कलेमाते क़ेसार
 

21-40

21- हमारा एक हक़ है जो मिल गया तो ख़ैर वरना हम ऊँट पर पीछे ही बैठना गवारा कर लेंगे चाहे सफ़र कितना ही तवील क्यों न हो।


सय्यद रज़ी - यह बेहतरीन लतीफ़ और फ़सीह कलाम है के अगर हक़ न मिला तो हम ज़िल्लत का सामना करना पड़ेगा के रदीफ़ में बैठने वाले आम तौर से ग़ुलाम और क़ैदी वग़ैरा हुआ करते हैं।
(((यानी हम हक़ से दस्तबरदार होने वाले नहीं हैं जहां तक ग़ासिबाना दबाव का सामना करना पड़ेगा करते रहेंगे)))


22-जिसे उसके आमाल के पीछे हटा दें उसे नसब आगे नहीं बढ़ा सकता है।


23-बड़े-बड़े गुनाहों का कुफ़्फ़ारा यह है के इन्सान सितम रसीदा की फ़रयादरसी करे और रंज व दीदा इन्सान के ग़म को दूर करे।


(((सितम रसीदा वह भी है जिसके खाने पीने का सहारा न हो और वह भी है जिसके इलाज का पैसाा या स्कूल की फ़ीस का इन्तेज़ाम न हो)))


24- फ़रज़न्दे आदम (अ0)! जब गुनाहों के बावजूद परवरदिगार की नेमतें मुसलसल तुझे मिलती रहें तो होशियार हो जाना।


(((अक्सर इन्सान नेमतों की बारिश देख कर मग़रूर हो जाता है के ‘शायद परवरदिगार कुछ ज़्यादा ही मेहरबान है और यह नहीं सोचता है के इस तरह हुज्जत तमाम हो रही है और ढील दी जा रही है वरना गुनाहों के बावजूद इस बाारिशे रहमत का क्या इमकान है? )))


25- इन्सान जिस बात को दिल में छिपाना चाहताा है वह उसकी ज़बान के बेसाख़्ता कलेमात और चेहरे के आसार से नुमायां हो जाती है।


(((ज़िन्दगी की बेशुमार बातें हैं जिनका छिपाना उस वक़्त तक मुमकिन नहीं है जब तक ज़बान की हरकत जारी है और चेहरे की ग़माज़ी सलामत है, इन दो चीज़ों पर कोई इन्सान क़ाबू नहीं कर सकता है और उनसे हक़ाएक़ का बहरहाल इन्केशाफ़ हो जाता है)))


26- जहां तक मुमकिन हो मर्ज़ के साथ चलते रहो (और फ़ौरन इलाज की फ़िक्र में लग जाओ)


27- बेहतरीन ज़ोहद - ज़ोहद का मख़फ़ी रखना और इज़हार न करना है (के रियाकारी ज़ोहद नहीं है निफ़ाक़ है)


28- जब तुम्हारी ज़िन्दगी जा रही है और मौत आ रही है तो मुलाक़ात बहुत जल्दी हो सकती है।


29- होशियार रहो होशियार! के परवरदिगार ने गुनाहों की इस क़द्र पर्दापोशी की है के इन्सान को यह धोका हो गया है के ‘ाायद माफ़ कर दिया है।


30- आपसे ईमान के बारे में सवाल किया गया तो फ़रमाया के ईमान के चार सुतून हैं, सब्र, यक़ीन, अद्ल, और जेहाद


((वाज़ेह रहे के इस ईमान से मुराद ईमाने हक़ीक़ी है जिस पर सवाब का दारोमदार है और जिसका वाक़ेई ताल्लुक़ दिल की तस्दीक़ और आज़ा व जवारेह के अमल व किरदार से होता है वरना वह ईमान जिसका तज़किरा ‘‘या अय्योहल्लज़ीना आमलू’’ में किया गया है इससे मुराद सिर्फ़ ज़बानी इक़रार और अदआए ईमान है वरना ऐसा न होता तो तमाम एहकाम का ताल्लुक़ सिर्फ़ मोमेनीन मुख़लेसीन से होता और मुनाफ़ेक़ीन इन क़वानीन से यकसर आज़ाद हो जाते)))


फ़िर सब्र के चार ‘शोबे हैं - शौक़, ख़ौफ़, ज़ोहद और इन्तज़ारे मौत, फ़िर जिसने जन्नत का इश्तेयाक़ पैदा कर लिया उसने ख़्वाहिशात को भुला दिया और जिसे जहन्नम का ख़ौफ़ हासिल हो गया उसने मोहर्रमात से इजतेनाब किया, दुनिया में ज़ोहद इख़्तेयार करने वाला मुसीबतों को हलका तसव्वुर करता है और मौतत का इन्तेज़ार करने वाला नेकियों की तरफ़ सबक़त करता है।


(((सब्र का दारोमदार चार अश्याअ पर है, इन्सान रहमते इलाही का इश्तेयाक़ रखता हो, और अज़ाबे इलाही से डरता हो ताके इस राह में ज़हमतें बरदाश्त करे, इसके बाद दुनिया की तरफ़ से लापरवाह हो और मौत की तरफ़ सरापा तवज्जो हो ताके दुनिया के फ़िराक़ को बरदाश्त कर ले और मौत की सख़्ती के पेशे नज़र ही सख़्ती को आसान समझ ले)))


यक़ीन के भी चार ‘शोबे हैं - होशियारी की बसीरतत, हिकमत की हक़ीक़त रसी, इबरत की नसीहत और साबिक़ बुज़ुर्गों की सुन्नत, होशियारी में बसीरत रखने वाले पर हिकमत रोशन हो जाती है और हिकमत की रोशनी इबरत को वाज़ेह कर देती है और इबरत की मारेफ़त गोया साबिक़ अक़वाम से मिला देती है।


(((यक़ीन की भी चार बुनियादें हैं, अपनी हर बात पर मुकम्मल एतमाद रखता हो, हक़ाएक़ को पहचानने की सलाहियत रखता हो, दीगर अक़वाम के हालात से इबरत हासिल करे और सॉलेहीन के किरदार पर अमल करे, ऐसा नहीं है तो इन्सान जेहले मरकब में मुब्तिला है और इसका यक़ीन फ़क़त वहम व गुमाान है यक़ीन नहीं है। )))


अद्ल के भी चार शोबे हैं - तह तक पहुंच जाने वाली समझ, इल्म की गहराई, फ़ैसले की वज़ाहत और अक़्ल की पाएदारी।

जिसने फ़हम की नेमत पा ली वह इल्म की गहराई तक पहुंच गया और जिसने इल्म की गहराई को पा लिया वह फ़ैसले के घाट से सेराब होकर बाहर आया और जिसने अक़्ल इस्तेमाल कर ली उसने अपने अम्र में कोई कोताही नहीं की और लोगों के दरम्यान क़ाबिले तारीफ़ ज़िन्दगी गुज़ाार दी।

जेहाद के भी चार शोबे हैं, अम्रे बिल मारूफ़, नहीं अनिल मुनकर, हर मक़ाम पर सिबाते क़दम और फ़ासिक़ों से नफ़रत व अदावत। लेहाज़ा जिसने अम्रे बिल मारूफ़ किया उसने मोमेनीन की कमर को मज़बूत कर दिया और जिसने मुनकरात से रोका उसने काफ़िरों की नाक रगड़ दी, जिसने मैदाने क़ताल में सिबाते क़दम का मुज़ाहेरा किया वह अपने रास्ते पर आगे बढ़ गया और जिसने फ़ासिक़ों से नफ़रत व अदावत का बरताव किया परवरदिगार इसकी ख़ातिर इसके दुश्मनों से ग़ज़बनाक होगा और उसे रोज़े क़यामत ख़ुश कर देगा।


(((जेहाद का इन्हेसार भी चार मैदानों पर है, अम्रे बिल मारूफ़ का मैदान, नहीं अनिल मुनकर का मैदान, क़त्ताल का मैदान और फ़ासिक़ों से नफ़रत व अदावत का मैदान, इन चारों मैदानों में हौसलाए जेहाद नहीं है तो तन्हा अम्र व नहीं से कोई काम चलने वाला नहीं है और न ऐसा इन्सान वाक़ेई मुजाहिद कहे जाने के क़ाबिल है)))


और कुफ्ऱ के भी चार सुतून हैं, बिला वजह गहराइयों में जाना, आपस में झगड़ा करना, कजी और इन्हेराफ़ और इख़्तेलाफ़ और अनाद। जो बिला सबब गहराई में डूब जाएगा वह पलट कर हक़ की तरफ़ नहीं आ सकता है और जो जेहालत की बिना पर झगड़ा करता रहता है वह हक़ की तरफ़ से अन्धा हो जाता है, जो कजी का शिकार हो जाता है उसे नेकी बुराई, और बुराई नेकी नज़र आने लगती है और वह गुमराही के नशे में चूर हो जाता है और जो झगड़े और अनाद में मुब्तिला हो जाता है उसके रास्ते दुश्वार, मसाएल नाक़ाबिले हल और बच निकलने के तरीक़े तंग हो जाते हैं।


(((कुफ्ऱ इनकारे ख़ुदाई की ‘ाक्ल में हो या इन्कारे रिसालत की ‘ाक्ल में इसकी असास शिर्क पर हो या इन्कार हक़ाएक़ व वाज़ेहाते मज़हब पर, हर क़िस्म के लिये चार में से कोई न कोई सबब ज़रूर होता है, या इन्सान उन मसाएल की फ़िक्र में डूब जाता है जो उसके इमकान से बाहर हैं। या सिर्फ़ झगड़े की बुनियाद पर किसी अक़ीदे को इख़्तेयार कर लेता है या इसकी फ़िक्र में कजी पैदा हो जाती है और या वह अनाद और ज़िद का शिकार हो जाता है, और खुली हुई बात यह है के इनमें से हर बीमारी वह है जो इन्सान को राहे रास्त पर आने से रोक देती है और इन्सान सारी ज़िन्दगी कुफ्ऱ ही में मुब्तिला रह जाता है, बीमारी की हर क़िस्म के असरात अलग-अलग हैं लेकिन मजमूई तौर पर सबका असर यह है के इन्सान हक़रसी से महरूम हो जाता है और ईमान व यक़ीन की दौलत से बहरामन्द नहीं हाो पाता है।)))


इसके बाद शक के चार शोबे हैं ः कट हुज्जती, ख़ौफ़, हैरानी और बातिल के हाथों सुपुर्दगी, ज़ाहिर है के जो कट हुज्जती को ‘ाोआर बना लेगा उसकी रात की सुबह कभी न होगी और जो हमेशा सामने की चीज़ों से डरता रहेगा वह उलटे पांव पीछे ही हटता रहेगा, जो ‘ाक व ‘ाुबह में हैरान व सरगर्दां रहेगा उसे ‘ायातीन अपने पैरों तले रौंद डालेंगे और जो अपने को दुनिया व आख़़ेरत की हलाकत के सुपुर्द कर देगा वह वाक़ेअन हलाक हो जाएगा।


(((शक ईमान व कुफ्ऱ के दरम्यान का रास्ताा है जहां न इन्सान हक़ का यक़ीन पैदा कर पाता है और न कुफ्ऱ ही का अक़ीदा इख़्तेयार कर सकता है और दरम्यान में ठोकरें खाता रहता है और इस ठोकर के भी चार असबाब या मज़ाहिर होते हैं, या इन्सान बिला सोचे समझे बहस ‘ाुरू कर देता है, या ग़लती करने के ख़ौफ़ से परछाइयों से भी डरने लगता है, या तरद्दुद और हैरानी का शिकार हो जाता है या हर पुकारने वाले की आवाज़ पर लब्बैक कहने लगता हैः
‘‘चलता हूँ थोड़ी दूर हर एक राहरौ के साथ, पहचानता नहीं हूं अकी राहबर को मैं’’)))


31- ख़ैर का अन्जाम देने वाला असल ख़ैर से बेहतर होता है और ‘ार का अन्जाम देने वाला असल ‘ार से भी बदतर होता है।


32- सख़ावत करो लेकिनन फ़ुज़ूल ख़चर्ची न करो और किफ़ाअत ‘ाोआरी इख़्तेयार करो लेििकन बुख़ुल मत बनो।


33. बेहतरीन मालदारी और बेनियाज़ी यह है के इन्सान उम्मीदों को तर्क कर दे।


34. जो लाोगों के बारे में बिला सोचे-समझे वह बातें कह देता है जिन्हें वह पसन्द नहीं करते हैं, लोग उसके बारे में भी वह कह देते हैं जिसे जानते तक नहीं हैं।


35. जिसने उम्मीदों को आज़ाद किया उसने अमल को बरबाद किया।


(((इसमें कोई ‘ाक नहीं है के यह दुनिया उम्मीदों पर क़ायम है और इन्सान की ज़िन्दगी से उम्मीद का ‘ाोबा ख़त्म हो जाए तो अमल की सारी तहरीक सर्द पड़ जाएगी और कोई इन्सान कोई काम न करेगा लेकिन इसके बाद भी एतदाल एक बुनियादी मसला है और उम्मीदों की दराज़ी बहरहाल अमल को बरबाद कर देती है के इन्सान आखे़रत से ग़ाफ़िल हो जाता है और आख़ेरत से ग़ाफ़िल हो जाने वाला अमल नहीं कर सकता है।)))


36- (शाम की तरफ़ जाते हुए आपका गुज़र अम्बार के ज़मींदारों के पास से हुआ तो वह लोग सवारियों से उतर आए और अपके आगे दौड़ने लगे तो आपने फ़रमाया) यह तुमने क्या तरीक़ा इख़्तेयार किया है? लोगों ने अर्ज़ की के यह हमारा एक अदब है जिससे हम ‘ाख़्िसयतों का एहतेराम करते हैं, फ़रमाया के ख़ुदा गवाह है इससे हुक्काम को कोई फ़ायदा नहीं होता है और तुम अपने नफ़्स को दुनिया में ज़हमत में डाल देते हो और आख़ेरत में बदबख़्ती का शिकार हो जाओगे और किस क़द्र ख़सारे के बाएस है वह मशक़्क़त जिसके पीछे अज़ाब हो और किस क़द्र फ़ायदामन्द है वह राहत जिसके साथ जहन्नम से अमान हो।


(((इस इरशादे गिरामी से साफ़ वाज़ेह होता है के इस्लाम हर तहज़ीब को गवारा नहीं करता है और इसके बारे में यह देखना चाहता है के इसकी अफ़ादियत क्या है और आखि़रत में इसका नुक़सान किस क़द्र है, हमारी मुल्की तहज़ीब में फ़र्शी सलाम करना, ग़ैरे ख़ुदा के सामने बहद्दे रूकूअ झुकना भी है जो इस्लाम में क़तअन जाएज़ नहीं है, किसी ज़रूरत से झुकना और है और ताज़ीम के ख़याल से झुकना और है, सलाम ताज़ीम के लिये होता है, लेहाज़ा इसमें रूकूअ की हुदूद तक जाना सही नहीं है)))


37-आपने अपने फ़रज़न्द इमाम हसन (अ0) से फ़रमायाः बेटा मुझसे चार और फ़िर चार बातें महफ़ूज़ कर लो तो उसके बाद किसी अमल से कोई नुक़सान न होगा।


(((चार और चार का मक़सद ‘ाायद यह है के पहले चार का ताल्लुक़ इन्सान के ज़ाती औसाफ़ व ख़ुसूसियात से है और दूसरे चार का ताल्लुक़ इज्तेमाई मुआमलात से है और कमाले सआदतमन्दी यही है के इन्सान ज़ाती ज़ेवरे किरदार से भी आरास्ता रहे और इज्तेमाई बरताव को भी सही रखे)))


बेहतरीन दौलत व सरवत अक़्ल है और बदतरीन फ़क़ीरी हिमाक़त, सबसे ज़्यादा वहशतनाक अम्र ख़ुद पसन्दी है और सबसे ‘ारीफ़ हस्बे ख़ुश एख़लाक़ी, बेटा! ख़बरदार किसी अहमक़ की दोस्ती इख़्तेयार न करना के तुम्हें फ़ायदा भी पहुंचाना चाहेगा तो नुक़सान पहुंचा देगा और इसी तरह किसी बख़ील से दोस्ती न करना के तुम से ऐसे वक़्त में दूर भागेगा जब तुम्हें इसकी ‘ादीद ज़रूरत होगी और देखो किसी फ़ाजिर का साथ भी इख़्तेयार न करना के वह तुमको हक़ीर चीज़ के एवज़ भी बेच डालेगा और किसी झूटे की सोहबत भी इख़्तेयार न करना के वह मिस्ले सराब है जो दूर वाले को क़रीब कर देता है और क़रीब वाले को दूर कर देता है।


(((दूसरे मुक़ाम पर इमाम अलैहिस्सलाम ने इसी बात को आक़िल व अहमक़ के बजाए मोमिन और मुनाफ़िक़ के नाम से बयान फ़रमाया है और हक़ीक़ते अम्र यह है के इस्लाम की निगाह में मोमिन ही को आक़िल और मुनाफ़िक़ ही को अहमक़ कहा जाता है, वरना जो इब्तिदा से बेख़बर और इन्तिहा से ग़ाफ़िल हो जाए न रहमान की इबादत करे और न जन्नतत के हुसूल का इन्तेज़ाम करे इसे किस एतबार से अक़्लमन्द कहा जा सकता है और उसे अहमक़ के अलावा दूसरा कौन सा नाम दिया जा सकता है यह और बात है के दौरे हाज़िर में ऐसे ही अफ़राद को दानिशमन्द और दानिशवर कहा जाता है और उन्हीं के एहतेराम के तौर पर दीन व दानिश की इस्तेलाह निकाली गई है के गोया दीनदार, दीनदार होता है और दानिश्वर नहीं। और दानिशवर दानिशवर होता है चाहे दीनदार न हो और बेदीनी ही में ज़िन्दगी गुज़ार दे)))


38-मुस्तहबाते इलाही में कोई क़ुरबते इलाही नहीं है अगर उनसे वाजिबात को नुक़सान पहुंच जाए।


(((मक़सद यह है के परवरदिगार ने जिस अज्र व सवाब का वादा किया है और जिसका इन्सान इस्तेहक़ाक़ पैदा कर लेता है वह किसी न किसी अमल ही पर पैदा होता है और मर्ज़ कोई अमल नहीं है, लेकिन इसके अलावा फ़ज़्ल व करम का दरवाज़ा खुला हुआ है और वह किसी भी वक़्त और किसी भी ‘ाख़्स के ‘ाामिले हाल किया जा सकता है, इसमें किसी का कोई इजारा नहीं है।)))


39- अक़्लमन्द की ज़बान उसके दिल के पीछे रहती है और अहमक़ का दिल उसकी ज़बान के पीछे रहता है।


सय्यद रज़ी- यह बड़ी अजीब व ग़रीब और लतीफ़ हिकमत है जिसका मतलब यह है के अक़्लमन्द इन्सान ग़ौर व फ़िक्र करने के बाद बोलता है और अहमक़ इन्सान बिला सोचे समझे कह डालता है गोया के आक़िल की ज़बान दिल की ताबेअ है और अहमक़ का दिल उसकी ज़बान का पाबन्द है।


40-अहमक़ का दिल उसके मुंह के अन्दर रहता है और अक़्लमन्द की ज़बान उसके दिल के अन्दर।