ख़ुत्बात
 



ख़ुत्बा-11


आपका इरशादे गिरामी

{जब जंगे जमल में अलम (सेना का ध्वज) अपने फ़र्ज़न्द (पुत्र) मोहम्मद बिन हनफ़िया को दिया तो उन से ने ये कलिमात फ़रमाया}


पहाड़ अपनी जगह छोड़ दें मगर तुम अपनी जगह से न हटना । अपने दातों के भींच (जमा) लेना, अपना कासए सर (सर का प्याला) अल्लाह को आरियत (उधार) दे देना । अपने कदम (पावं) ज़मीन (धरती) में गाड़ देना, (दु्ष्टि) रखना और दुशमन की कसरत व ताकत (बहुसंख्या व शक्ति से ) आँखों को बन्द कर (मूंद) लेना और यकीन (विश्वास) रखना कि मदद (सहायता) अल्लाह ही की तरफ़ (ओर) से होती है ।

मोहम्मद इब्ने हनफ़िया

अमीरुल मोमिनीन के साहबज़ादे (सुपुत्र) थे और मादरी निस्बत (मातृ संबंध) से उन्हें इबने हनफ़िया कहा जाता है। उनकी वालिदए गिरामी (माताश्री) का नाम खूला बिन्ते जाफ़र था, जो कबीलाए बनी हनफ़िया के लकब (उपाधि) से याद की जाती थीं। जब अहले यमामा (यमामा वासियों) को मुर्तद (धर्म स्वीकार कर के फ़िर छोड़ देने वाला) करार देकर कत्लो ग़ारत (हत्या एवं विनाश) किया गया और उनकी औरतों (स्त्रियों) को कनीज़ों (बन्दियों) की सूरत (रूप) में मदीने लाया गया, तो उन्के साथ आप भी मदीना वारिद हुईं (आगमन किया) । जब उन्के कबीले (कुटुम्ब) वाले इस पर मुत्तला(अवगत) हुए तो वह (वे) अमीमुल मोमिनीन की ख़िदमत (सेवा) में हाज़िर (उपस्थित) हुए और उन्से ख़्वाहिश (इच्छा) की कि वह उन्हें कनीज़ी (बन्दी, लौड़ी) के दागं से बचा कर उन की ख़ानदानी इज़्ज़त व शराफ़त (पारिवारिक प्रतिष्ठा व श्रेष्ठता) को बचायें। चुनांचे हज़रत ने उन्हें खरीद कर आज़ाद (स्वतन्त्र) कर दिया और बाद में उन्से अक्द (विवाह) किया और मोहम्मद की विलादत (जन्म) हुई।

बेशतर मुवर्रिख़ीन (अधिकांश इतिहासकारों) ने उन की कुनीयत (पुकारने का नाम) अबुलकासिम तहरीर की है। चुनांचे साहबे इस्तीआब ने अबू राशिद इबने हफ्ज़े ज़हरी का यह कौल (कथन) नक़ल किया है कि मेनें साहाबज़ादों में से चार ऐसे अफ़राद (व्यक्ति) देख़े हैं जिन में से हर एक का नाम मोहम्मद और कुनीयत अबुल कासिम थी। मोहम्मद इबने हनफ़िया, मोहम्मद इबने अबी बक्र, मोहम्मद इबने तलहा और मोहम्मद इबने सअद। इसके बाद तेहरीर किया है कि मोहम्मद इबने तलहा का नाम और कुनीयत पैग़म्बर (स.) ने रख़ी थी और वाकिदी ने लिख़ा है कि मोहम्मद इबने अबी बकर का नाम और कुनीयत आइशा ने तज़वीज़ की थी। ब़जाहिर पैग़म्बर अकरम (स.) का मोहम्मद इबने तलहा के लिए इस नाम और कुनीयत का जमअ कर देना दुरुस्त नहीं मालूम होता क्यों की बाज़ रिवायतों से मालूम होता है कि पैग़म्बर इस्लाम (स.) ने उस को अमीरुल मोमिनीन के एक फ़र्ज़न्द (पुत्र) के लिए मख़्सूस (विशिष्ट) कर दिया था और वह मोहम्मद इबने हनफ़िया थे । चुनांचे इबने खल्लकान के ज़िम्न में लिखा है :- लेकिन उन की कुनीयत अबुल कासिम इस बिना (आधार) पर थी जो कहा जाता है कि यह रसूल ख़ुदा (स.) की ख़ुसूसी इजाज़त (विशेष आज्ञा) थी आप ने अली इबने अबीतालिब (अ.स.) से फ़रमाया कि मेरे बाद तुम्हारे यहां एक लड़का पेदा होगा, मेंने उसे अपना नाम और कुनीयत अता (प्रदान) की है और उसके बाद मेरी उम्मत में से किसी के लिए इस कुनीयत और नाम को जमअ करना जाइज़ (उचित) न होगा ।

इस कौल के पेशे नज़र क्यों कर यह सही समझा जा सकता है कि पैग़म्बर इस्लाम (स.) ने इस नाम और कुनीयत को किसी और के लिए भी जमअ कर दिया होगा। जब कि खुसूसी इजाज़त के मानी (अर्थ) ही यह होते हैं कि कोई दूसरा उसमें शरीक न हो। और फ़िर बाज़ लोगों ने इबने तलहा की कुनीयत कासिम के बजाय अबू सुलैमान तेहरीर की है जिस से हमारे मसलक (मत) को मज़ीद ताईद (अग्रेतर समर्थन) हासिल होती है। यूं ही मोहम्मद इबने हनफ़िया की कुनीयत अगर इस बिना पर थी कि उन के बेटे का नाम कासिम था, जो फ़ुकाहाए मदीना में से थे, तो हज़रत आइशा की यह कुनीयत तजवीज़ करने के क्या मानी ? और अगर नाम के साथ ही कुनीयत तजवीज़ (प्रस्तावित) कर दी थी तो बाद में मोहम्मद इबने अबी बकर ने क्यों कर गवारा कर लिया होगा ? जब के अमीरुल मोमिनीन के ज़ेरे साया (संरक्षण) पर्वरिश पाने की वजह से पैग़म्बर का इरशाद उनसें मख़फी (गुप्त) नहीं रह सरका था। और फ़िर यह कि अकसर लोगों ने उन की कुनीयत अबू अब्दुर्रहमान लिखी है । जिस से अबूराशिद के कौल को ज़ोफ़ पहुंचता है ।

इनलोगों की कुनीयत का अबुल कासिम होना तो दर किनार ख़ुद मोहम्मद इबने हनफ़िया की भी यह कुनीयत साबित नहीं है। अगरचे इबने खल्लकान ने अमीरुल मोमिनीन के उस फ़र्ज़न्द से कि जिस के लिए पैग़म्बर इस्लाम (स.) ने यह ख़ुसूसीयत करार दी है मोहम्मद इबने हनफ़िया ही मुराद लिया है। मगर अल्लामा मामुकानी तहरीर करते है कि :---


इस हदीस को मोहम्मद इबने हनफ़िया पर मुनतबिक करने में

इबने ख़ल्लकान को इशतिबाह (भ्रम) हुआ है क्यों कि अमीरुल मोमिनीन के उस फ़र्ज़न्द से मुराद कि जिस के अलावा किसी और के लिए नाम और कुन्नियत को जमा करना जाइज़ नही है वह हज़रते हुज्जत (अरवाहुना फ़िदाह) हैं न मोहम्मद इबने हनफ़िया और न उन की कुनीयत अबुल कासिम साबित है। बल्कि अहले सुबत ने मुरादे पैग़म्बर (स.) से ग़ाफ़िल रहने की बिना पर उस से मोहम्मद इबने हनफ़िया को मुराद ले लिया है।

बहरहाल मोहम्मद इबने हनफ़िया सलाह व तकवे में नुमाया, ज़ोहदो इबादत में मुम्ताज़ इल्म व फ़ज़ल में बुलन्द मर्तबा और बाप की शुजाअत (बहादुरी) के विरसेदार (उत्तराधिकारी) थे। जमल व सिफ़्फीन में उन के कारनामों ने उन की शुजाअत और बेजिगरी की ऐसी धाक अरब पर बिठा दी थी कि अच्छे शाहज़ोर आप के नाम से कांप उठते थे। और अमीरुल मोमिनीन को भी उन की हिम्मत व शुजाअत पर नाज़ था और हमेशा मारकों (युध्दों) में उन्हें आगे आगे रख़ते थे। चुनांचे शैख बहाई ने कशकोल में तेहरीर किया है कि अली इबने अबी तालिब (अ.) उन्हें जंगों में पेश पेश रखते थे और इमाम हसन (अ.) व इमाम हुसेन (अ.) को मारकों में पेश कदमी की इजाज़त न देते थे और यह फ़रमाया करते थे कि हुवा वलदी व हुमा इबना रसूलुल्लाह (स.) (यह मेरा बेटा है और वोह दोनों रसूल के बेटे हैं) और जब एक खारिजी ने इबने हनफ़िया से यह कहा कि अली (अ.) तुम्हें जंग के शोलों में धकेल देते हैं और हसन (अ.) और हुसेन (अ.) को बचा ले जाते हैं तो आप ने कहा, अना यमीनेही व हुमा ऐनाहो फ़ा हुवा यद्फ़ो अन ऐनैहे बेयमीनेही, (मैं उन का दस्तो बाज़ू था और वह दोनों बमनज़िल ए आंखों के थे वह हाथ से आंखों की हिफ़ाज़त किया करते थे)। लेकिन अल्लामा मामुकानी ने तलकीहुल मकाल में लिखा है कि .ह इबने हनफ़िया का जवाब नहीं बल्कि ख़ुद अमीरुल मोमिनीन का (अ.) इरशाद है कि जब जंगे सिफ़्फ़ीन में मोहम्मद ने शिकवा आमेज़ लहज़े में आप से इस का ज़िक्र (चर्चा) किया तो आप ने फ़रमाया कि तुम मेरे हाथ हो वोह मेरीं आखें हैं लिहाज़ा हाथ को आखों की हिफ़ाज़त करनी चाहिये। बज़ाहिर यह मालूम होता है कि पहले अमीरुल मोमिनीन (अ.) ने मोहम्मद इबने हनफ़िया को यह जवाब दिया होगा, और बाद में किसी ने मोहम्मद इबने हनफ़िया से इस का ज़िक्र किया होगा तो उन्हों ने इस जवाब को पेश कर दिया होगा कि इस से ज़ियादा फ़सीह जवाब तो हो नहीं सकता। और इस जुमले की बलाग़त से इसी की ताईद होती है यह पहले अली इबने अबी तालिब (अ.) की ज़बाने बलाग़त तर्जुमान से ही निकला है कि जिसे बाद में कोई मुनाफ़ात (टकराव) नहीं। आप ने अब्दुल मलिक इबने मर्वान के दौरे हुकूमत में 65 साल की उम्र में इन्तिकाल फ़रमाया। सिने वफ़ात बाज़ ने सन् 80 हिजरी और बाज़ ने सन् 81 हिजरी लिखी है और महल्ले वफ़ात (म्रत्यु के स्थान) में भी इखतिलाफ़ (भित्रता) है। बाज़ ने मदीना और बाज़ ने ईलह और बाज़ ने ताइफ़ तहरीर किया है।


जब जंगे जमल में मोहम्मद इबने हनफ़िया को मैदान की तरफ़ भेजा तो उन से फ़रमाया कि बेटा कोहे अज़मी सबात (साहस एंव द्ढ़ता का पहाड़) बन कर दुशमन के सामने इस तरह जम जाओ कि तुम्हें फ़ोज के रेले जुंमबिश न दे सकें। और दांत पीस कर दुशमन पर हमला करो, क्यों की दांत पर दांत जमा लेने से सर के आसाब (पटठों) में तनाव पेदा होता है जिस से तलवार का वार उचट जाता है। जैसा कि दूसरे मकाम पर फ़रमाया है, दांतों को भीच लो कि इस से तलवार की धार सर से उचट जाती है। फ़िर फ़रमाते हैं कि बेटा, अपना सर अल्लाह को आरियत दे दो ताकि इस हयाते फ़ानी (नाशवर जीवन) के बदले हयाते बाकी (अनशवर जीवन) हासिल कर सको। क्यों कि आरियत (मंगनी) दी हुई चीज़ के वापस लेने का हक होता है, लिहाज़ा जानसे बेनियाज़ (बेपर्वा) हो कर लड़ो, और अगर ख़्याल जान में अटका रहेगा तो मुहलिकों (जोखिमों) में कदम रखने से हिचकिचाओगे, जिस से तुम्हारी शुजाअत पर हर्फ़ आएगा। और देखो अपने कदमों को डगमगाने न दो, क्यों कि कदमों की लग़ज़िश से दुशमन की हिम्मत बढ़ जाया करती है और उखड़े हुए कदम हरीफ़ (दुशमन) के कदम जमा दिया करते हैं, और आख़री सफ़ों (अन्तिम पंत्तियों) को अपनी मतमहे नज़र (लक्ष्य) बनाओ ताकि दुशमन तुम्हारे अज़म की बलन्दियों से मरऊब हो जायें। और उन की सफ़ों को चीर कर निकल जाने में तुम्हें आसानी हो, और उन की नकल व हरकत (गतिविधियां) भी तुम से मख़फ़ी (छिपी) न रहे। और देखो उन की कसरत (बहुसंख्या) को निगाह में न लाना, वरना हौसला पस्त और हिम्मत टूट जायेगी। इस जिमले (वाक्य) के यह भी मानी (अर्थ) हो सकते हैं कि इस तरंह आखें फाड़ कर न देखना कि हथियारों की चमक दमक में खिरगी (चकाचौंध) पैदा कर दे और दुशमन उस से फ़ाइदा उठा कर वार कर बैठे। और इस चिज़ को हमेशा पेशे नज़र रखो कि कामरानी (विजय) अल्लाह की तरफ़ से होती है, इन यनसुरोकुमुल्लाह फ़ला ग़ालिबुल लकुम। (अगर अल्लाह ने तुम्हारी मदद की तो फ़ीर कोई तुमपर ग़ालिब नहीं आ सकता)


लिहाज़ा माद्दी असबाब (भौतिक साधनों) पर भरोसा करने के बजाय उस की ताईदो नुसरत (समर्थन व सहायता) का सहारा ढूंढो।