कलेमाते क़ेसार
 

61-80

61- जब तुम्हें कोई तोहफ़ा दिया जाए तो उससे बेहतर वापस करो और जब कोई नेमत दी जाए तो उससे बढ़ाकर उसका बदला दो लेकिन इसके बाद भी फ़ज़ीलत उसी की रहेगी जो पहले कारे ख़ैर अन्जाम दे।


62- सिफ़ारिश करने वाला तलबगार के बाल-व-पर के मानिन्द होता है।


63- अहले दुनिया उन सवारों के मानिन्द हैं जो ख़ुद सो रहे हैं और उनका सफ़र जारी है।


64- अहबाब का न होना भी एक ग़ुर्बत है।


65- हाजत का पूरा न होना ना-अहल से मांगने से बेहतर है।


(((-इन्सान को चाहिये के दुनिया से महरूमी पर सब्र कर ले और जहां तक मुमकिन हो किसी के सामने हाथ न फैलाए के हाथ फैलाना किसी ज़िल्लत से कम नहीं है।)))


66- मुख़तसर माल देने में भी शर्म न करो के महरूम कर देना इससे ज़्यादा कमतर दर्जे का काम है।


67- पाक दामनी फ़क़ीरी की ज़ीनत है और शुक्रिया मालदारी की ज़ीनत है।


(((मक़सद यह है के इन्सान को ग़ुरबत में अज़ीफ़ और ग़ैरतदार होना चाहिये और दौलतमन्दी में मालिक का शुक्रगुज़ार होना चाहिये के इसके अलावा शराफ़त व करामत की कोई निशानी नहीं है।)))


68- अगर तुम्हारे हस्बे ख़्वाहिश काम न हो सके तो जिस हाल में रहो ख़ुश रहो। (के अफ़सोस का कोई फ़ायदा नहीं है)


(((बाज़ ओरफ़ा ने इस हक़ीक़त को उस अन्दाज़ से बयान किया है के ‘‘मैं उस दुनिया को लेकर क्या करूं जिसका हाल यह है के मैं रह गया तो वह न रह जाएगी और वह रह गई तो मैं न रह जाऊंगा)))


69- जाहिल हमेशा अफ़रात व तफ़रीत का शिकार रहता है या हद से आगे बढ़ जाता है या पीछे ही रह जाता है (के उसे हर का अन्दाज़ा ही नहीं है)


70- जब अक़्ल मुकम्मल होती है तो बातें कम हो जाती हैं (के आक़िल को हर बात तोल कर कहना पड़ती है)


71- ज़माना बदन को पुराना कर देता है और ख़्वाहिशात को नया, मौत को क़रीब बना देता है और तमन्नाओं को दूर, यहां जो कामयाब हो जाता है वह भी ख़स्ताहाल रहता है और जो इसे खो बैठता है वह भी थकन का शिकार रहता है।


(((माले दुनिया का हाल यही है के आ जाता है तो इन्सान कारोबार में मुब्तिला हो जाता है और नहीं रहता है तो उसके हुसूल की राह में परेशान रहता है)))

72- जो शख़्स अपने को क़ाएदे मिल्लत बनाकर पेश करे उसका फ़र्ज़ है के लोगों को नसीहत करने से पहले अपने नफ़्स को तालीम दे और ज़बान से तबलीग़ करने से पहले अपने अमल से तबलीग़ करे और यह याद रखो के अपने नफ़्स को तालीम व तरबियत देने वाला दूसरों को तालीम व तरबियत देने वाले से ज़्यादा क़ाबिले एहतेराम होता है।


73- इन्सान की एक-एक सांस मौत की तरफ़ एक-एक क़दम है।


74- हर शुमार होने वाली चीज़ ख़त्म होने वाली है (सांसें) और हर आने वाला बहरहाल आकर रहेगा (मौत)।


75- जब मसाएल में शुबह पैदा हो जाए तो इब्तिदा को देखकर अन्जामकार का अन्दाज़ा कर लेना चाहिये।

76- ज़र्रार बिन हमज़ा अलज़बाई माविया के दरबार में हाज़िर हुए तो उसने अमीरूल मोमेनीन (अ0) के बारे में दरयाफ़्त किया?


(((बाज़ हज़रात ने इनका नाम ज़रार बिन ज़मरह लिखा है और यह इनका कमाले किरदार है के माविया जैसे दुश्मने अली (अ0) के दरबार में हक़ाएक़ का एलान कर दिया और इस मशहूर हदीस के मानी को मुजस्सम बना दिया के बेहतरीन जेहाद बादशाहे ज़ालिम के सामने कलमए हक़ का इज़हार व ऐलान है)))


ज़र्रार ने कहा के मैंने ख़ुद अपनी आंखों से देखा है के रात की तारीकी में मेहराब में खड़े हुए रेशे मुबारक को हाथों में लिये हुए ऐसे तड़पते थे जिस तरह सांप का काटा हुआ तड़पता है और कोई ग़म रसीदा गिरया करता है, और फ़रमाया करते थे-


‘‘ऐ दुनिया, ऐ दुनिया! मुझसे दूर हो जा, तू मेरे सामने बन संवर कर आई है या मेरी वाक़ेअन मुश्ताक़ बन कर आई है? ख़ुदा वह साअत न लाए के तू मुझे धोका दे सके, जा मेरे अलावा किसी और को धोका दे, मुझे तेरी ज़रूरत नहीं है, मैं तुझे तीन मरतबा तलाक़ दे चुका हूँ जिसके बाद रूजूअ का कोई इमकान नहीं है, तेरी ज़िन्दगी बहुत थोड़ी है और तेरी हैसियत बहुत मामूली है और तेरी उम्मीद बहुत हक़ीर ‘ौ है’’ आह ज़ादे सफ़र किस क़द्र कम है , रास्ता किस क़द्र तूलानी है, मन्ज़िल किस क़द्र दूर है और वारिद होने की जगह किस क़द्र ख़तरनाक है।

((( खुली हुई बात है के जब कोई शख़्स‘ाख़्स किसी औरत को तलाक़ दे देता है तो वह औरत भी नाराज़ होती है और उसके घरवाले भी नाराज़ रहते हैं। अमीरूल मोमेनीन (अ0) से दुनिया का इन्हेराफ़ और अहले दुनिया की दुश्मनी का राज़ यही है के आपने उसे तीन मरतबा तलाक़ दे दी थी तो इसका कोई इमकान नहीं था के अहले दुनिया आपसे किसी क़ीमत पर राज़ी हो जाते और यही वजह है के पहले अबनाए दुनिया ने तीन खि़लाफ़तों के मौक़े पर अपनी बेज़ारी का इज़हार किया और उसके बाद तीन जंगों के मौक़े पर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया लेकिन आप किसी क़ीमत पर दुनिया से सुलह करने पर आमादा न हुए और हर मरहले पर दीने इलाही और उसके तालीमाात को कलेजे से लगाए रहे।)))


77- एक मर्दे शामी ने सवाल किया के क्या हमारा ‘ााम की तरफ़ जाना क़ज़ा व क़द्रे इलाही की बिना पर था (अगर ऐसा था तो गोया कोई अज्र व सवाब न होगा) तो आपने फ़रमाया के ‘‘शायद तेरा ख़याल यह है के इससे मुराद क़ज़ाए लाज़िम और क़द्रे हतमी है के जिसके बाद अज़ाब व सवाब बेकार हो जाता है और वादा व वईद का निज़ाम मोअत्तल हो जाता है, ऐसा हरगिज़ नहीं है, परवरदिगार ने अपने बन्दों को हुक्म दिया है तो उनके इख़्तेयार के साथ और नहीं की है तो उन्हें डराते हुए। उसने आसान सी तकलीफ़ दी है और किसी ज़हमत में मुब्तिला नहीं किया है। थोड़े अमल पर बहुत सा अज्र दिया है और उसकी नाफ़रमानी इसलिये नहीं होती है के वह मग़लूब हो गया है और न इताअत इसलिये होती है के उसने मजबूर कर दिया है। उसने न अम्बिया को खेल करने के लिये भेजाा है और न किताब को अबस नाज़िल किया है और न ज़मीन व आसमान पर उनकी दरम्यानी मख़लूक़ात को बेकार पैदा किया है। यह सिर्फ़ काफ़िरों का ख़याल है और कााफ़िरों के लिये जहन्नम में वील है।’’ (आखि़र में वज़ाहत फ़रमाई के क़ज़ा अम्र के मानी में है और हम उसके हुक्म से गए थे न के जब्र व इकराह से)


78- हर्फ़े हिकमत जहां भी मिल जाए ले लो के ऐसी बात अगर मुनाफ़िक़ के सीने में दबी होती है तो वह उस वक़्त तक बेचैन रहता है जब तक वह निकल न जाए और मोमिन के सीने में जाकर दूसरी हिकमतों से मिलकर बहल जाती है।


79- हिकमत मोमिन की गुमशुदा दौलत है लेहाज़ा जहाँ मिले ले लेना चाहिये, चाहे वह हक़ाएक़ से ही क्यों न हासिल हो।


80- हर इन्सान की क़द्र व क़ीमत वही नेकियां हैं जो उसमें पाई जाती हैं।


सय्यद रज़ी-यह वह कलमए क़ुम्मिया है जिसकी कोई क़ीमत नहीं लगाई जा सकती है और उसके हमपल्ला कोई दूसरी हिकमत भी नहीं है और कोई कलम इसके हम पाया भी नहीं हो सकता है।


((( यह अमीरूल मोमेनीन (अ0) का फ़लसफ़ाए हयात है के इन्सान की क़द्र व क़ीमत का ताअय्युन न उसके हसब व नसब से होता है और न क़ौम व क़बीले से, न डिग्रियाँ उसके मरतबे को बढ़ा सकती हैं और न ख़ज़ाने उसको ‘ारीफ़ बना सकते हैं, न कुर्सी उसके मेयार को बलन्द कर सकती हैं और न इक़्तेदार उसके कमालात का ताअय्युन कर सकता है, इन्सानी कमाल का मेयार सिर्फ़ वह कमाल है जो उसके अन्दर पाया जाता है। अगर उसके नफ़्स में पाकीज़गी और किरदार में हुस्न है तो यक़ीनन अज़ीम मरतबे का हामिल है वरना उसकी कोई क़द्र व क़ीमत नहीं है।)))