कलेमाते क़ेसार
 

41-60

41- अपने एक सहाबी से एक बीमारी के मौक़े पर फ़रमाया ‘‘अल्लाह ने तुम्हारी बीमारी को तुम्हारे गुनाहों के दूर करने का ज़रिया बना दिया है के ख़ुद बीमारी में कोई अज्र नहीं है लेकिन यह बुराइयों को मिटा देती है और इस तरह झाड़ देती है जैसे दरख़्त से पत्ते झड़ते हैं, अज्र व सवाब ज़बान से कुछ कहने और हाथ पांव से कुछ करने में हासिल होता है और परवरदिगार अपने जिन बन्दों को चाहता है उनकी नीयत की सिदाक़त और बातिन की पाकीज़गी की बिना पर दाखि़ले जन्नत कर देता है।


सय्यद रज़ी- हज़रत ने बिलकुल सच फ़रमाया है के बीमारी में कोई अज्र नहीं है के यह कोई इस्तेहक़ाक़ी अज्र वाला काम नहीं है, एवज़ तो उस अमल पर भी हासिल होता है जो बीमारियों वग़ैरह की तरह ख़ुदा बन्दे के लिये अन्जाम देता है लेकिन अज्र व सवाब सिर्फ़ उसी अमल पर होता है जो बन्दा ख़ुद अन्जाम देता है और मौलाए कायनात ने इस मक़ाम पर एवज़ और अज्र व सवाब के इसी फ़र्क़ को वाज़ेह फ़रमाया है जिसका इदराक आपके इल्मे रौशन और फ़िक्र साएब के ज़रिये हुआ है।


(((-मक़सद यह है के परवरदिगार ने जिस अज्र व सवाब का वादा किया है और जिसका इन्सान इस्तेहक़ाक़ पैदा कर लेता है वह किसी न किसी अमल ही पर पैदा होता है और मर्ज़ कोई अमल नहीं है, लेकिन इसके अलावा फ़ज़्ल व करम का दरवाज़ा खुला हुआ है और वह किसी भी वक़्त और किसी भी ‘ाख़्स के ‘ाामिले हाल किया जा सकता है, इसमें किसी का कोई इजारा नहीं है।)))


42- आपने ख़बाब बिन अलारत के बारे में फ़रमाया के ख़ुदा ख़बाब इब्ने अलारत पर रहमत नाज़िल करे। वह अपनी रग़बत से इस्लाम लाए, अपनी ख़ुशी से हिजरत की और बक़द्रे ज़रूरत सामान पर इक्तेफ़ा की। अल्लाह की मर्ज़ी से राज़ी रहे और मुहाहिदाना ज़िन्दगी गुज़ार दी।


(((-हक़ीक़ते अम्र यह है के इन्सानी ज़िन्दगी का कमाल यह नहीं है के अल्लाह से राज़ी हो जाए, यह काम निस्बतन आसान है के वह सरीअर रेज़ा है। कभी मामूली अमल से भी राज़ी हो जाता है और कभी बदतरीन अमल के बाद भी तौबा से राज़ी हो जाता है। सबसे मुश्किल काम बन्दे का ख़ुदा से राज़ी हो जाना है के वह किसी हाल में ख़ुश नहीं होता है और इक़तेदारे फ़िरऔन व दौलते क़ारून पाने के बाद भी या मग़रूर हो जाता है या ज़्यादा का मुतालेबा करने लगता है। अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने ख़ेबाब के इसी किरदार की तरफ़ इशारा किया है के वह इन्तेहाई मसाएब के बावजूद ख़ुदा से राज़ी रहे और एक हर्फ़े शिकायत ज़बान पर नहीं लाए और ऐसा ही इन्सान वह होता है जिसके हक़ में तौबा की बशारत दी जा सकती है और वह अमीरूल मोमेनीन (अ0) की तरफ़ से मुबारकबाद का मुस्तहक़ होता है।)))


43- ख़ुशाबहाल उस शख़्स का जिसने आख़ेरत को याद रखा, हिसाब के लिये अमल किया। बक़द्रे ज़रूरत पर क़ानेअ रहा और अल्लाह से राज़ी रहा।


44- अगर मैं इस तलवार से मोमिन की नाक भी काट दूं के मुझसे दुश्मनी करने लगे तो हरगिज़ न करेगा और अगर दुनिया की तमाम नेमतों मुनाफ़िक़ पर उण्डेल दूँ के मुझसे मोहब्बत करने लगे तो हरगिज़ न करेगा। इसलिये के इस इक़ीक़त का फ़ैसला नबीए सादिक़ की ज़बान से हो चुका है के ‘‘या अली (अ0)! कोई मोमिन तुमसे दुश्मनी नहीं कर सकता है और कोई मुनाफ़िक़ तुमसे मोहब्बत नहीं कर सकता है।’’


45- वह गुनाह जिसका तुम्हें रन्ज हो, अल्लाह के नज़दीक उस नेकी से बेहतर है जिससे तुममें ग़ुरूर पैदा हो जाए।


(((अगरचे गुनाह में कोई ख़ूबी और बेहतरी नहीं है, लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है के गुनाह के बाद इन्सान का नफ़्स मलामत करने लगता है और वह तौबा पर आमादा हो जाता है और ज़ाहिर है के ऐसा गुनाह जिसके बाद एहसासे तौबा पैदा हो जाए उस कारे ख़ैर से यक़ीनन बेहतर है जिसके बाद ग़ुरूर पैदा हो जाए और इन्सान अख़्वाने शयातीन की फ़ेहरिस्त में शामिल हो जाए)))


46- इन्सान की क़द्र व क़ीमत उसकी हिम्मत के एतबार से होती है और उसकी सिदाक़त उसकी मर्दान्गी के एतबार से होती है, शुजाअत का पैमाना हमीयत व ख़ुद्दारी है और उफ़्फ़त का पैमाना ग़ैरत व हया।


(((क्या कहना उस शख़्स की हिम्मत का जो दावते ज़ुलशीरा में सारी क़ौम के मुक़ाबले में तनो तन्हा नुसरते पैग़म्बर (स0) पर आमादा हो गया और फ़िर हिजरत की रात तलवारों के साये में सो गया और मुख़्तलिफ़ मारेकों में तलवारों की ज़द पर रहा और आखि़रकार तलवार के साये ही में सजदए आखि़र भी अदा कर दिया, इससे ज़्यादा क़द्रो क़ीमत का हक़दार दुनिया का कौन सा इन्सान हो सकता है)))


47- कामयाबी दूर अन्देशी से हासिल होती है और दूर अन्देशी फ़िक्र व तदब्बुर से। फ़िक्र व तदब्बुर का ताल्लुक़ इसरार की राज़दारी से है।


48-शरीफ़ इन्सान के हमले से बचो, जब वह भूका हो और कमीने के हमले से बचो जब उसका पेट भरा हो।


49-लोगों के दिल सहराई जानवरों जैसे है। जो उन्हें सधा लेगा उसकी तरफ़ झुक जाएंगे।


(((मक़सद यह है के इन्सान दिलों को अपनी तरफ़ माएल करना चाहता है तो उसका बेहतरीन रास्ता यह है के बेहतरीन एख़लाक़ व किरदार का मुज़ाहेरा करे ताके यह दिले वहशी राम हो जाए वरना बदएख़लाक़ी और बदसुलूकी से वहशी जानवर के मज़ीद भड़क जाने का ख़तरा होता है इसके राम हो जाने का कोई तसव्वुर नहीं होता है।)))


50-तुम्हारा ऐब उसी वक़्त तक छिपा रहेगा जब तक तुम्हारा मुक़द्दर साज़गार है।


51- सबसे ज़्यादा माफ़ करने का हक़दार वह है जो सबसे ज़्यादा सज़ा देने की ताक़त रखता हो।


52- सख़ावत वही है जो इब्तेदाअन की जाए वरना मांगने के बाद तो शर्म व हया और इज़्ज़त की पासदारी की बिना पर भी देना पड़ता है।


(((मक़सद यह है के इन्सान सख़ावत करना चाहे और उसका अज्र व सवाब हासिल करना चाहे तो उसे साएल के सवाल का इन्तेज़ार नहीं करना चाहिये के सवाल के बाद तो यह शुबह भी पैदा हो जाता है के अपनी आबरू बचाने के लिये दे दिया है और इस तरह इख़लासे नीयत का अमल मजरूह हो जाता है और सवाब इख़लासे नीयत पर मिलता है, अपनी ज़ात के तहफ़्फ़ुज़ पर नहीं।)))


53- अक़्ल जैसी कोई दौलत नहीं है और जेहालत जैसी कोई फ़क़ीरी नहीं है अदब जैसी कोई मीरास नहीं है और मशविरा जैसा कोई मददगार नहीं है।


(((आज मुसलमान तमाम अक़वामे आलम का मोहताज इसीलिये हो गया है के उसने इल्म व फ़न के मैदान से क़दम हटा लिया है और सिर्फ़ ऐश व इशरत की ज़िन्दगी गुज़ारना चाहता है, वरना इस्लामी अक़्ल से काम लेकर बाबे मदीनतुल इल्म से वाबस्तगी इख़्तेयार की होती तो बाइज़्ज़त ज़िन्दगी गुज़ारता और बड़ी-बड़ी ताक़तें भी उसके नाम से दहल जातीं जैसा के दौरे हाज़िर में बाक़ायदा महसूस किया जा रहा है।)))


54-सब्र की दो क़िस्में है, एक नागवार हालात पर सब्र और एक महबूब और पसन्दीदा चीज़ों के मुक़ाबले में सब्र।


55- मुसाफ़िर में दौलतमन्दी हो तो वह भी वतन का दर्जा रखती है और वतन में ग़ुर्बत हो तो वह भी परदेस की हैसियत रखता है।


56- क़नाअत वह सरमाया है जो कभी ख़त्म होने वाला नहीं है।


सय्यद रज़ी - यह फ़िक़रा रसूले अकरम (स0) से भी नक़्ल किया गया है (और यह कोई हैरत अंगेज़ बात नहीं है, अली (अ0) बहरहाल नफ़्से रसूल (स0) हैं।)


(((कहा जाता है के एक शख़्स ने सुक़रात को सहराई घास पर गुज़ारा करते देखा तो कहने लगा के अगर तुमने बादशाह की खि़दमत में हाज़िरी दी होती तो इस घास पर गुज़ारा न करना पड़ता तो सुक़रात ने फ़ौरन जवाब दिया के अगर तुमने घास पर गुज़ारा कर लिया होता तो बादशाह की खि़दमत के मोहताज न होते, घास पर गुज़ारा कर लेना इज़्ज़त है और बादशाह की खि़दमत में हाज़िर रहना ज़िल्लत है।)))


57- माल ख़्वाहिशात का सरचश्मा है।


(((इसमें कोई शक नहीं है के ज़बान इन्सानी ज़िन्दगी में जिस क़द्र कारआमद है उसी क़द्र ख़तरनाक भी है, यह तो परवरदिगार का करम है के उसने इस दरिन्दे को पिन्जरे के अन्दर बन्द कर दिया है और उस पर 32 हज़ार पहरेदार बिठा दिये हैं लेकिन यह दरिन्दा जब चाहता है ख़्वाहिशात से साज़बाज़ करके पिन्जरे का दरवाज़ा खोल लेता है और पहरेदारों को धोका देकर अपना काम शुरू कर देता है और कभी कभी सारी क़ौम को खा जाता है।)))


58- जो तुम्हें बुराइयों से डराए गोया उसने नेकी की बशारत दे दी।


59- ज़बान एक दरिन्दा है, ज़रा आजाद कर दिया जाए को काट खाएगा।


60- औरत एक बिच्छू के मानिन्द है जिसका डसना भी मज़ेदार होता है।


(((इस फ़िक़रे में एक तरफ़ औरत के मिज़ाज की तरफ़ इशारा किया गया है जहां इसका डंक भी मज़ेदार मालूम होता है)))