सृष्टि, ईश्वर और धर्म
 



ईश्वरीय दूत और पाप





वास्तव में पाप, अपराध अथवा ग़लती का अज्ञानता व सूझबूझ से गहरा संबंध है। उदाहरण स्वरूप एक व्यक्ति अपनी आर्थिक समस्याओं के निवारण के लिए परिश्रम करने के स्थान पर चोरी

की योजना बनाता है। अपने हिसाब से उसकी योजना पूरी होती है और वह हर पहलु पर ध्यान देते हुए कार्यवाही करता है

और अपनी पहचान छुपाने की भी व्यवस्था करता है किंतु फिर भी वह पकड़ा जाता है क्योंकि उसे इस बात का ज्ञान नहीं था

कि उदाहरण स्वरूप उस घर की निगरानी की जा रही है और उदाहरण स्वरूप सामने वाले घर में कई सुरक्षा कर्मी रात- दिन उस घर पर नज़र रखे हैं जिसमें वह चोरी करना चाहता है।

यदि उसे इस बात का ज्ञान होता तो वह कदापि उस घर में चोरी न करता।

इसके अतिरिक्त यदि उसमें सूझबूझ होती और बुद्धि पूरी होती तो वह चोरी के परिणामों पर ध्यान देता और दूरदर्शिता से सोचते हुए यह काम न करता। इसीलिए जिन लोगों को अपराध की बुराइयों और परिणामों का भलीभांति ज्ञान होता है

वे कभी भी अपराध नहीं करते किंतु जिन लोगों का ज्ञान कम होता है और मूर्खों की भांति अपनी बनाई योजना से आश्वस्त होकर सोचते हैं कि वे पकड़े नहीं जाएगें वही अपराध करते हैं और पकड़े जाते हैं।

इस प्रकार से यह स्पष्ट हुआ कि अपराध की बुराई और परिणाम का यदि किसी को सही रूप से पूरी तरह से ज्ञान हो तो वह अपराध नहीं कर सकता।

बिल्कुल यही दशा ईश्वरीय दूतों की होती है। चूंकि ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने की योग्यता के कारण उनका ज्ञान पूर्ण और वे विलक्षण बुद्धि के स्वामी तथा दूरदर्शिता व सूझबूझ की चरम सीमा पर होते हैं

इसलिए वे पाप नहीं करते हैं जो वास्तव में धार्मिक अपराध हैं क्योंकि उन्हें पाप की बुराई और उसके परिणाम का पूर्णरूप से ज्ञान होता है।

यह ज्ञान वास्तव में उनकी उन्हीं विशेष क्षमताओं व योग्यताओं के कारण होता है जिसके आधार पर उन्हें ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने का पात्र समझा जाता है।

स प्रकार से हम देखते हैं कि ईश्वरीय दूत ज्ञान की उस सीमा पर होते हैं जहां उनकी सूझबूझ और वास्तविकता का ज्ञान उन्हें पाप नहीं करने देता और उनकी दूरदर्शिता व सम्पूर्ण बुद्धि इस बात का कारण बनती है

कि वे हर प्रकार की ग़लती से भी सुरक्षित रहते हैं क्योंकि ग़लती भी अज्ञानता का परिणाम है। उदाहरण स्वरूप कोई व्यक्ति वर्षों तक अपने घर में रहने

और प्रतिदिन आने- जाने के बाद अपने उस घर के मार्ग के बारे में कभी गलती नहीं कर सकता क्योंकि अपने घर के मार्ग के बारे में उसका ज्ञान सम्पूर्ण होता है

किंतु ईश्वरीय दूतों का ज्ञान हर मामले में सम्पूर्ण होता है इसलिए वे किसी भी मामले में ग़लती नहीं करते।

पैग़म्बरों अर्थात ईश्वरीय दूतों के पापों से पवित्र होने की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए हम अपनी बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए पाप,पुण्य ,भलाई व बुराई जैसे कामों की इरादे से

लेकर काम करने की पूरी प्रक्रिया पर एक दृष्टि डालते हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ईश्वरीय दूत स्वेच्छा से पापों से दूर रहते हैं और जो शक्ति उन्हें पापों से दूर रखती है वह उनकी अपनी होती है और इससे शक्ति के प्रभावशाली होने के कारण, मनुष्य को प्राप्त चयन अधिकार समाप्त नहीं होता।

वास्तव में हर काम चाहे वह सही हो या ग़लत इरादे और इच्छा से आरंभ होता है और काम करने पर जाकर समाप्त होता है किंतु इस पूरी प्रक्रिया में कई चरण आते हैं

जो वास्तव में प्रत्येक मनुष्य की मानसिक दशाओं के अनुसार कम या अधिक होते हैं। उदारहण स्वरूप जब एक मनुष्य कोई काम करने का इरादा करता है तो उसकी अच्छाइयों और बुराईयों

और परिणाम के बारे में सोचता है यदि उसका ज्ञान कम किंतु दूरदर्शिता अधिक होती है तो वह उस बारे में जानकारी रखने वालों से भी पूछताछ करता है अन्य लोगों से सलाह- मशविरा करता है

फिर अपने हिसाब से उचित समय की प्रतीक्षा करता है और समय आने पर वह काम कर लेता है किंतु यदि उसमें आत्मविश्वास की कमी होगी तो यह प्रक्रिया उसके लिए लंबी होगी और वह बार- बार अपने फैसले को बदलेगा किंतु यदि उसमें आत्मविश्वास होगा तो वह प्रक्रिया अपेक्षाकृत छोटी होगी और इसी प्रकार यदि किसी के पास उस काम के बारे में पर्याप्त जानकारी के साथ होगी तो उसके लिए काम करने की प्रक्रिया और अधिक छोटी होगी और उसके लिए ढेर सारे इरादों और मनोकामनाओं में से संभव व सरलता से पूरी की जाने वाली कामना तक पहुंचना सरल होगा। इस प्रकार से यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान व जानकारी, जहां गलतियों से बचाव को सुनिश्चित करती है वहीं सही मार्ग के चयन की संभावना को अधिक करती है। इसलिए जानकारी व अनुभव जितना अधिक होगा गलतियों से दूरी उतनी ही निश्चित होगी तो यदि हम किसी ऐसे व्यक्ति की कल्पना करें जिसकी जानकारी व अनुभव पूर्ण हो और उसमें किसी प्रकार की कोई कमी न हो तो फिर उससे गलती की संभावना नहीं होती किंतु उसमें संभावना न होने का अर्थ यह नहीं है कि वह गलतियों से दूर रहने पर विवश होता है और उसमें चयन शक्ति का विशेष अधिकार ही नहीं होता। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे यदि कोई बुद्धि रखने वाला व्यक्ति किसी शर्बत में विष गिरते अपनी आंखों से देख ले तो वह कदापि उस शर्बत को नहीं पीएगा।

अर्थात हम यह कह सकते हैं कि बुद्धि रखने वाला मनुष्य उस शर्बत को पी नहीं सकता किंतु पी नहीं सकता कहने का अर्थ यह नहीं है कि उसमें वह शर्बत पीने की क्षमता ही नहीं है

और वह शर्बत न पीने पर विवश है और शर्बत पीने या न पीने के मध्य निर्णय का अधिकार ही उसके पास नहीं है यह अधिकार उसके पास है किंतु बुद्धि व विष के होने का ज्ञान उसे शर्बत पीने से रोक देता है

यही स्थिति ईश्वरीय दूतों की भी होती है एक मनुष्य होने के नाते और ईश्वर द्वारा मनुष्यों को प्रदान की गयी चयन शक्ति व अधिकार के दृष्टिगत यदि वे चाहें तो पाप कर सकते हैं किंतु उन्हें

जो वास्तविकताओं का पूर्ण ज्ञान होता है और पापों की बुराइयों से चूंकि वे अवगत होते हैं इसलिए पूर्ण ज्ञान उनके भीतर पाप की इच्छा को जन्म ही नहीं लेने देता किंतु इसका अर्थ यह नहीं होता

कि वे पाप करने में अक्षम और मनुष्य को प्रदान किये गये चयन अधिकार से वंचित होते हैं। वास्तव में पापों की बुराई ईश्वरीय दूतों के लिए उसी प्रकार स्पष्ट होती है जैसा बुद्धि रखने वाले के लिए विष की बुराईयों और जिस प्रकार बुद्धि रखने वाला व्यक्ति शर्बत में अपनी आखों से विष गिरते देखने के बाद अपनी इच्छा से उसे नहीं पीता उसी प्रकार ईश्वरीय दूत भी पापों से अपनी इच्छा से दूर रहते हैं और उनकी इस इच्छा का कारण उनका ज्ञान होता है।









हर ग़लती पाप नहीं है







कुछ लोगों का कहना है कि यदि ईश्वर ने अपने दूतों को पापों से दूर रखा है और उनकी यह पवित्रता उनके कर्तव्यों के सही रूप से निर्वाह के लिए आवश्यक भी है तो इस स्थिति में अधिकार व चयन अपनी इच्छा की विशेषता उन में बाकी नहीं रहेगी तो इस दशा में उनके अच्छे कामों पर ईश्वर उन्हें फल भी नहीं दे सकता क्योंकि यदि उन्होंने अच्छा

काम किया है तो इसलिए किया है कि ईश्वर ने उन्हें पापों से दूर रखा है और ईश्वर जिसे भी इस प्रकार से पापों से दूर रखेगा वह अच्छा काम ही करेगा।

इस शंका का निवारण किसी सीमा तक हमारी पिछली चर्चा में हो चुका है जिसका सार यह है कि पवित्र होने का अर्थ विवश होना नहीं है और पापों से दूरी वास्तव में उनकी स्वेच्छा से होती है

इस अंतर के साथ कि उन पर ईश्वर की विशेष कृपा होती है किंतु पवित्र लोगों और ईश्वरीय दूतों पर ईश्वर की विशेष कृपा, विशिष्ट लोगों को प्राप्त सुविधाओं की भांति होती है। अतिरिक्त सुविधा,

अतिरिक्त दायित्व और अतिरिक्त संवेदनशीलता का कारण होती है। हम अपनी इस बात को एक उदाहरण से स्पष्ट करते हैं। एक कंपनी में बहुत से कर्मचारी विभिन्न प्रकार के काम करते हैं

और सबका उद्देश्य कंपनी को लाभ पहुंचाना होता है और सब एक निर्धारित समय पर कंपनी में आते और निर्धारित समय पर जाते हैं किंतु यदि हम वेतन और सुविधाओं पर नज़र डालें तो

बहुत अधिक अंतर नज़र आता है। उदाहरण स्वरूप गेट पर बैठे हुए दरबान और कपंनी के एक निदेशक को प्राप्त सुविधाओं और वेतन में बहुत अंतर होता है।

दरबान कंपनी की रखवाली करता है और निदेशक व्यापारिक मामलों की देखभाल करता है किंतु क्या दरबान यह कह सकता है कि यदि मुझे भी निदेशक को प्राप्त होने वाला वेतन और सुविधाएं

मिल जाएं तो मैं भी व्यापारिक मामले देख सकता हूं कदापि नहीं क्योंकि उसे ज्ञात है कि निदेशक कंपनी के महत्वपूर्ण और व्यापारिक मामले देखता है इसलिए उसे वेतन और सुविधाएं मिली हैं

न यह कि चूंकि उसे सुविधा और भारी वेतन मिलता है इसलिए वह व्यापारिक मामले देखने की दक्षता प्राप्त कर लेता है। स्पष्ट है कि उस उसकी दक्षता व शिक्षा व विशेषताओं के कारण निदेशक

बनाया गया और व्यापारिक मामलों को देखने का काम सौंपा गया जिसके बाद उसे भारी वेतन और सुविधाएं दी गयीं। इसके साथ यह भी स्पष्ट है कि ग़लती होने पर जैसा दंड निदेशक को मिलेगा वैसा दरबान को नहीं मिलेगा। ठीक यही स्थिति ईश्वरीय दूतों की होती है। उनमें विशेष प्रकार की दक्षता व विशेषताएं होती हैं जिसके कारण उन्हें ईश्वरीय दूत बनाया जाता है

और चूंकि इतना महत्वपूर्ण काम उन्हें सौंपा जाता है इसलिए उन पर ईश्वर की विशेष कृपा भी होती है जो पापों से दूर रहने में उनकी सहायता करती है किंतु इसके साथ यह भी स्पष्ट है

कि उनके अच्छे कर्म का जिस प्रकार से प्रतिफल अधिक होता है उसी प्रकार उनकी गलतियों का दंड भी साधारण लोगों से अधिक कड़ा होता है जिससे संतुलन स्थापित हो जाता है।

यह अलग बात है कि हम यह सिद्ध कर चुके हैं कि विभिन्न कारणों से यह निश्चित है कि ईश्वरीय दूत और ईश्वर के विशेष दास ग़लती और पाप नहीं करते किंतु बौद्धिक रूप से यह संभव है।

ईश्वरीय दूत और उसके विशेष दासों की पापों से पवित्रता की बात पर यह भी कुछ लोग कहते हैं कि पैग़म्बरों, इमामों तथा ईश्ववरीय दूतों की प्रार्थनाओं का इतिहास में उल्लेख है

और उन्होंने अपनी इन प्रार्थनाओं में स्वंय ही ईश्वर से अपनी पापों को क्षमा कर देने की गुहार की है तो फिर जब वे स्वयं ही अपने पापों को स्वीकार कर रहे हैं तो हम कैसे यह कह सकते हैं

कि वे पापों से पवित्र होते हैं।

इस शंका का उत्तर इस प्रकार दिया जा सकता है कि ईश्वरीय दूत थोड़े बहुत अंतर के साथ आध्यात्म की परिपूर्णता व चरम सीमा पर होते थे और अपने पद की संवेदनशीलता और आध्यात्मिक

स्थान के कारण स्वंय को ईश्वर के अधिक निकट समझते थे इसलिए वे आम लोगों के लिए अत्यधिक साधारण ग़लती और धार्मिक दृष्टि से पाप के दायरे में न आने वाले कामों को भी पाप

समझते थे इसलिए यदि इस प्रकार का कोई काम कर लेते थे तो ईश्वर से उसके लिए क्षमा मांगते थे।

हम एक उदाहरण से अपनी बात अधिक स्पष्ट करना चाहेंगे आप किसी देश के अत्यन्त सम्मानीय बुद्धिजीवी या उदाहरण स्वरूप प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की कल्पना करें जो एक सड़क पर

ज़ोर- ज़ोर से ठहाके लगाता हुआ अपने मित्रों के साथ चल रहा हो कभी- कभी मज़ाक में दो चार धौल भी अपने मित्र को लगा देता हो। आप की दृष्टि में यह काम कैसा है?

निश्चित रूप से आप कहेंगे कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए अब बाद में वह बुद्धिजीवी या प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति टीवी पर आकर लोगों से क्षमा मांगे और यह कहे कि मुझ से ग़लती हो गयी आशा है

कि जनता मुझे माफ करेगी तो क्या पुलिस उसकी इस स्वीकारोक्ति कारण गिरफतार कर सकती है और यह कह सकती है कि उसने स्वंय अपनी ग़लती मानी है?

या यह कि उसने अपने पद की मर्यादा नहीं रखी जबकि उसने शपथ ग्रहण की थी? कदापि नहीं। क्योंकि उसने जो काम किया है वह ग़लती है किंतु ऐसी ग़लती नहीं है

जो गैर क़ानूनी काम हो या उसने जो शपथ ग्रहण की थी उसके विपरीत हो बल्कि उसका काम, स्वंय उसकी विशेषताओं के कारण, ग़लत था किंतु गलत होने के बावजूद न तो

अपराध के दायरे में आता है और न ही पद की मर्यादा तोड़ना है। ठीक यही दशा ईश्वरीय दूतों की है बहुत से ऐसे काम हैं जो उन की अपनी विशेषताओं व स्थान के

कारण स्वंय उनकी दृष्टि में उचित नहीं होते और वे उस काम को अपने लिए ग़लत समझते हैं इसलिए यदि इस प्रकार का कोई काम कर लेते हैं तो उसके लिए भी ईश्वर से क्षमा मांगते हैं किंतु

इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने जो अपनी ग़लती या पाप के लिए ईश्वर से क्षमा मांगी है वह ग़लती और पाप वास्तव में धार्मिक रूप से भी पाप था क्योंकि हर पाप ग़लती है

किंतु हर ग़लती पाप नहीं है जैसे हर साधारण व्यक्ति के लिए हर अपराध ग़लती है किंतु हर ग़लती अपराध नहीं। इसके अतिरिक्त यह भी कहा जा सकता है

कि ईश्वरीय दूतों का कर्तव्य मनुष्य का मार्गदर्शन था और मानव जाति के मार्गदर्शन करने की ज़िम्मेदारी, मानव जीवन के सभी आयामों के लिए एक सर्वव्यापी कर्तव्य था।

यही कारण है कि ईश्वरीय दूतों ने हर दृष्टि से मानव जाति का मार्गदर्शन किया तो फिर यह कैसे हो सकता था कि प्रार्थना जैसे विषय में जिस पर ईश्वर ने भी अत्यधिक बल दिया है

वह मनुष्य का मार्गदर्शन न करते। इसीलिए उन्होंने साधारण मनुष्य द्वारा की जाने वाली प्रार्थना का व्यवहारिक नमूना पेश करने के लिए भी इस प्रकार की प्रार्थनाएं की है

और मनुष्य को व्यवहारिक रूप से यह सिखाना चाहा है कि ईश्वर से अपने पापों को क्षमा करने की प्रार्थना किस प्रकार की जाए।

ईश्वरीय संदेश मानवजीवन में पूरक की भूमिका निभाता है

ईश्वरीय दूत उन विषयों का वर्णन करते हैं जिन का ज्ञान , परिपूर्णता और परलोक में सफलता के लिए अनिवार्य है किंतु वह विषय एसे हैं

जिन्हें मनुष्य अपने साधारण ज्ञान से समझ नहीं सकता इस लिए ईश्वर ने इस प्रकार की सूचनाओं व जानकारियों से मनुष्य को अवगत कराने के लिए ईश्वरीय दूत और अपने संदेश का प्रंबंध किया है

किंतु ईश्वरीय दूतों पर मनुष्य के संसारिक जीवन को सुधारने का कर्तव्य नहीं होता क्योंकि संसारिक सुविधाओं और साधनों का आध्यात्मिक दशा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

यद्यपि ईश्वरीय दूतों का यह कर्तव्य नहीं था कि वे मनुष्य के संसारिक जीवन को सरल बनाने के साधन जुटाएं किंतु इसके बावजूद बहुत से ईश्वरीय दूतों ने एसा किया है

और उनके मार्गदर्शनों से मानव जीवन सरल और सुविधापूर्ण हुआ है।

हमने ईश्वरीय दूतों की उपस्थिति की आवश्यकता और उस पर कुछ शंकाओं पर चर्चा की किंतु जब हम यह कहते हैं कि मानव ज्ञान सीमित है और मनुष्य केवल अपने ज्ञान के बल पर

ही ईश्वरीय अर्थों की पूर्ण रूप से जानकारी प्राप्त नहीं कर सकता और उसके लिए ईश्वरीय संदेश आवश्यक है तो एक अन्य विषय समाने आता है कि साधारण मनुष्य में वह क्षमता नहीं होती है

जिसके द्वारा वह ईश्वरीय संदेश को सीधे रूप से प्राप्त कर सकें अर्थात ईश्वरीय संदेश मानव ज्ञान को ईश्वरीय शिक्षाओं तक पहुंचाने के लिए आवश्यक है इस पर हम चर्चा कर चुके हैं किंतु यह

भी स्पष्ट सी बात है कि हर मनुष्य में यह योग्यता नहीं होती कि वह ईश्वरीय संदेश स्वंय प्राप्त कर सके क्योंकि ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने के लिए कुछ विशेषताओं की आवश्यकता होती है जिससे अधिकांश लोग वंचित होते हैं।

तो फिर एसी स्थिति में यदि सारे लोग ईश्वरीय संदेश प्राप्त नहीं कर सकते किंतु ईश्वरीय संदेश की आवश्यकता सब को है तो फिर एक ही दशा रह जाती है और वह यह कि कुछ विशेष

लोग ईश्वरीय संदेश प्राप्त करें और फिर दूसरे लोगों तक उसे पहुंचाए और ताकि सब लोग उससे लाभ उठाएं और यह विशेष ही वास्तव में ईश्वरीय दूत होते हैं

किंतु इस स्थिति में प्रश्न यह उठता है कि इस बात की क्या ज़मानत है कि ईश्वरीय दूतों या उन विशेष लोगों ने ईश्वरीय संदेश सही रूप से प्राप्त किया है

और फिर सही रूप से उसे लोगों तक पहुंचाया है?

फिर यह भी प्रश्न है कि यदि ईश्वरीय दूतों तक ईश्वर का संदेश किसी माध्यम द्वारा पहुंचा है तो वह माध्यम सही है

और उसने पूरी सच्चाई के साथ ईश्वरीय संदेश ईश्वरीय दूतों तक पहुंचाया है इसकी क्या ज़मानत है?

यह एक तथ्य है कि ईश्वरीय संदेश मानवजीवन में पूरक की भूमिका निभाता है क्योंकि उसकी उपयोगिता ही यही है किंतु उसकी यह भूमिका उसी समय हो सकती है

जब उसकी सच्चाई में किसी भी प्रकार का संदेश न हो अर्थात ईश्वरीय संदेश को मुख्य स्रोत से एक साधारण मनुष्य तक पहुंचने के लिए जो व्यवस्था हो

वह एसी हो कि उसके बारे में किसी को किसी भी प्रकार का संदेह न हो।

अर्थात यह यह व्यवस्था एसी हो कि कोई यह न सोचे कि हो सकता है ईश्वरीय संदेश कुछ और रहा हो और ईश्वरीय दूत ने जानबूझकर या गलती से उसमें कोई फेरबदल कर दी है। यदि ईश्वरीय संदेश के बारे में इस प्रकार की शंका उत्पन्न हो जाएगी तो उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाएगी क्योंकि लोगों का उस पर से विश्वास उठ जाएगा और लोग हर आदेश के बारे में

शंका में पड़ गये जाएगें कि यह आदेश ईश्वर का है या फिर उसमें कोई फेर बदल कर दी गयी है? तो प्रश्न यह उठता है कि यह विश्वास कैसे प्राप्त किया जाए?

स्पष्ट सी बात है कि जब यह विश्वास प्राप्त करना भी कठिन है क्योंकि यह संदेश उन लोगों तक पहुंचाया जाएगा जिनमें उस संदेश को सीधे रूप से प्राप्त करने की योग्यता नहीं होगी और

जब उनमें इस प्रकार की योग्यता नहीं होगी तो स्पष्ट है कि उन्हें ईश्वरीय संदेश के सही प्रारूप का भी पूर्ण रूप से ज्ञान नहीं होगा और जब उन्हें ईश्वरीय संदेश के सही प्रारूप का ज्ञान नहीं होगा तो

यह निर्णय भी अंसभव होगा कि संदेश सही प्रारूप में उन तक पहुंचा है या फिर उसमें कोई फेर बदल की गयी है?

यह भी हम बता चुके हैं कि साधारण मनुष्य को परलोक के कल्याण के लिए ईश्वरीय ज्ञान की आवश्यता इस लिए होती है क्योंकि उसकी बुद्धि की सीमा होती है इसी लिए वह ईश्वरीय संदेशों को

अपनी बुद्धि पर भी परख नहीं सकता तो फिर आम मनुष्य को यह विश्वास कैसे हो कि ईश्वरीय दूत , ईश्वरीय संदेश के नाम पर जो कुछ उन से कह रहे हैं वह वास्तव में

ईश्वरीय संदेश है और उसमें किसी प्रकार की कोई फेर बदल नहीं की गयी है ?

इस शंका का उत्तर इस प्रकार से दिया जा सकता है कि हम यह सिद्ध कर चुके हैं हमारी बुद्धि कुछ बौद्धिक तर्कों के आधार पर इस बात को आवश्यक समझती है

कि मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए ईश्वरीय संदेश का होना आवश्यक है। इसी प्रकार हमारी बुद्धि यह बात बड़ी सरलता से समझ सकती है कि ईश्वरीय कृपा व ज्ञान के अंतर्गत यह आवश्यक है

कि उसका संदेश सही रूप और प्रारूप में लोगों तक पहुंचे क्योंकि यदि सही रूप में नही पहुंचेगा या संदिग्ध होगा तो उससे लोगों का विश्वास उठ जाएगा और विश्वास उठने से उसकी उपयोगिता

समाप्त हो जाएगी और हम इस पर चर्चा कर चुके हैं कि ईश्वर के तत्व ज्ञान के दृष्टिगत इस बात की कोई संभावना नहीं है कि वह एसा कोई काम करे जो निरर्थक हो।

दूसरे शब्दों में जब यह ज्ञान हो गया कि ईश्वरीय संदेश एक या कई माध्यमों से जनता तक पहुंचते है ताकि मनुष्य पूर्ण रूप से अपने अधिकार से लाभ उठा सके जो वास्तव में ईश्वर का उद्देश्य है

तो फिर ईश्वर और उसके गुणों के संदर्भ में हमारी जो विचार धारा है और उसके तत्वज्ञान के आधार पर हमें यह भी मानना होगा कि यह ईश्वर अपने संदेश को सुरक्षित रूप से आम लोगों तक

पहुंचाने का व्यवस्था करेगा क्योंकि यदि उसने इसकी कोई व्यवस्था नहीं की कि उसका संदेश उसके दासों तक सुरक्षित रूप में और बिना किसी हेर फेर के पहुंचे तो यह उसके तत्वज्ञान से दूर

और दूरदर्शिता से ख़ाली काम होगा क्योंकि यदि हम यह मान लें कि ईश्वरीय संदेशों में फेर बदल हो सकती है तो इसका अर्थ यह होगा कि ईश्वर अपने संदेश को गलत लोगों द्वारा फेरबदल

से बचाने में सक्षम नहीं है और हम चर्चा कर चुके हैं कि ईश्वर हर काम में सक्षम है और विवशता उसके निकट भी फटक नहीं सकती और अर्थात ईश्वर कभी भी किसी भी दशा में विवश नहीं

हो सकता बल्कि यह सोचा भी नहीं जा सकता कि वह विवश हो सकता है क्योंकि विवशता सीमा के कारण होती है और ईश्वर की कोई सीमा नहीं है। इन सब विषयों पर हम चर्चा कर चुके हैं।

इसके अतिरिक्त हम इस बात को भी तर्कों द्वारा स्वीकार कर चुके हैं कि ईश्वर को हर वस्तु और हर विषय का ज्ञान है बल्कि वह स्वंय ज्ञान है तो फिर इस विचार के साथ यह नहीं सोचा जा

सकता कि वह अपने इस ज्ञान के होते हुए भी अपने संदेश को लोगों तक पहुंचाने के लिए एसे माध्यम का चयन करेगा जिस से गलती हो सकती हो या जो भूल कर संदेश में उलट फेर कर

सकता हो या उसे उसके असली प्रारूप में लोगों तक पहुंचाने में सक्षम न हो।

इस प्रकार से ईश्वर एसे साधन का चयन करेगा जो हर प्रकार से संतोषजनक हो क्योंकि अविश्वस्त साधन का चयन करने का अर्थ यह होगा कि उसे साधन के बारे में पूर्ण ज्ञान नहीं था और

यह संभव नहीं है क्योंकि ईश्वर को हर वस्तु का ज्ञान है और यदि यह मान लें कि उसे ज्ञान था तो फिर इसका मतलब यह होगा कि उसने इस बात की जानकारी के बावजूद के उसके द्वारा

चुना गया साधन उसके संदेश में फेर बदल करेगा , उस साधन को चुना और यह संभव नहीं है क्योंकि कोई साधारण व्यक्ति भी अपना संदेश ले जाने के लिए किसी ऐसे साधन को नहीं चुनेगा

जिसके द्वारा फेर बदल का उसे ज्ञान हो तो फिर ईश्वर की बात ही क्या,

तो इस प्रकार से बौद्धिक तर्कों से यह सिद्ध हो गया कि हमने ईश्वर के लिए जिन विशेषताओं को प्रमाणित किया है उनके आधार पर इस आवश्यक है कि उसके द्वारा चुने गये

संदेशवाहक विश्वस्त हों और यह बात हमें बौद्धिक तर्कों के आधार पर स्वीकार करनी पड़ेगी और यह वह विषय है जिस पर स्वंय ईश्वरीय संदेशों में भी अत्यधिक बल दिया गया है।

आज के मुख्य बिन्दुओं पर एक दृष्टिः

ईश्वरीय संदेश मनुष्य की लोक व परलोक की सफलता व कल्याण के लिए आवश्यक है किंतु इसी प्रकार इस बात का विश्वास भी आवश्यक है कि

ईश्वर का संदेश अपने सही रूप में लोगों तक पहुंचा है क्योंकि फेर बदल की आशंका के साथ ईश्वरीय संदेश की उपयोगितता समाप्त हो जाएगी।

ईश्वर के तत्व ज्ञान के दृष्टिगत और बौद्धिक तर्कों के आधार पर हम यह कदापि नहीं सोच सकते कि ईश्वर अपने संदेश को लोगों तक पहुंचाने के लिए एसी व्यवस्था का चयन करेगा जिस के

बारे में लोगों को संदेश हो सकता है या जिसके बारे में शंका उत्पन्न हो सके।