कलेमाते क़ेसार
 

241-260

241- अल्लाह से डरते रहो चाहे मुख़्तसर ही क्यों न हो और अपने और उसके दरम्यान पर्दा रखो चाहे बारीक ही क्यों न हो।


242- जब जवाबात की कसरत हो जाती है तो अस्ल बात गुम हो जाती है।


243- अल्लाह का हर नेमत में एक हक़ है जो उसे अदा कर देगा अल्लाह उसकी नेमत को बढ़ा देगा और जो कोताही करेगा वह मौजूदा नेमत को भी ख़तरे में डाल देगा।


244-जब ताक़त ज़्यादा हो जाती है तो ख़्वाहिश कम हो जाती है।

(((जब फ़ितरत का यह निज़ाम है के कमज़ोर आदमी में ख़्वाहिश ज़्यादा होती है और ताक़तवर इस क़द्र ख़्वाहिशात का हामिल नहीं होता है तो सियासी दुनिया में भी इन्सान काा तर्ज़े अमल वैसा ही होना चाहिये के जिस क़द्र ताक़त व क़ूवत में इज़ाफ़ा होता जाए अपने को ख़्वाहिशाते दुनिया से बे नियाज़ बनाता जाए और अपने किरदार से साबित कर दे के उसकी ज़िन्दगी निज़ामे फ़ितरत से अलग और जुदागाना नहीं है)))

245- नेमतों के ज़वाल से डरते रहाो के हर बेक़ाबू होकर निकल जाने वाली चीज़ वापस नहीं आया करती है।

246- जज़्बए करम क़राबतदारी से ज़्यादा मेहरबानी का बाएस होता है।



247- जो तुम्हारे बारे में अच्छा ख़याल रखता हो उसके ख़याल को सच्चा करके दिखला दो।



(((ह|य इन्सानी ज़िन्दगी का इन्तेहाई हस्सास नुक्ता है के इन्सान आम तौर से लोगों को हुस्ने ज़न में मुब्तिला कर उससे ग़लत फ़ायदा उठाने की कोशिश करता है और उसे यह ख़याल पैदा हो जाता है के जब लोग शराबख़ाने में देख कर भी यही तसव्वुर करेंगे के तबलीग़े मज़हब के लिये गए थे ताो शराब ख़ाने से फ़ायदा उठा लेना चाहिये हालांके तक़ाज़ाए अक़्ल व दानिश और मुक़तज़ाए शराफ़त व इन्सानियत यह है के लोग जिस क़द्र शरीफ़ तसव्वुर करते हैं उतनी शराफ़त का इसाबात करे और उनके हुस्ने ज़न को सूए ज़न में तब्दील न होने दें)))



248- बेहतरीन अमल वह है जिस पर तुम्हें अपने नफ़्स को मजबूर करना पड़े।

(((इन्सान तमाम आमाल को नफ़्स की ख़्वाहिश के मुताबिक़ अन्जाम देगा तो एक दिन नफ़्स का ग़ुलाम होकर रह जाएगा लेहाज़ा ज़रूरत है के ऐसे अमल अन्जाम देता रहे जहां नफ़्स पर जब्र करना पड़े और उसे इसकी औक़ात से आश्ना बनाता रहे तााके उसके हौसले इस क़द्र बलन्द न हाो जाएं के इन्सान को मुकम्मल तौर पर अपनी गिरफ़्त में ले ले और फिर निजात का कोई रास्ता न रह जाए।

249- मैंने परवरदिगार को इरादों के टूट जाने, नीयतों के बदल जाने और हिम्मताों के पस्तत हो जाने से पहचाना है।

250- दुनिया की तल्ख़ी आख़ेरत की शीरीनी है और दुनिया की शीरीनी आख़ेरत की तल्ख़ी है।

251- अल्लाह ने ईमान को लाज़िम क़रार दिया है शिर्क से पाकक करने के लिये, और नमाज़ को वाजिब किया है ग़ुरूर से बाज़ रखने के लिये, ज़कात को रिज़्क़ का वसीला क़रार दिया है और रोज़े को आज़माइशे इख़लास का वसीला, जेहाद को इस्लाम की इज़्ज़त के लिये रखा है और अम्रे बिलमारूफ़ को अवाम की मसलेहत के लिये, नहीं अनिल मुन्किर को बेवक़ूफ़ों को बुराइयों से रोकने के लिये वाजिब किया है और सिलए रहम अदद में इज़ाफ़ा करने के लिये, क़सास ख़ून के तहफ़्फ़ुज़ का वसीला है और हुदूद का क़याम मोहर्रमात की अहमियत के समझाने का ज़रिया, शराब ख़्वारी को अक़्ल की हिफ़ाज़त के लिये हराम क़रार दिया है और चोरी से इज्तेनाब को इफ़त की हिफ़ाज़त के लिये लाज़िम क़रार दिया है। तर्के ज़िना का लज़ूम नसब की हिफ़ाज़त के लिये और तर्के लवात की ज़रूरत नस्ल की बक़ा के लिये है, गवाहियों को इन्कार के मुक़ाबले में सबूत का ज़रिया क़रार दिया गया है और तर्के कज़्ब को सिद्क़ की शराफ़त का वसीला ठहरा दिया गया है क़यामे अम्न को ख़तरों से तहफ़्फ़ुज़ के लिये रखा गया है और इमामत को मिल्लत की तन्ज़ीम का वसीला क़रार दिया गया है और फ़िर इताअत को अज़मते इमामत की निशानी क़रार दिया गया है।

(((यह इस्लाम का आलमे इन्सानियत पर उमूमी एहसान है के उसने अपने क़वानीन के ज़रिये इन्सानी आबादी को बढ़ाने का इन्तेज़ाम किया है और फ़िर हराम ज़ादों की दर आमद को रोक दिया है। ताके आलमे इन्सानियत में शरीफ़ अफ़राद पैदा हों और यह आलम हर क़िस्म की बरबादी और तबाहकारी से महफ़ूज़ रहे, इसके बाद इसका सिन्फ़े निसवां पर ख़ुसूसी एहसान यह है के इसने औरत के अलावा जिन्सी तस्कीन के हर रास्ते को बन्द कर दिया है, खुली हुई बात है के इन्सान में जब जिन्सी हैजान पैदा होता है तो उसे औरत की ज़रूरत का एहसास पैदा होता है और किसी भी तरीक़े से ज बवह हैजानी माद्दा निकल जाता है तो किसी मिक़दार में सुकून हासिल हो जाता है और जज़्बात का तूफ़ान रूक जाता है, अहले दुनिया ने इस माद्दे के एख़राज के मुख़्तलिफ़ तरीक़े ईजाद किये हैं अपनी जिन्स का कोई मिल जाता है तो हम जिन्सी से तस्कीन हासिल कर लेते हैं और अगर कोई नहीं मिलता है तो ख़ुदकारी का अमल अन्जाम दे लेते हैं और इस तरह औरत की ज़रूरत से बेनियाज़ हो जाते हैं और यही वजह है के आज आज़ाद मुआशरों में औरत अज़ो मोअतल होकर रह गई है और हज़ार वसाएल इख़्तेयार करने के बाद भी इसके तलबगारों की फ़ेहरिस्त कम से कमतर होती जा रही है। इस्लाम ने इस ख़तरनाक सूरतेहाल से मुक़ाबला करने के लिये मुजामेअत के अलावा हर वसीलए तस्कीन को हराम कर दिया है ताके मर्द औरत के वजूद से बेनियाज़ न होने पाए और औरत का वजूद मुआशरे में ग़़ैर ज़रूरी न क़रार पा जाए। अफ़सोस के इस आज़ादी और अय्याशी की मारी हुई दुनिया में इस पाकीज़ा तसव्वुर का क़द्रदान कोई नहीं है और सब इस्लाम पर औरत की नाक़द्री का इल्ज़ाम लगाते हैं, गोया उनकी नज़र में उसे खिलौना बना लेना और खेलने के बाद फेंक देना ही सबसे बड़ी क़द्रे ज़ाती है।)))

252- किसी ज़ालिम से क़सम लेना हो तो इस तरह क़सम लो के वह परवरदिगार की ताक़त और क़ूवत से बेज़ार है अगर इसका बयान सही न हो के अगर इस तह झूठी क़सम खाएगा तो फ़ौरन मुब्तिलाए अज़ाब हो जाएगा आर अगर ख़ुदाए वहदहू लाशरीक के नाम की क़सम खाई तो अज़ाब में उजलत न होगी के बहरहाल तौहीदे परवरदिगार का इक़रार कर लिया।

253- फ़रज़न्द्र आदम (अ0)! अपने माल में अपना वसी ख़ुद बन और वह काम ख़ुद अन्जाम दे जिसके बारे में उम्मीद रखता है के लोग तेरे बाद अन्जाम दे देंगं।

254- ग़ुस्सा जुनून की एक क़िस्म है के ग़ुस्सावर को बद में पशेमान होना पड़ता है और प्शेमान न हो तो वाक़ेअन उसका जुनून मुस्तहकम है।

255-बदन की सेहत का एक ज़रिया हसद की क़िल्लत भी है।





256- ऐ कुमैल! अपने घरवालों को हुक्म दो के अच्छी ख़सलतों को तलाश करने के लिये दिन में निकलें और सो जाने वालों की हाजत रवाई के लिये रात में क़याम करें। क़सम है उस ज़ात की जात हर आवाज़ की सुनने वाली है के कोई शख़्स किसी दिल में सुरूर वारिद नहीं करता है मगर यह के परवरदिगार उसके लिये उस सुरूर से एक लुत्फ़ पैदा कर देता है के इसके बाद अगर इस पर कोई मुसीबत नाज़िल होती है तो वह नशेब में बहने वाले पानी की तरह तेज़ी से बढ़े और अजनबी ऊंटों को हंकाने की तरह उस मुसीबत को हंका कर दूर कर दे।



257-जब तंगदस्त हो जाओ तो सदक़े के ज़रिये अल्लाह से ब्योपार करो।


258-ग़द्दारों से वफ़ा करना अल्लाह के नज़दीक ग़द्दारी है, और ग़द्दारों के साथ ग़द्दारी करना अल्लााह के नज़दीक ऐने वफ़ा है।


259- कितने ही लोग ऐसे हैं जिन्हें नेमतें देकर रफ़्ता रफ़्ता अज़ाब काा मुस्तहक़ बनाया जाता है और कितने ही लोग ऐसे हैं जो अल्लाह की परदापोशी से धोका खाए हुए हैं और अपने बारे में अच्छे अलफ़ाज़ सुनकर फ़रेब में पड़ गए और मोहलत देने से ज़्यादा अल्लाह की जानिब से कोई बड़ी आज़माइश नहीं।



सय्यद रज़ी- कहते हैं के यह कलाम पहले भी गुज़र चुका है मगर यहाँ इसमें कुछ उमदा और मुफ़ीद इज़ाफ़ा है।’’



फ़स्ल

इस फ़स्ल में हज़रत के उन कलेमात को नक़्ल किया गया है जो मोहताजे तफ़सीर थे और फिर उनकी तफ़सीर व तौज़ीह को भी नक़्ल किया गया है।

1-जब वह वक़्त आएगा तो दीन का यासूब अपनी जगह पर क़रार पाएगा और लोग उसके पास इस तरह जमा होंगे जिस तरह मौसमे ख़रीफ़ के क़ज़अ

सय्यद रज़ी-
यासूब उस मुरदार को कहा जाता है जो तमाम उमूर का ज़िम्मेदार होता है और कज़अ बादलों के उन टुकड़ों का नाम है जिनमें पानी न हो।

(((यासूब शहद की मक्खियों के सरबराह को कहते हैं और ‘‘यासूबुद्दीन’’ (हाकिमे दीन व शरीअत) से मुराद हज़रत हुज्जत (अ0) हैं।

2- यह खेा़तीब शहशह (सासा बिन सौहान अबदी)

शहशह उस ख़तीब को कहते हैं जो खि़ताबत में माहिर होता है और ज़बानआवरी या रफ़्तार में तेज़ी से आगे बढ़ता है। इसके अलावा दूसरे मुक़ामात पर शहशह बख़ील और कन्जूस के मानी में इस्तेमाल होता है।

3- लड़ाई झगड़े के नतीजे में क़ोहम होते हैं।

क़ोहम से मुराद तबाहियाँ हैं के यह लोगों को हलाकतों में गिरा देती हैं और उसी से लफ़्ज़े ‘‘कहमतुल अराब’’निकला है, जब ऐसा महत पड़ जाता है के जानवर सिर्फ़ हड्डियों का ढांचा रह जाते हैं और गोया यह उस बला में ढकेल दिये जाते हैं या दूसरे एतबार से क़हतसाली इनको सहराओं से निकालकर शहरों की तरफ़ ढकेल देती है।

4-जब लड़कियां नस्सुलहक़ाक़ (नस्स- आखि़री मन्ज़िल को कहा जाता है) तक पहुँच जाएँ तो उनके लिये दो हयाली रिश्तेदार ज़्यादा हक़ रखते हैं।

नस्सतुलरजल- यानी जहाँ तक मुमकिन था उससे सवाल कर लिया, सस्सुलहकाक़ से मुराद मन्ज़िले इदराक है जो बचपने की आखि़री हद है और यह इस सिलसिले का बेहतरीन कनाया है जिसका मक़सद यह है के जब लड़कियां हद्दे बलूग़ तक पहुंच जाएं तो दो हयाली रिश्तेदार जो महरम भी हों जैसे भाई और चचा वग़ैरह उसका रिश्ता करने के लिये माँ के मुक़ाबले में ज़्यादा हक़ (उलूवियत) रखते हैं और हक़ाक़ से माँ का इन रिश्तेदारों से झगड़ा करना और हर एक का अपने को ज़्यादा हक़दार साबित करना मुराद है जिसके लिये कहा जाता है ‘‘हाक़क़तह हकाक़न’’ - ‘‘जादेलतह जेदाला’’।

और बाज़ लोगों का कहना है के नस्सुल हक़ाक़ कमाले अक़्ल है जब लड़की इदराक की उस मन्ज़िल पर होती है जहां उसके ज़िम्मे फ़राएज़ व एहकाम साबित हो जाते हैं और जिन लोगों ने नस्सुल हक़ाएक़ नक़्ल किया है। इनके यहाँ हक़ाएक़ हक़ीक़त की जमा है यह सारी बातें अबू उबैदुल कासिम बिन सलाम ने बयान की हैं लेकिन मेरे नज़दीक औरत का क़ाबिले शादी और क़ाबिले तसर्रूफ़ हो जाना मुराद है के हक़ाएक़ हिक़्क़ा की जमा है और हिक़्क़ा वह ऊँटनी है जो चैथे साल में दाखि़ल हो जाए और उस वक़्त सवारी के क़ाबिल हो जाती है और हक़ाएक भी हिक़्क़ा ही के जमा के तौर पर इस्तेमाल होता है और यह मफ़हूम अरब के असलूबे कमाल से ज़्यादा हम आहंग है।

5- ईमान एक लुम्ज़ा की शक्ल में ज़ाहिर होता है और फिर ईमान के साथ यह लुम्ज़ा भी बढ़ता रहता है। (लुम्ज़ा सफ़ेद नुक़्ता होता है जो घोड़े के होंट पर ज़ाहिर होता है)
6- जब किसी शख़्स को दीने ज़नून मिल जाए तो जितने साल गुज़र गए हों उनकी ज़कात वाजिब है।

ज़नून उस क़र्ज़ का नाम है जिसके कर्ज़दार को यह न मालूम हो के वह वसूल भी हो सकेगा या नहीं और इस तरह तरह-तरह के ख़यालात पैदा होते रहते हैं और इसी बुनियाद पर हर ऐसे अम्र को ज़नून कहा जाता है जैसा के अश्या ने कहा हैः

‘‘वह जुद ((जुद- सहरा के पुराने कनवीं को कहा जाता है और ज़नून उसको कहा जाता है जिसके बारे में यह न मालूम हो के इसमें पानी है या नहीं)) ज़नून है जो गरज कर बरसने वाले अब्र की बारिश से भी महरूम हो, उसे दरियाए फ़ुरात के मानिन्द नहीं क़रार दिया जा सकता है जबके वह ठाठें मार रहा हो और किश्ती और तैराक दोनों को ढकेल कर बाहर फेंक रहा हो’’

7- आपने एक लश्कर को मैदाने जंग में भेजते हुए फ़रमाया- जहां तक मुमकिन हो औरतों से आज़ब रहो ((यानी उनकी याद से दूर रहो)), उनमें दिल मत लगाओ और उनसे मुक़ारेबत मत करो के यह तरीक़ए कार बाज़ुए हमीयत में कमज़ोरी और अज़्म की पुख़्तगी में सुस्ती पैदा कर देता है और दुश्मन के मुक़ाबले में कमज़ोर बना देता है और जंग में कोशिशे वुसई से रूगर्दां कर देता है और जो उन तमाम चीज़ों से अलग रहता है उसे आज़ब कहा जाता है, आज़ब या उज़ू़ब खाने पीने से दूर रहने वाले को भी कहा जाता है।))




8-वह उस यासिर फ़ालिज के मानिन्द है जो जुए के तीरों का पांसा फेंककर पहले ही मरहले पर कामयाबी की उम्मीद लगा लेता है

‘‘यासिरून’’ वह लोग हैं जो नहर की हुई ऊंटनी पर जुए के तीरों का पांसा फेंकते हैं और फ़ालिज उनमें कामयाब हो जाने वाले को कहा जाता है। ‘‘फ़लज अलैहिम’’ या ‘‘फलजहुम’’ उस मौक़े पर इस्तेमाल होता है जब कोई ग़ालिब आ जाता है जैसा के रिज्ज़ ख़्वाँ शाएर ने कहा हैः

‘‘जब मैंने किसी फ़ालिज को देखा के वह कामयाब हो गया’’

9- ‘‘जब अहमरअरबास होता था (दुश्मन का ख़तरा बढ़ जाता था) तो लोग रसूले अकरम की पनाह में रहा करते थे और कोई शख़्स भी आपसे ज़्यादा दुश्मन से क़रीब नहीं होता था।’’

(((पैग़म्बरे इस्लाम (स0) का कमाले एहतेराम है के हज़रत अली (अ0) जैसे अश्जअ अरब ने आपके बारे में यह बयान दिया है और आपकी अज़मत व हैबत व शुजाअत का एलान किया है, दूसरा कोई होता तो उसके बरअक्स बयान करता के मैदाने जंग में सरकार हमारी पनाह में रहा करते थे और हम न होते तो आपका ख़ात्मा हो जाता लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ0) जैसा साहबे किरदार इस अन्दाज़ का बयान नहीं दे सकता है और न यह सोच सकता है। आपकी नज़र में इन्सान कितना ही बलन्द किरदार और साहेबे ताक़त व हिम्मत क्यों न हो जाए, सरकारे दो आलम (अ0) का उम्मती ही शुमार होगा और उम्मती का मर्तबा पैग़म्बर (स0) से बलन्दतर नहीं हो सकता)))

इसका मतलब यह है के जब दुश्मन का ख़तरा बढ़ जाता था और जंग की काट शदीद हो जाती थी तो मुसलमान मैदान में रसूले अकरम (स0) की पनाह तलाश किया करते थे और आप पर नुसरते इलाही का नुज़ूल हो जाता था और मुसलमानों को अम्न व अमान हासिल हो जाता था।

अहमरअरबास दर हक़ीक़त सख़्ती का केनाया है जिसके बारे में मुख़्तलिफ़ अक़वाल पाए जाते हैं और सबसे बेहतर क़ौल यह है के जंग की तेज़ी और गर्मी को आगणन के तश्बीह दी गई है जिसमें गर्मी और सुखऱ्ी दोनों होती हैं और इसका मवीद सरकारे दो आलम (स0) का यह इरशाद है के आपने हुनैन के दिन क़बीलए बनी हवाज़न की जंग में लोगों को जंग करते देखा तो फ़रमाया के अब वतीस गर्म हो गया है यानी आपने मैदाने कारज़ार की गर्म बाज़ारी को आग के भड़कने और उसके शोले से तश्बीह दी है के वतीस उस जगह को कहते हैं जहाँ आग भड़काई जाती है।

यह फ़स्ल तमाम हो गई और फिर गुज़िश्ता बाब (अक़वाल 259 के आगे) का सिलसिला शुरू हो गया।


260- जब आपको इत्तेला दी गई के माविया के असहाब ने अम्बार पर हमला कर दिया है तो आप ब-नफ़्से नफ़ीस निकल कर नख़ीला तक तशरीफ़ ले गए और कुछ लोग भी आपके साथ पहुंच गए और कहने लगे के आप तशरीफ़ रखें। हम लोग उन दुश्मनों के लिये काफ़ी हैं तो आपने फ़रमाया के तुम लोग अपने लिये काफ़ी नहीं हो दुश्मन के लिये क्या काफ़ी हो सकते हो? तुमसे पहले रिआया हुक्काम के ज़ुल्म से फ़रियादी थी और आज मैं रिआया के ज़ुल्म से फ़रयाद कर रहा हूँ, जैसे के यही लोग क़ाएद हैं और मैं रइयत हूँ। मैं हलक़ाबगोश हूँ और यह फ़रमान रवा।


जिस वक़्त आपने यह कलाम इरशाद फ़रमाया जिसका एक हिस्सा ख़ुत्बे के ज़ैल में नक़्ल किया जा चुका है तो आपके असहाब में से दो अफ़राद आगे बढ़े जिनमें से एक ने कहा के मैं अपना और अपने भाई का ज़िम्मेदार हूँ। आप हुक्म दें हम तामील के लिये तैयार हैं, आपने फ़रमाया के मैं जो कुछ चाहता हूँ तुम्हारा उससे क्या ताल्लुक़ है।