सृष्टि, ईश्वर और धर्म
 



संसार में इतने पापी क्यों?





ईश्वरीय दूत किसी भी प्रकार से किसी एक क्षेत्र से विशेष नहीं थे और न ही किसी एक क्षेत्र में भेजे गये



यह एक तथ्य है कि लोगों के व्यवहारिक रूप से मार्गदर्शन के लिए दो चीज़ों का होना आवश्यक है। पहली चीज़ यह कि लोग स्वंय इस ईश्वरीय कृपा से लाभ उठाना चाहें और दूसरी चीज़ यह कि अन्य लोग ईश्वरीय कृपा से लाभ उठाने के मार्ग में बाधा उत्पन्न ना करें।



मनुष्य की परिपूर्णता के स्वेच्छिक होने की विशेषता के कारण यह आवश्यक है कि यह पूरी प्रक्रिया कुछ इस प्रकार से आगे बढ़े कि सत्य व असत्य के दोनों पक्षों को सही व गलत मार्ग के चयन का अधिकार प्राप्त रहे और अब आगे की चर्चा



पिछली चर्चा में हम ने ईश्वरीय दूतों की व्यवस्था के बारे में शंका का वर्णन और उसके निवारण पर चर्चा की थी आज इस संदर्भ में की जाने वाली कुछ अन्य शंकाओं पर चर्चा कर रहे हैं।



कुछ लोग यह शंका करते हैं कि यदि ईश्वर ने अपने दूतों को लोगों के मार्गदर्शन के लिए भेजा और उसके दूतों ने यह काम पूरी ज़िम्मेदारी से किया तो फिर विश्व में इतने अधिक लोग पाप क्यों करते हैं ? और क्यों इतने व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार दिखाई देता है ? क्या यह संभव नहीं था कि ईश्वर कोई एसी व्यवस्था करता जिससे लोग पाप ही ना करते और पूरे विश्व में केवल भलाई और भले लोग ही रहते ? या कम से कम ईश्वरीय दूतों का अनुसरण करने वाले ही एकजुट रहते किंतु हम देखते हैं कि एसा नहीं है और विभिन्न कालों में ईश्वरीय दूतों के अनुयाई भी एक दूसरे से लड़ते दिखाई देते हैं।



इस शंका का उत्तर देने से पूर्व हम उस चर्चा की याद दिलाना चाहेंगे जिसमें हम ने मनुष्य में चयन अधिकार की बात की थी । आपको याद होगा कि हमने कहा था कि ईश्वर ने संसार से सभी मनुष्यों को चयन शक्ति दी है। अर्थात हर मनुष्य को यह अधिकार दिया है कि वह सही या गलत मार्ग में से किसी एक मार्ग का चयन करे और यह अधिकार ईश्वरीय न्याय के अनुकूल है क्योंकि यदि ईश्वर लोगों को विवश करता तो फिर भले को भलाई का इनाम और बुरे को बुराई का दंड देना अर्थहीन हो जाता क्योंकि बुरा व्यक्ति कह सकता है कि यदि मैंने बुराई की है तो इसमें मेरा क्या दोष? ईश्वर ने मुझे बुराई करने पर विवश किया था । इसी प्रकार वह भले व्यक्ति को मिलने वाले इनाम पर भी आपत्ति कर सकता था कि यदि किसी ने कोई अच्छा काम किया है तो उसमें उसका क्या कारनामा है? ईश्वर ने चाहा कि वह अच्छाई करे इस लिए उसने अच्छाई की।



इसी प्रकार की आप्तियों और आतार्किक परिस्थितियों के दृष्टिगत ईश्वर ने मनुष्य को यह अधिकार दिया है अर्थात उसे चयन का अधिकार दिया है अलबता चयन में सरलता के लिए उसने मनुष्य के लिए बहुत से साधन भी उपलब्ध किये हैं ।



ईश्वर ने जो साधन उपलब्ध किये उनमें सर्वप्रथम मनुष्य की अपनी बुद्धि है अर्थात मनुष्य को बुद्धि जैसा उपहार दिया है जिसकी सहायता से वह भले बुरे की पहचान कर सकता है किंतु चूंकि बुद्धि पर कभी कभी वातावरण और घर परिवार का वातावरण प्रभाव डालता है इस लिए ईश्वर ने अपने दूतों को भेजा ताकि यदि कुछ वास्तविकताओं को बुद्धि भूल गयी है तो ईश्वरीय दूत उसे याद दिलाएं किंतु ईश्वर ने जो यह व्यवस्था की है उसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सारे मनुष्य इन सुविधाओं और साधनों से सही रूप में लाभ उठाएं।



ईश्वर ने मनुष्य को परिपूर्णता की ओर ले जाने की जो व्यवस्था की थी और जिसके अतंर्गत उसने दूत भेजे और उन्होंने कल्याण व परिपूर्णता के साधनों से मनुष्य को अवगत कराया तो यदि सारे मनुष्य उन साधनों और ईश्वर की इस कृपा से लाभान्वित होते तो निश्चित रूप से स्वर्ग धरती पर उतर आता अर्थात यह पूरा संसार पवित्रता का उदाहरण होता और भ्रष्टाचार व पाप तथा बुराई का कहीं कोई चिन्ह नहीं होता।



किंतु हम देखते हैं कि बहुत से लोग न तो अपनी बुद्धि की सुनते हैं और न ही ईश्वरीय दूतों के संदेशों पर ध्यान देते हैं और इसी लिए बुराईयों में डूब जाते हैं अब यदि ईश्वर कोई एसी व्यवस्था करता जिससे पूरे संसार में कोई बुराई ना कर पाता तो फिर मनुष्य से चयन का अधिकार छिन जाता जिसके बाद फिर स्वर्ग व नर्क की पूरी व्यवस्था अर्थहीन हो जाती।



अर्थात यदि ईश्वर अपनी शक्ति से इस संसार से बुराई मिटा देता तो फिर चयन शक्ति के स्वामी मनुष्य को इस संसार में भेजने और उसकी परीक्षा लेकर उसे दंड या पुरुस्कार देने की पूरी ईश्वरीय व्यवस्था ही चरमरा जाती।



इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य में अवज्ञा व पाप में रूचि का मुख्य कारण वास्तव में उसके भीतर चयन शक्ति की उपस्थिति है। यद्यपि ईश्वर का मूल उद्देश्य यह नहीं था बल्कि उसका मूल उद्देश्य मनुष्य की परिपूर्णता है किंतु चूंकि मूल उद्देश्य की पूर्ति के लिए मनुष्य के पास अधिकार व चयन शक्ति का होना आव्शयक है इस लिए इस अधिकार व चयन शक्ति के गलत प्रयोग द्वारा मनुष्यों का विनाश व पतन संभव है क्योंकि ईश्वर यह नहीं चाहता के सारे के सारे मनुष्य सत्य व भलाई के मार्ग पर चलें भले ही एसा करने की उनकी इच्छा ना हो और भले की उन्हें सत्य के मार्ग पर चलने के लिए विवश किया गया हो।



ईश्वर चाहता है कि सारे लोग सत्यवादी व भले हों किंतु सच्चाई का रास्ता उन्होंने स्वंय चुना हो और किसी दूसरी शक्ति ने उन्हें इसपर विवश ना किया हो। क्योंकि यदि दूसरी शक्ति उन्हें इस पर विवश करेगी तो फिर उनकी भूमिका का कोई महत्व नहीं रहेगा।



ईश्वरीय दूतों के संदर्भ में एक शंका यह भी की जाती है कि इस बात के दृष्टिगत कि ईश्वर यह चाहता है कि मनुष्य अधिक अधिक उच्च श्रेणी व परिपूर्णता तक पहुंचे तो क्या यह उचित नहीं था कि ईश्वर अपने दूतों द्वारा मनुष्य को इस प्रकृति में छुपे हज़ारों रहस्यों से अवगत करा देता जिससे मानव समाज की प्रगति की गति तेज़ होती।



अर्थात जब ईश्वरीय दूतों को प्रकृति के समस्त रहस्यों का ज्ञान था तो उन्होंने मानव जीवन को सरल बनाने वाले इन साधनों के अविष्कार में मनुष्य की सहायता क्यों नहीं की । आज मनुष्य जिस प्रकार के आधुनिक साधनों से लाभ उठा रहा है वह साधन ईश्वरीय दूतों के काल में क्यों नहीं थे ? क्यों ईश्वरीय दूतों ने इन साधनों के अविष्कार में मनुष्य की सहायता नहीं की और क्यों इस प्रकार के रहस्यों से पर्दा नहीं उठाया क्योंकि यदि वह एसा करते तो मनुष्य के जीवन को सुविधाजनक बनाने वाले आधुनिक साधनों से इतने वर्षों तक मानव समाज वंचित न रहता।



यह अत्याधिक महत्वपूर्ण शंका है इस शंका और इसके उत्तर पर अगले कार्यक्रम में विस्तार से चर्चा करेंगे फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिन्दुः



हर मनुष्य को यह अधिकार दिया है कि वह सही या गलत मार्ग में से किसी एक मार्ग का चयन करे और उसने चयन में सरलता के लिए मनुष्य के लिए बहुत से साधन भी उपलब्ध किये हैं । और यह अधिकार ईश्वरीय न्याय के अनुकूल है क्योंकि यदि ईश्वर लोगों को विवश करता तो फिर भले को भलाई का इनाम और बुरे को बुराई का दंड देना अर्थहीन हो जाता



ईश्वर ने जो साधन उपलब्ध किये उनमें सर्वप्रथम मनुष्य की अपनी बुद्धि है अर्थात मनुष्य को बुद्धि जैसा उपहार दिया है जिसकी सहायता से वह भले बुरे की पहचान कर सकता है किंतु चूंकि बुद्धि पर कभी कभी वातावरण और घर परिवार का वातावरण प्रभाव डालता है इस लिए ईश्वर ने अपने दूतों को भेजा



किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि सारे मनुष्य ईश्वर की इस कृपा से लाभ भी उठाएं। अगली चर्चा तक के लिए अनुमति दें।