ख़ुत्बात
 


ख़ुत्बा-16



[ जब मदीने में आप की बैअत हुई तो फ़रमाया ]

में अपने क़ौल (कथन) का ज़िम्मेदार और उस की सेहत (सत्यता) का ज़ामिन हूं। जिस शख्स (व्यक्ति) को उस के दीदेए इबरत (शिक्षा ग्राहण करने वाली दृष्टि) ने गुज़श्ता उकूबतें (गत यातनायें) वाज़ेह तौर (स्पष्ट रूप) से दिखा दी हों, उसे तक़वा (अल्लाह का भय) शुब्हात (शंकाओं) में अंधाधुंद कूदने से रोक लेता है। तुम्हें जान्ना चाहिए कि तुम्हारे लिये वही इबतिलाआत (कष्ट) फिर पलट आए हैं जो रसूल (स.) की बेएसत (घोषणा) के वक्त थे । उस ज़ात की क़सम! जिस ने रसूल (स.) को हक्को सदाकत (अधिकार एंव सत्य) के साथ भेजा, तुम बुरी तरह तहो बाला (उलट-पुलट) किये जाओगे और इस तरह छांटे जाओगे जिस तरह छलनी से किसी चीज़ छाना जाता है। और इस तरह ख़लत मलत (मिश्रण) किये जाओगे जिस तरह (चमचे से हण्डिया) यहां तक कि तुम्हारे अदना (निकृष्ट) आला (श्रेष्ठ) और आला अदना हो जायंगे। ख़दा की कसम! मेंने कोई बात पर्दे में नहीं रखी, न कभी किज़ब बयानी (झूट बोलने) से काम लिया है। मुझे इस मक़ाम (स्थान) और इस दिन के पहले ही से ख़बर दी जा चुकी है। मालूम होना चाहिये कि गुनाह (पाप) उन सर्कश (अवज्ञाकारी) घोड़ों के मानिन्द (समान) हैं जिन पर उनके सवारों को सवार कर दिया गया हो और उन की बागें (लगामें) भी उतार दी गई हों और वह ले जाकर उन्हें दोज़ख (नर्क) में फ़ाद पड़े, और तक़वा (परहेज़गारी) राम की हुई सवारियों के मानिन्द (समान) हैं जिन पर उन के सवारों को सवार किया गया हो इस तरह से कि बागें उन के हाथ में दे दी गई हों और वह उन्हें (बइतमीनान) ले जा कर जत्रत (स्वर्ग) में उतार दें। एक हक़ (सत्य) होता है और एक बातिल (असत्य) और कुछ हक़ वाले होते हैं कुछ बातिल वाले। अब अगर बातिल ज़ियादा हो गया तो यह पहले भी बहुत होता रहा है और अगर हक़ कम हो गया है तो बसा औक़ात (बहुधा) ऐसा हुआ है और बहुत मुमकिन (सम्भव) है कि वह इस के बाद बातिल पर छा जाए। अगर चे काम ही होता है कि कोई चीज़ पीछे हट कर आगे बढे़ ।

अल्लामा रज़ी फ़रमाते हैं कि मुख्तसर (संक्षिप्त) से कलाम में वाक़ई खूबियों के इतने मक़ाम (स्थान) है कि एहसास खूबी का उस के तमाम गोशों (कोनों) को पा नहीं पा सकता और इस कलाम से हैरत व इसतेज़ाब का हिस्सा पसन्दीदगी की मिक़दार (मात्रा) से ज़ियादा होता है। इस हालत के बावजूद जो हम ने बयान की है, इस में फ़साहत के इतने बेशुमार पहलू हैं कि जिन के बयान करने का यारा नहीं। न कोई इनसान उस की अमीक़ गहराइयों तक पहुंच सकता है। मेरी इस बात को वही जान सकता है जिस ने इस फ़न का पूरा पूरा हक़ अदा किया हो और उस के रगो रेशे से वाक़िफ़ हो और जानने वालों के सिवा कोई इन को नहीं समझ सकता ।

[ इसी ख़ुतबे का एक हिस्सा (भाग) यह है ]

जिस के पेशे नज़र (दृष्टिगत) दोज़ख व जन्नत (नर्क एंव स्वर्ग) हो उस की नज़र किसी और तरफ़ नहीं उठ सकती। जो तेज़ क़दम (तीव्र गति से) दौड़ने वाला है वह निजात याफ़्ता (निर्वाण प्राप्त) है। मगर जो इरादतन (जान बूझकर) कोताही (शिथिलता) करने वाला हो उसे तो दोज़ख़ (नर्क) में गिरना है। दायें बायें गुमराही (भ्रष्टता) की राहें (मार्ग) हैं और दरमियानी रास्ता (मध्य मार्ग) ही सिराते मुसतक़ीम (सीधा रास्ता) है। इस रास्ते पर अल्लाह की हमेशा रहने वाली, किताब व नुबुव्वत के आसार (लक्षण) हैं। उसी से शरीअत का निफ़ाज़ (प्रभावीकरण) व इजरा (प्रचलन) हुआ। और उसी की तरफ़ (ओर) आख़िरे कार (अन्ततोगत्वा) बाज़गश्त (लौटकर जाना) है। जिस ने ग़लत इद्दिआ (दअवा) किया वह तबाहो बर्बाद हुआ और जिस ने इफ़तिरा बांधा (लांछन लगाया) वह नाकाम व नामुराद रहा। जो हक़ के मुकाबले में खड़ा होता है, तबाह हो जाता है और इनसान की जहालत (मूर्खता) इस से बढ़ कर क्या होगी कि वह अपनी क़दरो मनज़िलत न पहचाने। वह असल व आसान (मूल व आधार) जो तक़वा पर हो, बर्बाद नहीं होती, और उस के होते हुए किसी क़ौम की किश्ते अमल (कर्म की खेती) बेआब (बिना सिंचाई) व खुश्क (सूखी) नहीं रहती। तुम अपने घर के गोशों (कोनों) में छिप कर बैठ जाओ, आपस के झगड़ों की इसलाह (सुधार) करने वाला सिर्फ़ अपने पर्वरदिगार की हमद करे और भला बुरा कहने वाला अपने ही नफ़्स की मलामत (निन्दा) करे ।

बअज़ नुसखों में मन अब्दय सफ़्ह वहू लिलहक्के हल्क़ा के बाद इन्दा जहलतत्रास भी मर्क़ूम (लिखा) बै। इस बिना पर इस जुम्ले के मअनी होंगे कि जो हक़ की ख़ातिर ख़ड़ा हुआ वह जाहिलों के नज़्दीक तबाहो बर्बाद होता है।

अ़जमतो जलाले इलाही से दिलो दिमाग़ के मुतअस्सिर (प्रभावित) होने का नाम तक़्वा है, जिस के नतीजे में इन्सान की रुह (आत्मा) ख़ौफ़ व खशीयते इलाही से मअमूर (अल्लाह के भय से परिपूर्ण) हो जाती है और उस का लाज़िमी नतीजा यह निकलता है कि इबादतो रियाज़त (आराधना एंव तपस्या) में सरगर्मी (रूचि) पैदा हो जाती है। नामुम्किन है कि दिम में उस का खौफ़ (भय) बसा हो और उसका इज़हार (प्रदर्शन) इन्सान के अफ़आल व अअमाल (कृत्यों एवं कर्मों) से न हो और इबादत व नियाज़ मन्दी (आराधना एंव आज्ञापालन) से चूंकि नफ़्स की इस्लाह (प्राणवायु में सुधार) और रुह की तरबियत (आत्मा प्रशिक्षित) होती है लिहाज़ा जूं जूं (जैसे जैसे) इबादत में इज़ाफ़ा होता है नफ़्स की पाकीज़गी (पवित्रता) बढ़ती जाती है। इसी लिये क़ुरआने करीम में तक़्वा का इतलाक़ (चरितार्थ) कभी खौफ़ो खशीयत पर कभी बन्दगी और नियाज़ मन्दी (सेवा एंव आज्ञापालन) पर और कभी पाकीज़गिये क़ल्बो रुह पर हुआ करता है। चुनांचे, फ़िय्याया फ़त्तक़ून, में तक़्वा से मुराद (अभिप्राय) ख़ौफ़ (भय) है और इत्तकुल्लाह हक्का तुक़ातेह, में तक़्वा से मुराद इबादत व बन्दगी है और मैंय यख्शल्लाहा व यत्तक़हू फ़उलायका हुमुल फ़ाइज़ून, में तक़्वा से मुराद पाकीज़गीये नफ़्स और तहारते क़ल्ब है ।

अहादीस में तक़्वा के तीन दरजे क़रार दिये गए हैं। पहला दरजा यह है कि इन्सान वाजिबात की पाबन्दी और मुहर्रमात से किनारा कसी करे। दूसरा दरजा यह है कि मुस्तहब्बात की भी पाबन्दी करे और मक्रुहात से भी दामन बचाकर रहे । तीसरा दरजा यह है कि शुब्हात में मुब्तला (ग्रस्त) होने के अन्देशे (भय) से हलाल चीज़ों से भी हाथ उठा ले। पहला दरजा अवाम (सर्वसाधारण) का, दूसरा दरजा खास (विशिष्ट व्यक्तियों) और तीसरा दरजा खासुल खास का है । चुनांचे ख़ुदा वन्दे आलम ने इन तीनों दरजों की तरफ़ इस आयत में इशारा किया है :--

जिन लोगों ने ईमान क़बूल (स्वीकार) किया और अच्छे अअमाल (शुभकर्म) बजा लाए उन पर जो वह (पहले) खा पी चुके हैं उस में कुछ गुनाह नहीं, जब उन्हों ने परहेज़गारी इख्तियार कर ली है और ईमान ले आए और नेक काम किये, फ़िर परहेज़गारी की और अच्छे काम किये और अल्लाह अच्छे काम करने वालों को दोस्त रखता है ।

अमीरुल मोमिनीन फ़रमाते हैं कि उसी अमल (क्रिया) के लिये जमाव है जिस की बुनियाद (नींव) तक़्वा पर हो और वही किश्ते अमल (कर्म की खेती) फले फूलेगी जिसे तक़्वा के पानी से सींचा गया हो, क्यों कि इबादत वही है जिस में उबूदीयत (दासिता की भावना) कारफ़र्मा (कार्यरत) हो। जैसा कि अल्लाह सुब्हानहू का इर्शाद है, क्या वह शख्स (व्यक्ति) कि जिस ने अपनी इमारत (भवन) की बुनियाद (नींव)

खुदा के खौफ़ (भय) और उसकी खुशनूदी (प्रसत्रता) पर रखी है, वह बेहतर (अच्छा) है या जिस ने अपनी इमातर की बुनियाद एक गिरने वाली खाई के किनारे पर रखी कि जो उसे ले कर जहत्रम की आग में गिर पड़े।

चुनांचे हर वह एतिक़ाद (श्रद्दा) जिस की असास (आधार) इल्मो यक़ीन (ज्ञान एंव विश्वास) पर न हो, उस इमारत (भवन) के मानिन्द (समान) है जो बग़ेर बुनियाद (नींव) के खड़ी की गई हो जिस में सबात (दृढ़ता) व क़रार (स्थिरता) नहीं हो सकता और हर वह अमल (कर्म) जो बग़ैर तक़्वा के हो उस क खेती के मानिन्द (कृषि के समान) है जो आबयारी (सिंचाई) न होने की वजह (कारण) से सूख जाए।