कलेमाते क़ेसार
 

401-420

401- एक शख़्स ने आपके सामने अपनी औक़ात से ऊंची बात कह दी, तो फ़रमाया तुम तो पर निकलने से पहले ही उड़ने लगे और जवानी आने से पहले ही बिलबिलाने लगे।


सय्यद रज़ी- शकीर परिन्दा के इब्तिदाई परों को कहा जाता है और सक़ब छोटे ऊंट का नाम है जबके बिलबिलाने का सिलसिला जवाने के बाद शुरू होता है।


(((बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिनके पास इल्म व फ़ज़्ल और कमाल व हुनर कुछ नहीं होता है लेकिन ऊंची महफ़िलों में बोलने का शौक़ ज़रूर रखते हैं जिस तरह के बाज़ ख़ोतबा कमाले जेहालत के बावजूद हर बड़ी से बड़ी मजलिस से खि़ताब करने के उम्मीदवार रहते हैं और उनका ख़याल यह होता है के इस तरह अपनी शख़्सियत का रोब क़ायम कर लेंगे और यह एहसास भी नहीं होता है के रही सही इज़्ज़त भी चली जाएगी और मजमए आम में रूसवा हो जाएंगे।
अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने ऐसे ही अफ़राद को तम्बीह की है जो क़ब्ल अज़ वक़्त बालिग़ हो जाते हैं और बलूगे़ फ़िक्री से पहले ही बिलबिलाने लगते हैंं।)))


402- जो मुख़तलिफ़ चीज़ों पर नज़र रखता है उसकी तदबीरें उसका साथ छोड़ देती हैं।


403- आपसे दरयाफ़्त किया गया के ‘‘लाहौला वला क़ूवता इल्ला बिल्लाह’’ के मानी क्या हैं? तो फ़रमाया के हम अल्लाह के साथ किसी चीज़ का इख़्तेयार नहीं रखते हैं और जो कुछ मिल्कियत है सब उसी की दी हुई है तो जब वह किसी ऐसी चीज़ का इख़्तेयार देता है जिसका इख़्तेयार उसके पास हमसे ज़्यादा है तो हमें ज़िम्मेदारियां भी देता है और जब वापस ले लेता है तो ज़िम्मेदारियों को उठा लेता है।

404- आपने देखा के अम्मार यासिर मग़ीरा बिन ‘ौबा से बहस कर रहे हैं तो फ़रमाया अम्मार! उसे उसके हाल पर छोड़ दो। उसने दीन में से इतना ही हिस्सा लिया है जो उसे दुनिया से क़रीबतर बना सके और जानबूझ कर अपने लिये उमूर को मुश्तबा बना लिया है ताके उन्हीं शुबहात को अपनी लग्ज़िशों का बहाना क़रार दे सके।


(((इब्ने अबी अल हदीद ने मख़ीरा के इस्लामम की यह तारीख़ नक़्ल की है के यह शख़्स एक क़ाफ़िले के साथ सफ़र में जा रहा था एक मक़ाम पर सब को शराब पिलाकर बेहोश कर दिया और फिर क़त्ल करके सारा सामान लूट लिया। इसके बाद जब यह ख़तरा पैदा हुआ के वोरसा इन्तेक़ाम लेंगे और जान काा बचाना मुश्किल हो जाएगा तो भागकर मदीने आ गया और फ़ौरन इस्लाम क़ुबूल कर लिया के इस तरह जान बचाने का एक रास्ता निकल आएगा।
यह शख़्स इस्लाम व ईमान दोनों से बेबहरा था। इस्लाम जान बचाने के लिये इख़्तेयार किया था और ईमान का यह आलम था के बरसरे मिम्बर ‘‘कुल्ले ईमान’’ को गालियाँ दिया करता था और इसी बदतरीन किरदार के साथ दुनिया से रूख़सत हो गया जो हर दुश्मने अली (अ0) का आखि़री अन्जाम होता है।)))


405- किस क़द्र अच्छी बात है के मालदार लोग अज्रे इलाही की ख़ातिर फ़क़ीरों के साथ तवाज़ो से पेश आएं लेकिन इससे अच्छी बात यह है के फ़ोक़रा ख़ुदा पर भरोसा करके दौलतमन्दों के साथ तमकनत से पेश आएं।


(((तकब्बुर और तमकनत कोई अच्छी चीज़ नहीं है लेकिन जहाँ तवाज़ोअ और ख़ाकसारी में फ़ितना व फ़साद पाया जाता हो वरना तकब्बुर और तमकनत का इज़हार बेहद ज़रूरी हो जाता है। फ़ोक़रा के तकब्बुर का मक़सद यह नहीं है के ख़्वाह म ख़्वाह अपनी बड़ाई का इज़हार करें और बेबुनियाद तमकनत का सहारा लें, बल्कि इसका मक़सद यह है के अग़नेया के बजाए परवरदिगार पर भरोसा करें और उसकी के भरोसे पर अपनी बेनियाज़ी का इज़हार करें ताके ईमान व अक़ीदे में इस्तेहकाम पैदा हो और अग़नेया भी तवाज़ो और इन्कार पर मजबूर हो जाएं और इस तवाज़ो से उन्हें भी कुछ अज्र व सवाब हासिल हो जाए)))


406- परवरदिगार किसी शख़्स को अक़्ल इनायत नहीं करता है मगर यह के एक दिन उसी के ज़रिये से हलाकत से निकाल लेता है।


407- जो हक़ से टकराएगा हक़ बहरहाल उसे पछाड़ देगा।


408- दिल आँखों का सहीफ़ा है।


409- तक़वा तमाम एख़लाक़ियात का रास व रईस है।


410- अपनी ज़बान की तेज़ी उसके खि़लाफ़ इस्तेमाल न करो जिसने तुम्हें बोलना सिखाया है और अपने कलाम की फ़साहत का मुज़ाहेरा उस पर न करो जिसने रास्ता दिखाया है।


411- अपने नफ़्स की तरबीयत के लिये यही काफ़ी है के उन चीज़ों से इज्तेनाब करो जिन्हें दूसरों के लिये बुरा समझते हो।


412- इन्सान जवाँमर्दों की तरह सब्र करेगा वरना सादा लौहों की तरह चुप हो जाएगा।


413- दूसरी रिवायत में है के आपने अश्अस बिन क़ैस को उसके बेटे की ताज़ियत पेश करते हुए फ़रमाया के बुज़ुर्गों की तरह सब्र करो वरना जानवरों की तरह एक दिन ज़रूर भूल जाओगे।


414- आपने दुनिया की तौसीफ़ करते हुए फ़रमाया के यह धोका देती है, नुक़सान पहुंचाती है और गुज़र जाती है, अल्लाह ने इसे न अपने औलिया के सवाब के लिये पसन्द किया है और न दुश्मनों के अज़ाब के लिये, अहले दुनिया उन सवारों के मानिन्द हैं जिन्होंने जैसे ही क़याम किया हंकाने वाले ने ललकार दिया के कूच का वक़्त आ गया है और फिर रवाना हो गए।


415- अपने फ़रज़न्द हसन (अ0) से बयान फ़रमाया - ख़बरदार दुनिया की कोई चीज़ अपने बाद के लिये छोड़कर मत जाना के इसके वारिस दो ही तरह के लोग होंगे। या वह होंगे जो नेक अमल करेंगे तो जो माल तुम्हारी बदबख़्ती का सबब बना है वही उनकी नेकबख़्ती का सबब होगा और अगर उन्होंने मासियत में लगा दिया तो वह तुम्हारे माल की वजह सी बदबख़्त होंगे और तुम उनकी मासियत के मददगार शुमार होगे और इन दोनों में से कोई ऐसा नहीं है जिसे तुम अपने नफ़्स पर तरजीह दे सकते हो।


सय्यद रज़ी- इस कलाम को एक दूसरी तरह भी नक़्ल किया गया है के ‘‘यह दुनिया जो आज तुम्हारे हाथ में है कल दूसरे इसके अहल रह चुके हैं और कल दूसरे इसके अहल होंगे और तुम इसे दो में से एक के लिये जमा कर रहे हो या वह शख़्स जो तुम्हारे जमा किये हुए को इताअते ख़ुदा में सर्फ़ करेगा तो जमा करने की ज़हमत तुम्हारी होगी और नेकबख़्ती उसके लिये होगी। या वह शख़्स होगा जो मासियत में सर्फ़़ करेगा तो उसके लिये जमा करके तुम बदबख़्ती का शिकार होगे और इनमें से कोई इस बात का अहल नहीं है के उसे अपने नफ़्स पर मुक़द्दम कर सको और उसके लिये अपनी पुश्त को गराँबार बना सको लेहाज़ा जो गुज़र गए उनके लिये रहमते ख़ुदा की उम्मीद करो और जो बाक़ी रह गए हैं उनके लिये रिज़्क़े ख़ुदा की उम्मीद करो।’’


(((इमाम हसन (अ0) से खि़ताब कसले की अहमियत की तरफ़ इशारा है के इतनी अज़ीम बात का समझना और उससे फ़ायदा उठाना हर इन्सान के बस का काम नहीं है वरना इमामे हसन (अ0) जैसी शख़्िसयत का इन्सान इन नुकात की तरफ़ तवज्जो दिलाने का मोहताज नहीं है और इनका काम ख़ुद ही आलमे इन्सानियत को उन हक़ाएक़ से बाख़बर करना और उन नुकात की तरफ़ मुतवज्जोह करना है।
बहरहाल मसल इन्तेहाई अहम है के इन्सान को अपनी आक़बत के लिये जो कुछ करना है वह अपनी ज़िन्दगी में करना है, मरने के बाद दूसरों से उम्मीद लगाना एक वसवसए ‘ौतानी है और कुछ नहीं है, फिर माल भी परवरदिगार ने दिया है तो उसका फ़ैसला भी ख़ुद ही करना है, चाहे ज़िन्दगी में सर्फ़ कर दे या उसके मसरफ़ का तअय्युन कर दे वरना फ़ायदा दूसरे अफ़राद उठाएंगे और वबाल उसे बरदाश्त करना पड़ेगा।)))


416- एक शख़्स ने आपके सामने अस्तग़फ़ार किया ‘‘अस्तग़फ़ेरूल्लाह’’ तो आपने फ़रमाया के तेरी माँ तेरे मातम में बैठे। यह असतग़फ़ार बलन्दतरीन लोगों का मक़ाम है और इसके मफ़हूम में छः चीज़ें शामिल हैं- 1. माज़ी पर शर्मिन्दगी 2. आइन्दा के लिये न करने का अज़्मे मोहकम 3. मख़लूक़ात के हुक़ूक़ का अदा कर देना के इसके बाद यूँ पाकदामन हो जाए के कोई मवाख़ेज़ा न रह जाए। 4. जिस फ़रीज़े को ज़ाया कर दिया है उसे पूरे तौर पर अदा कर देना। 5- गोश्त (अकल) हराम से नशो नुमा पाता रहा है इसको ग़म व अन्दोह से पिघलाओ यहाँ तक के खाल को हड्डियों से मिला दो के फिर से इन दोनों के दरम्यान नया गोश्त पैदा हो। 6- अपने जिस्म को इताअत के रन्ज से आश्ना करो जिस तरह उसे गुनाह की शीरीनी से लज़्ज़त अन्दोज़ किया है तो अब कहो ‘‘अस्तग़फ़ेरूल्लाह’’।


417- हिल्म व तहम्मुल एक पूरा क़बीला है।


418- बेचारा आदमी कितना बेबस है मौत उससे नेहाँ, बीमारियाँ उससे पोशीदा और उसके आमाल महफ़ूज़ हैं मच्छर के काटने से चीख़ उठता है, उच्छू लगने से मर जाता है और पसीना इसमें बदबू पैदा कर देता है।


419- वारिद हुआ है के हज़रत अपने असहाब के दरम्यान बैठे हुए थे, के उनके सामने से एक हसीन औरत का गुज़र हुआ जिसे उन लोगों ने देखना शुरू किया जिस पर हज़रत ने फ़रमाया-
इन मर्दों की आंखें ताकने वाली हैं और यह नज़र बाज़ी इनकी ख़्वाहिशात को बराँगीख़्ता करने का सबब है। लेहाज़ा अगर तुममें से किसी की नज़र ऐसी औरत पर पड़े जो उसे अच्छी मालूम हो तो उसे अपनी ज़ौजा की तरफ़ मुतवज्जो होना चाहिये क्यूंके यह औरत भी औरत के मानिन्द है यह सुनकर एक ख़ारेजी ने कहा के ख़ुदा इस काफ़िर को क़त्ल करे यह कितना बड़ा फ़क़ीह है, यह सुनकर लोग उसे क़त्ल करने उठे, हज़रत ने फ़रमाया के ठहरो! ज़्यादा से ज़्यादा गाली का बदला गाली से हो सकता है, या इसके गुनाही ही से दरगुज़र करो।


420- इतनी अक़्ल तुम्हारे लिये काफ़ी है के जो गुमराही की राहों को हिदायत के रास्तों से अलग करके तुम्हें दिखा दे।