर के एक सहाबी नेयार इब्ने अयाज़ ने हज़रत उसमान से बात चीत करना चाही और उन के यहां पहुंच कर उन्हें पुकारा। जब उन्हों ने ऊपर से झाक कर देखा तो आप ने कहा, ऐ उसमान ! खुदा के लिये इस खिलाफ़त से दस्त बर्दार हो जाओ, और मुसलमानों को इस खून खराबे से बचाओ, अभी वह बात कर ही रहे थे कि हज़रत उसमान के आदमियों में से एक ने उन्हें तीर का निसाना बना कर जान से मार डाला। जिस पर लोग भड़क उठे और पुकार कर कहा कि नेयार का क़ातिल हमारे हवाले करो। मगर हज़रत उसमान ने फ़रमाया कि यह नहीं हो सकता कि मैं अपने एक मदद गार को तुम्हारे हवाले कर दूं। इस सीना ज़ोरी ने आग में हवा का काम किया और लोगों ने जोश में आकर उन के घर के दरवाज़े पर आग लगा दी। और अन्दर घुसने के लिये आगे बढ़े कि मर्वान इब्ने हकम, सईद इब्ने आस, और मुग़ीरा इब्ने अखनस अपने अपने जत्थों के साथ मुहासिरा करने वालों पर टूट पड़े और दरवाज़े पर कुश्तो खून शुरुउ हो गया। लोग घर के अन्दर घुसना चाहते थे, मगर उन्हें धकेल दिया जाता था। इतने में अमर इब्ने हज़्म अन्सारी ने कि जिन का मकान हज़रत उसमान के मकान से मुत्तसिल था अपने घर का दरवाज़ा खोल दिया और ललकार कर कहा कि आओ इधर से बढ़ो। चुनांचे मुहासिरा करने वाले उस मकान के ज़रिए काशानए खिलाफ़त की छत पर पहुंच गए और वहां से घर के सहन में उतर कर तलवारें सौत लीं। अभी एक आध झड़प ही होने पाई थी कि हज़रत उसमान के घर वालोंके अलावा उन के हवाख़्वाह और बनी उमैया मदीने की गलियों में भग खड़े हुए, और कुछ उम्मे हबीबा के घर में जा छिपे और जो रह गए वह हज़रत उसमान का हक्के नमक अदा करते हुए उन के साथ क़त्ल हो गए। (तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा व तारीखे तबरी)

आप के क़त्ल पर मुख्तलिफ़ शोअरा ने मरसिये कहे। सरे दस्त अबू हुरैरा के मरसिये का एक शेर पेशे नज़र है :--

'' लोगों को तो आज के दिन सिर्फ़ एक सदमा है लेकिन मुझे बराबर के दो सदमे हैं एक हज़रत उसमान के क़त्ल होने का, और दूसरा अपने थैले के खो जाने का।'''

इन वाक़िआत को देखने के बाद अमीरुल मोमिनीन का मौक़िफ़ वाज़ेह हो जाता है कि न आप उस जमाअत का साथ दे रहे थे जो उन के क़त्ल पर उभार रही थी और न उस गुरोह में लाए जा सकते हैं कि जो उन की हिमायत व मुदाफ़ेअत पर खड़ा हुआ था। बेशक जहां तक हालात इजाज़त देते रहे, वह उन के बचाव की सूरतें उन्हें समझाते रहे और जब यह देखा कि जो कहा जाता है वह अमल किया नहीं जाता, तो आप अपना दामन बचाकर अलग हो गए।

जब दोनों फ़रीक़ को देखा जाता है तो जिन लोगों ने हज़रत उसमान की नुसरत से हाथ उठा लिया था, उन में उम्मुल मोमिनीन आइशा और रिवायते जमहूर के मुताबिक़ अशरए मुबश्शिरा बक़ीया अहले शूरा, अन्सारो मुहाजिरीने अव्वलीन, असहाबे बद्र और दीगर मुमताज़ व जलीलुल क़द्र अफ़राद नज़र आते हैं और दूसरी तरफ़ बारगाहे खिलाफ़त के चन्द ग़ुलाम और बनी उमैया की चन्द फ़र्दें दिखाई देती हैं। अगर मर्वान सईद व इब्ने आस जैसे लोगों को मुहाजिरीने अव्वालीन पर फ़ौक़ियत नहीं दी जा सकती, तो फिर उन के अमल को भी उन के तर्ज़े अमल पर फ़ौक़ियत देना मुश्किल होगा और अगर इजमाअ मख्सूस मवारिद ही के लिये हुज्जत नहीं है तो फिर सहाबा की इस ज़बरदस्त इत्तिफ़ाक़े राय पर अंगुश्त नुमाई मुश्किल होगी।